भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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२१२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कटुपर्णी (चोक) तस्या नामानि गुणाँश्चाह कटुपर्णी हैमवती हेमक्षीरी हिमावती । हेमाह्वा पीतदुग्धा च तन्मूलं चोकमुच्यते ।। १७६ ।। हेमाह्वा रेचनी तिक्ता भेदित्युत्क्लेशकारिणी । कृमिकण्डूविपानाहकफपित्तास्रकुष्ठनुत् ।। १७७ ।। सत्यानाशी (चोक) के नाम तथा गुण—कटुपर्णी, हैमवती, हेमक्षीरी, हिमावती, हेमाह्वा और पीतदुग्धा ये सब सत्यानाशी के नाम हैं और इसी के जड़ भाग को चोक कहते हैं । सत्यानाशी—रेचक, तिक्तरसयुक्त, भेदक (मल को भेदन करने वाली) और उत्क्लेश कारक होती है एवम् कृमि, खुजली, विष, आनाह, कफ, पित्त, रक्त विकार और कुष्ठ को दूर करने वाली होती है । [१७६-१७७] ५८. कटुपर्णी (चोक) हिं०—सत्यानाशी, पीला धतूरा, फरंगी धतूरा, उजर कांटा, सियाल काँटा, भड़भांड़, चोक । बं०—सोनाखिरणी, शियाल काँटा, बड़ो सियाल काँटा । म०—काँटे धोत्रा । गु०—दारूडी । क०—अरसिन उन्मत्त । ता०—ब्रह्मदण्डु, कुडियोट्टि, कुरुक्कुम चेडि । ते०—ब्रह्मदण्डी चेट्टु । पं०—कण्डियारी, स्यालकांटा, भटमिल, सत्यनशा, भैरवण्ड, भटकटेया । सन्ता०—गोकुहल जानम । पश्चिमो०—भरभुरवा, कडवह कण्टेला । मला०—पोन्नुम्मत्तम् । उडि०— कांटाकुशम । अं०—Mexican poppy (मेक्सिकन पॉप्पी), Prickly poppy (प्रिक्ली पॉप्पी), Yellow thistle (यलो थिसल्) । ले०—Argemone mexicana Linn. (आर्जिमोन् मेक्सिकाना) । Fam. Papaveraceae पॅपेव्हेर्रेसी । यह सब प्रान्तों के खेत, मैदान, झाड़ी, खण्डहर, सड़क के किनारे आदि गन्दी जमीन में उत्पन्न होती है । शिमल में ५००० फीट ऊँची भूमि पर भी पाई जाती है । सत्यानाशी क्षुप—जाति की वनस्पति २ से ४ फीट तक ऊँची, अनेक शाखाओं से युक्त सघन होती है । इसके क्षुप, पत्ते, फल इत्यादि पर तीक्ष्ण काँटे होते हैं । डण्डी और पत्तों को तोड़ने से पीला दूध निकलता है । पत्ते—३ से ७ इञ्च तक लम्बे, कटे हुए, तीक्ष्ण कँटीले नोक वाले, सफेद धब्बों से युक्त तथा रेशेवाले होते हैं । फूल—कटेरी नुमा चमकीले पीले रंग के आते हैं और वे खुले मुख होते हैं । फल—लम्बे तथा गोल होते हैं और उनसे राई के समान काले रंग के बीज निकलते हैं । वैशाख, ज्येष्ठ की गरमी से इसका क्षुप सूख कर नष्ट हो जाता है । फल के सूखने पर बीज भूमि पर गिर जाते हैं और वे ही शरद ऋतु में अङ्कुरित हो पौधे के रूप में परिणत हो जाते हैं । इसकी जड़ का नाम 'चोक' है । कुछ विद्वान् इस पौधे को विदेशी मानते हैं तथा इसे प्राचीन 'स्वर्णक्षीरी' नहीं मानते । इस वनस्पति के ताजे मूल, क्षीर, बीज तथा तैलादि का औषध में उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन—पहले ऐसा समझा जाता रहा कि इस वनस्पति के पत्तों तथा फलियों में मॉर्फीन (Morphine) या आर्जेमोनाइन् (Argemonine) क्षाराभ पाये जाते हैं लेकिन बाद के प्रयोगों से ज्ञात हुआ कि इसमें इस प्रकार के कोई क्षाराभ नहीं रहते लेकिन बर्बेरीन (Berberine) तथा प्रोटोपाइन (Protopine) नामक अन्य क्षाराभ होते हैं । इसके बीजों में एक गहरे बदामी रंग का, स्वादहीन तैल २२% पाया जाता है जो पहले पतला रहता है लेकिन बाद में रखने पर गाढ़ा होता जाता है । इसके अतिरिक्त इन बीजों में कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates) एवं अॅल्ब्यूमिन (Albumin) ४९%, आर्द्रता ९% तथा राख ६% पाई जाती है । इस राख में क्षारीय फॉस्फेट (Phosphate) तथा सल्फेट (Sulphate) पाये जाते हैं । इस वनस्पति में पीले रंग का दूध बहुत होता है जिसमें अल्प मात्रा में बर्बेरीन (Ber-berine) होता है । पोटैशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate) लवण भी इसमें होता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA