भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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२८४ भावप्रकाशनिघण्टुः इस झाड़ी के कृमि गृहों (Glls-गॉलस्) को छोटी माई, मगिया, मैन, छोटी मैन आदि कहा जाता है । यद्यपि इन्हें लोग फल कहते हैं तथापि ये फल न हो कर एक प्रकार के कृमियों द्वारा निर्मित गृह होते हैं। ये गोल, ग्रन्थि युक्त, चने के बराबर तथा पीताभ धूसरित रङ्ग के होते हैं। ये त्रिकोणाकृति के नहीं होते । औषधि में ये कृमिगृह, इसकी छाल तथा पञ्चांग के क्षार का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-छोटी माई में माजूफल में होने वाला गॅलिक् (Gallic) तथा टॅनिकृ (Tannic) अम्ल बहुत होता है। रेतीली तथा समुद्र के किनारे होने वाली झाड़ी के पञ्चांग की राख में खारा नमक (Sodium sulphate सोडियम् सल्फेट) बहुत होता है। गुण और प्रयोग-छोटी माई माजूफल के समान ही गुण वाली है। यह ग्राही, स्तम्भन तथा रक्त स्रावावरोधक है। इसकी छाल तिक्त, ग्राही तथा बल्य होती है। छोटी माई का प्रयोग माजूफल के स्थान पर किया जाता है। (१) यह उत्तम संग्राही होने के कारण पित्तज अतिसार, रक्तातिसार तथा रक्तार्श में उपयोगी है। (२) इसमें रक्तस्तम्भक गुण बहुत प्रबल होता है। अतः इसका उपयोग रक्तष्ठीवन, नासारक्त स्राव तथा प्रदर आदि रक्त स्रावी व्याधियों में मुख द्वारा एवं स्थानीय प्रयोग के रूप में किया जाता है। (३) गुल्म, प्लीहा, श्वेत प्रदर, शीघ्रपतन एवं शुक्रतारल्य आदि में भी इससे लाभ होता है। (४) इसकी छाल, कबीला एवं तैल का प्रयोग बाजीकरण के लिये किया जाता है। (५) इसका प्रलेप सिर के अपरस (Eczema-एक्झिमा) में किया जाता है। (६) गलशुण्डी वृद्धि तथा दन्तशूल में इसके चूर्ण का मञ्जन तथा काढ़े का कुल्ला कराया जाता है। मात्रा-छो० माई चूर्ण २-४ मा०; छाल १/२-१ तो० क्वाथ बना कर। (ख) Tamarix gallica Linn. (टॅमॅरिकॅसी गॅलिका)। Fam. Tamaricaceae (टॅमॅरिकॅसी)। सं०-झाबुक। हिं०-झाऊ, झाव, पडवास (कृमिगृह-बड़ी माई) बं०-बोनझाऊ, झाउ, (कृमिगृह-बड़ी माई) म०-झाऊ, (कृमिगृह-मगिया माई, बड़ी मुई)। पं०-झाऊ, पिलची, (कृमिगृह-बड़ी माँही)। ता०-सिरूसबुक्कु । ते०-एरूसारू । उर्दू-जहेव । इरा०-गझनाझू । यू०-सुम्नात् उल् तुर्फाह् । अं०-Tamarix (टॅमॅरिक्स), Tamarisk (टॅमॅरिस्क)। इसकी झाड़ी भारत के सभी भागों में विशेष कर पञ्जाब तथा उत्तर प्रदेश में होती है। बंगाल में यह नदियों के किनारों एवं आर्द्र भूमि में उत्पन्न होती है। यह सिन्ध, बलूचिस्तान, इरान एवं अफगानिस्तान में भी बहुत होती है। इसकी झाड़ी छोटी माई की झाड़ी की अपेक्षा बड़ी होती है तथा कभी-कभी इसके छोटे वृक्ष भी देखने में आते हैं। शाखाएँ-पतली तथा आपस में मिली हुई। पत्र-सूक्ष्म, विनाकोषयुक्त, चिकने, बल्क सदृश एवं तीक्ष्णाग्र। पुष्प- द्विलिङ्गी, बहुत छोटे, १/१० इञ्च के घेरे में, श्वेत या गुलाबी, शाखाओं के अन्त में गुच्छों के रूप में। फली-१/१० इञ्च लम्बी। कृमिगृह (Galls = गॉलस्) गोल, जायफल इतने बड़े, तीन कोणयुक्त, गाँठदार, पीले, हरिताभ मटमैले तथा पुराने होने पर धूसरित तथा स्वाद में कषाय एवं कड़वे। इसके विदेशी वृक्षों से एक प्रकार की शर्करा प्राप्त होती है जिसे गझाँजबीन कहते हैं। यह शर्करा यहाँ की जलवायु में पतली हो जाती है तथा बजार में मधु के समान गाढ़ा पीत पदार्थ इस नाम से मिलता है। बाजारू शर्करा में अन्य वृक्षों से प्राप्त शर्कराएँ भी मिली रहती हैं। भारतीय वृक्षों से यह शर्करा प्राप्त नहीं होती। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA