भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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हरीतक्यादिवर्गः २८५ रासायनिक संगठन-इसमें ४०% तक टॅनिक ॲसिड होता है। गंञ्जबीन में विभिन्न शर्कराएँ होती हैं। गुण और प्रयोग-इसके कृमिगृह (गॉल) माजूफल तथा छो० माई के समान ग्राही, स्तम्भन तथा रक्तस्तम्भक होते हैं। गंञ्जबीन मृदु विरेचक तथा कफघ्न है। इससे पाखाना पतला होता है लेकिन इससे आंत्र को कोई नुकसान नहीं होता। इसके पञ्चाङ्ग की राख मूत्रल एवं स्रसन होती है तथा पञ्चाङ्ग का क्वाथ ग्राही, शिथिलता दूर करने वाला एवं बल्य होता है। (१) गंञ्जबीन मीठा तथा सौम्य होने के कारण बच्चों को दस्त साफ होने के लिये व्यवहार में लाया जाता है। इसके लिये इसको दूध के साथ दे सकते हैं। अनेक विरेचक एवं कफघ्न मिश्रणों में यह प्रयुक्त होता है। (२) कृमिगृह (गॉल) का प्रयोग माजूफल के स्थान पर किया जाता है। ग्राही होने के कारण यह अतिसार, आमातिसार, संग्रहणी, अत्यार्तव, रक्तष्ठीवन एवं प्रदर में लाभदायक है। इसके लिये चतुर्गुण जल में इसका फांट बनाकर २ से ४ तोले की मात्रा में पिलाते हैं। (३) इसके फांट का उपयोग दुष्ट व्रण तथा बद (Bubo) के प्रक्षालन के लिये तथा मुखपाक, गले की तकलीफ एवं दन्त तथा मसूढ़ों की दुर्बलता में कुल्ला करने के लिये किया जाता है। (४) इसके पत्तों का लेप शोथघ्न है तथा प्लीहा एवं यकृत् वृद्धि पर इसका लेप किया जाता है। मसूरिका, दूषित व्रण एवं अर्श में इसका धुआँ दिया जाता है। (५) काले रंग का इसके पञ्चाङ्ग का घन क्वाथ झाव नाम से काठियावाड़ में बिकता है तथा गलशुण्डी वृद्धि, गले की शिथिलता तथा शुष्क कास में इसको चटाते हैं। (६) इसके कृमिगृह (गॉल) का चूर्ण ४ से ८ माशा एवं ह्वॅसलीन २ तो० इनका

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