भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
२४० भावप्रकाशनिघण्टुः है जिसमें से १/४ फॉस्फोरिक् एसिड (Phosphoric acid) रहता है। इसके बीजों में फॉस्फेट्स (Phosphates) लेसिथिन् (Lecithin) और न्यूक्लिओ अॅल्ब्यूमिन् (Nucteo-albumin) रहने के कारण ये कॉडलिवर ऑइल (Cod-liver oil) के समान पोषक तथा बलकारक होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके बीज स्निग्ध, सुगन्धित, वातानुलोमक, अग्निदीपक, आध्मानहर, बल्य, वृष्य, वातहर, गर्भाशय सङ्कोचक, दुग्ध वृद्धिकर एवं शोथघ्न होते हैं। इसके पत्र शीतल, दाहशामक, शोथहर एवं मृदु विरेचक होते हैं। (१) इसके बीजों से बनाये लड्डू का व्यवहार प्रसूता में किया जाता है जिससे भूख बढ़ती है, मल शुद्धि और आर्तवशुद्धि होती है। अजीर्ण, अग्निमांद्य, आमवात एवं कामशक्ति की कमजोरी में भी ये उपयोगी हैं। (२) रक्तातिसार एवं मसूरिका में इसके बीज भूनकर और फिर उसका फांट बनाकर देते हैं। (३) शरीर की पीड़ा में इसके बीजों को १/२-१ तोला की मात्रा में खिलाने से लाभ होता है। (४) दुग्ध वृद्धि के लिये इसकी लस्सी बनाकर प्रसूता को दी जाती है। (५) घी में भुने हुये मेथी के बीज, बादियाण और नमक का व्यवहार अतिसार रोकने के लिये करते हैं। (६) इसके बीजों को कॉडलिवर आइल के स्थान पर दे सकते हैं और इसका व्यवहार गण्डगाला, फक्कारोग, पाण्डु, वातरक्त, मधुमेह और औपसर्गिक रोगजन्य दौर्बल्य में किया जाता है। (७) मिस्र में ज्वर रोकने के लिये इसको अङ्कुरित करके खिलाते हैं। मधुमेह में भी इससे लाभ होता है। (८) चर्म को मुलायम और स्वच्छ रखने के लिये इसके बीजों का उपयोग किया जाता है। बालों के झड़ने पर तथा सूजन पर इसका लेप उपयोगी है। श्वेतप्रदर में इसकी पेसरी को धारण कराया जाता है। (९) इसके पत्तों का भी लेप सूजन एवं दाह में किया जाता है। लू लगने में इसके पत्तों को पीसकर शरीर पर मलते हैं तथा आन्तरिक व्यवहार भी करते हैं जिसमें दाह की शान्ति होती है। अल्पमूल्य में बल्य एवं पोषक होने के कारण पशुओं को भी खिलायी जाती है। मात्रा-चूर्ण १/४-१/२ तोला। २६. वनमेथी हिं०-वनमेथी, जङ्गली मेथी। पं०-सिंजी। सिन्ध-जिर। अ०-अकुलिल्-उल्-मलिका। अं०-Sweet- cloves (स्वीट् क्लोव्हस्) ले०-Melilotus parviflora Desf. मेलिलोटस् पार्विफ्लोरा); Syn. Trifolium indicum Linn. (ट्रिफोलिअम् इण्डिकम्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । पश्चिम प्रायद्वीप, बंगाल और उत्तरप्रदेश आदि स्थानों में यह आप-ही-आप उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-३० से ४५ मि० मि० ऊँचा तथा वर्षायु होता है। पत्र-संयुक्त तथा त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक-१२ से १६×८ से १० मि० मि०, दन्तुर, अर्धमालाकार या अर्ध अंडाकार होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, पीतवर्ण की मंजरियों में आते हैं। फली-दीर्घवृत्ताकार, दबी हुई, दोनों छोर पर पतली एवं २.५ मि० मि० लंबे एक बीज युक्त होती है। गुण और प्रयोग-इसके बीज ग्राही होते हैं तथा उदरशूल, अतिसार और आंत्र के विकारों में लाभदायक हैं। इसका व्यवहार कष्टार्तव, आमवात, गण्डमाला आदि में तथा रक्त शुद्धि के लिये किया जाता है। बच्चों के अतिसार में इसकी लप्सी का व्यवहार करते हैं।
हरीतक्यादिवर्गः २४१ अथ चन्द्रशूरस्य नामानि गुणाँश्चाह चन्द्रिका चर्महन्त्री च पशुमेहनकारिका१। नन्दिनी कारवी भद्रा २वासपुष्पा सुवासरा ।।९६।। चन्द्रशूरं हितं हिक्कावातश्लेष्मातिसारिणाम्। असृग्वातगदद्वेषि बलपुष्टिविवर्द्धनम् ।।९७।। चनसूर के नाम तथा गुण-चन्द्रिका, चर्महन्त्री, पशुमेहनकारिका, नन्दिनी, कारवी, भद्रा, वासपुष्पा और सुवासरा ये नाम चनसूर के हैं। चनसूर-हिचकी, वात-श्लेष्मा और अतिसार ग्रस्त रोगी तथा रक्तवातग्रस्त रोगियों के लिए हितकर है और बल तथा पुष्टिवर्धक भी है। [९६-९७] २७. चन्द्रिका (हालों) हिं०-हालों, हालिम, चनसुर, चन्द्रशूर। बं०-हालिम, हालिमा, हालो, चान्दसूर, अलेवेरी। म०-आलीव, हालिम, अहालीव। गु०-अशेलीओ, अशोरिया, आशाल बीज। यू०-तरम राह के बीज। फा०-तुख्म तरह तेजक। अ०-वातरुज्जरजीर। कुमा०-हालिम। ता०-अलिविरइ। ते०-अदित यलु। पं०-तेजक। सि०-अहेरो। क०- अल्लिबीज। अं०-Common Cress (कॉमनक्रेस)। ले०-Lepidium sativum Linn. (लेपिडियम् सेटिवम्) Fam. Cruciferae (क्रुसिफेरी)। यह सब प्रान्तों में बोया जाता है। इसका क्षुप-१ से ३ फीट ऊँचा, मसृण या कुछ रोएंदार होता है। पत्ते- विभक्त होते हैं। पुष्प-सफेद तथा छोटे होते हैं। फल-०.२ इञ्च, चिपटे, अण्डाकार परन्तु अग्र पर भीतर की तरफ दबे हुये रहते हैं। बीज-छोटे, लाल तथा जल में डालने पर लुआबदार होते हैं। अधिकतर इसके बीजों का उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में एक सुगन्धि उड़नशील तथा स्थिर तैल पाया जाता है। इसमें आयोडीन (Iodine), लोह, फॉस्फेट्स (Phosphates), पोटैश (Potash), कुछ लवण, एक तिक्त सत्व एवं जल आदि पदार्थ रहते हैं तथा गन्धक अधिक मात्रा में रहता है। इसके ग्लूकोसाइड (Glucoside) को ग्लूकोट्रोपोइओलियन (Glucotro-poeolin) कहते हैं। गुण और प्रयोग- चनसुर रसायन, बल्य, वाजीकर, उत्तेजक, आनुलोमिक, दुग्धवर्धक एवं शूलहर है। इसका उपयोग प्रसूतावस्था, रक्तदोष, त्वचा के रोग, नेत्र रोग, यकृत और प्लीहा की जीर्ण वृद्धि, ग्रन्थिरोग, रक्तार्श, श्वास, कास एवं अतिसार आदि में किया जाता है। (१) इसके फांट का व्यवहार आमाशय के प्रक्षोभ से उत्पन्न हिक्का में किया जाता है। इसको बार-बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पिलाना चाहिये। इसी प्रकार प्रक्षोभजन्य अतिसार एवं ग्रहणी में भी इससे लाभ होता है। (२) गरी के साथ इसकी बर्फी या दूध में लप्सी बनाकर प्रसूता को दिया जाता है। यह रसायन, पौष्टिक तथा दुग्धवर्धक है। इससे कटिशूल एवं श्वेतप्रदर में भी लाभ होता है। दूध में उबाल कर गर्भपात कराने के लिए प्रयोग में लाते हैं। पुरुषों के लिए भी यह रसायन तथा बाजीकर है एवं इसका व्यवहार शरीर की ऊँचाई बढ़ाने के लिए करते हैं। (३) मिश्री के साथ इसका चूर्ण कुपचन, अतिसार एवं ग्रहणी आदि में देते हैं। (४) नींबू के रस में पीसकर इसका लेप कटिशूल, आन्तरिक शोथ, आमवात तथा सन्धीशूल आदि में करते हैं। १. 'चन्द्रिकाया' इति पाठा०। २. 'वामपुष्पे'ति पाठा०। १९ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
२४२ भावप्रकाशनिघण्टुः (५) इसके पत्र मूत्रल तथा उत्तेजक होते हैं एवं इनका सलाद प्रशीताद (Scurvy = स्कर्वी) नामक रोग में व्यवहार में लाया जाता है। (६) इसकी जड़ का व्यवहार फिरङ्ग तथा निस्तानिका (Tenesmus = टेनेस्मस्) में किया जाता है। मात्रा—१/४-१ तो०। अथ चतुर्बीजगुणानाह मेथिका चन्द्रशूरश्च कालाऽजाजी यवानिका। एतच्चतुष्टयं युक्तं चतुर्बीजमिति स्मृतम् ।।९८।। तच्चूर्णं भक्षितं नित्यं निहन्ति पवनामयम् । अजीर्णं शूलमाध्मानं पार्श्वशूलं कटिव्यथाम् ।।९९।। 'चतुर्बीज' (चारदाना) के गुण—मेथी, चनसुर, मंगरैला और अजवाइन इन चारों के बीजों के योग को 'चतुर्बीज' (चारदाना) कहते हैं और इस चतुर्बीज और कमर का दर्द दूर होता है। [९८-९९] अथ हिंगुनामगुणानाह सहस्रवेधि जतुकं बाह्लीकं हिङ्गु रामठम् ।।१००।। हिङ्गूष्णं पाचनं रुच्यं तीक्ष्णं वातवलासनुत्¹। शूलगुल्मोदरानाहकृमिघ्नं पित्तवर्द्धनम् ।।१०१।। हींग के नाम तथा गुण—सहस्रवेधि, जतुक, बाह्लीक, हिङ्गु और रामठ ये सब नाम हींग के हैं। हींग उष्णवीर्य, पाचक, रुचिकारक, तीक्ष्ण, वात-श्लेष्म को दूर करने वाला, शूल, गुल्म, उदर सम्बन्धी रोग, आनाह (अफरा) और कृमियों को नष्ट करनेवाला एवम् पित्त को बढ़ाने वाला होता है। [१००-१०१] २८. हींग हिं०—हींग। बं०—हिंगु। पं०—हिंगे, हींग। म०—हिंग। मा०—हींग। गु०—हिंगड़ो, वधारणी, हिंग बघारणी। ते०—इङ्गुव, इंगुर, इंगुरा। ता०—पेरुंगियम्, पेरुंग्यम्। क०—हिंगु। फा०—अंगूजह, अंगुजा, अंघुजेह-इलरी। अ०— हिल तीत्, हिलतीस। अं०—Asafoetida (असेफीटिडा)। ले०—Ferula narthex, Boiss. (फेरुला नार्थेक्स, बॉ यस); F. alliacea Boiss. (फे, एलिएंसिआ); Ferula foetida Regel (फेरुला फीटिडा)। Fam— Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। हींग सर्व प्रसिद्ध वस्तु एक विदेशीय वृक्ष का निर्यास है। इसकी उपर्युक्त कई जातियाँ विभिन्न स्थानों पर होती हैं जिनसे कुछ-कुछ भिन्न प्रकार का निर्यास प्राप्त किया जाता है। अधिकांश मिलावटी हींग बिकती है। इनमें चोखी हींग, हीरा हींग, तलाव हींग इत्यादि अच्छी समझी जाती हैं। जो हींग रूमी मस्तगी के समान वर्ण वाली, गरम घी में डालने से लावा के समान खिल जाने वाली तथा लालिमा लिये भूरे या बादामी रंग की वह अच्छी मानी जाती है। उत्तम हींग की डली को तोड़ने से वह भाग बादामी रंग का दिखाई पड़ता है। इसका स्वाद कड़वा और लहसुन के समान खराशदार तथा इसकी गन्ध लहसुन के समान तीव्र होती है। पानी में घोलने से सफेद रंग की दिखाई पड़ती है। हींग के वृक्ष काबुल, हिरात, खुरासान, फारस एवं अफगानिस्तान आदि प्रदेशों में उत्पन्न होते हैं तथा इस देश के पंजाब और काश्मीर में कहीं-कहीं देखने में आते हैं। विभिन्न जातियों में थोड़ा बहुत स्वरूप में अंतर होता है। इसका वृक्ष—झाड़ के समान छोटा ५ से ८-९ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते—अनेक भागों में विभक्त, अजमोदे के पत्तों के समान कटे किनारे वाले एवं १-२ फूट लम्बे होते हैं तथा टहनियों के अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल—तिहाई से तीन चौथाई इञ्च के घेरे में अण्डाकार होते हैं। १. 'हृदि'ति पा०।
हरीतक्यादिवर्गः २४३ चार वर्ष का वृक्ष होने पर इसको काटते हैं और भूमि के पास वाली जड़ को तिरछे तराशने से जो रस निकल कर सूख जाता है उसको दो दिन के बाद खुरच कर संग्रह कर लेते हैं। फिर दो दिन के बाद जड़ को उसी प्रकार ऊपर से तराश कर छोड़ देते हैं और सूखने पर खुरच कर इकट्ठा कर लेते हैं। यही सूखा हुआ पदार्थ हींग है। प्रत्येक वृक्ष से २-३ छटांक से ५-६ छटांक तक हींग मिल सकती है। देशी हींग की अपेक्षा काबुली हींग अच्छी होती है। साधारण परीक्षा-(१) जल के साथ घोटने से इसका पीताभ दुधिया घोल बनता है जो क्षार मिलाने पर हरिताभ पीत हो जाता है। (२) थोड़े से हींग को गन्धक के तेजाब के साथ गरम करने पर लाल से भूरे रंग का घोल बनता है। इस घोल को अधिक जल से विरल बनाकर (Dilute), छानकर (filtering) उसको क्षारीय करने से एक गाढ़े नीले रंग की चमक उत्पन्न होती है (Purplish-blue fluorescence) । मिलावटें-हींग में कङ्कड़, बालू, मिट्टी, मूल के टुकड़े, गोदन्ती तथा गोंद आदि मिलाये रहते हैं। रासायनिक संगठन-यह गन्धक का सेन्द्रिय योग है। इसमें लहसुन में पाये जाने वाला एक उड़नशील तैल ६-१७% रहता है। इस तैल में टरपेन्स् (Terpenes), डाइ-सल्फाइड्स (Disulphides, C₇H₁₄S₂ and C₁₁H₂₀S₂) और एक नीले रंग का तरल पदार्थ (C₁₀H₁₆O)n रहता है। इसमें राल रहती है जिसमें अॅसारेसिनोटेनॉल (Asaresino-tannol) ॲसारेसिनोल फेरूलिक् एसिड इस्टर (Asaresinol ferulic acid ester) तथा फ्री फेरूलिक् एसिड (Free ferulic acid-1.3%) रहता है। इसके अतिरिक्त इसमें गोंद की मात्रा २५% रहती है। शुद्ध हींग में ६५-७५% मद्यसार में घुलने वाले पदार्थ रहते हैं तथा राख ३-५% रहती है। इसकी राल का ऊर्ध्व पातन (Dry distillation) करने से अंबेलि-फेरोन् (Umbelliferone) प्राप्त होता है लेकिन भारतीय जाति से यह प्राप्त नहीं होता। गुण और प्रयोग-हींग दीपन, पाचन, वातानुलोमक, उद्वेष्टन निरोधि, उत्तेजक, कफदुर्गन्धि हर, कफनिःसारक, वातनाडियों के लिये बल्य, गर्भाशयसंकोचक एवं कृमिघ्न है। इसका उत्सर्ग फुफ्फुस, त्वचा, मूत्र तथा पसीने के द्वारा होता है। इसका उपयोग आध्मान, शूल, अपस्मार, अपतन्त्रक, वातविकार, श्वास, कास, कुकास एवं हृच्छूल आदि में किया जाता है। हींग को घृत में भूनकर व्यवहार में लाया जाता है जिससे वमन नहीं होने पाता। (१) फुफ्फुस के रोगों में हींग का अच्छा उपयोग होता है। जीर्ण श्वास नलिका शोथ, दमा, कुकास, बच्चों के फुफ्फुसपाक एवं शुष्क कास आदि में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके लिये जल के साथ हींग के घोल का व्यवहार करना चाहिये। (२) आध्मान, शूल, विबन्ध एवं आमाशय तथा आन्त्र की शिथिलता में अजवाइन अथवा एलुवा और साबुन के साथ गोली बनाकर दिया जाता है। ऐसे विकारों में हिंग्वाष्टक चूर्ण अथवा हिंगुकर्पूरवटी का बहुत व्यवहार किया जाता है। (३) विषमज्वर में प्रतिबन्धन की दृष्टि से अन्न के साथ हींग का व्यवहार किया जाता है। (४) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं तज्जन्य अन्य विकारों में इसका बहुत अच्छा उपयोग होता है। (५) प्रसव के बाद इसके उपयोग से आर्तव शुद्धि होती है। बार-बार होने वाले गर्भपात को रोकने के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। गर्भ रहते ही ६ माशे हींग की ६० गोलियाँ बनाकर प्रारम्भ में १ गोली दिन में दो बार देते हैं। बाद में धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ाते हुये १० गोली प्रतिदिन देते हैं और फिर प्रसव तक धीरे-धीरे इसकी मात्रा कम करते हैं।
२४४ भावप्रकाशनिघण्टुः (६) आध्मान, शूल एवं आक्षेप आदि में २-३ माशा हींग जल के साथ घोटकर उसकी बस्ति दी जाती है। इससे सूत्र कृमि में भी लाभ होता है। (७) सीलोन में नारियल के दूध में हींग को उबालकर सर्पदंश के स्थान पर लगाते हैं तथा पानी में इसको घोलकर नाक में भी टपकाते हैं। बिच्छू के काटने पर भी इसको लगाने से लाभ होता है। (८) बच्चों के पेट फूलने पर इसका लेप पेट पर लगाते हैं तथा कुकास में छाती पर लेप करने से लाभ होता है। नारू तथा दाद पर इसको लगाने से लाभ होता है। (९) हींग तथा अफीम की गोली दाँत के दर्द में दाँत के गढ़े में रखने से लाभ होता है। (१०) हींग, लहसुन तथा सैंधव आदि पदार्थों से सिद्ध तैल कर्णरोगों में बहुत उपयोगी है। इसको १/२-१ चम्मच दूध के साथ दिन में ३, ४ बार या सुबह ४ चम्मच एक साथ ही दूध और मिश्री के साथ पिलाते हैं एवं इसको गर्म करके कान में ३, ४ बूँद डालते हैं। यह तैल बहुत अच्छा प्रतिदूषक (Antiseptic) है एवं इसका अन्तर्बाह्य प्रयोग उपयोगी है। मात्रा-२-८ रत्ती। अथ वचाया नामानि गुणाँश्चाह वचोग्रगन्धा षड्ग्रन्था गोलोमी शतपर्विका। क्षुद्रपत्री च मङ्गल्या जटिलोग्रा च लोमशा ।।१०२।। वचोग्रगन्धा कटुका तिक्तोष्णा वान्तिवह्निकृत्। विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी ।। अपस्मारकफोन्मादभूतजन्त्वनिलान्हरेत् ।।१०३।। वच के नाम तथा गुण-वचा, उग्रगन्धा, षड्ग्रन्था, गोलोमी, शतपर्विका, क्षुद्रपत्री, मङ्गल्या, जटिला, उग्रा और लोमशाा ये सब नाम वच के हैं। वच-उग्रगन्ध युक्त, तिक्त तथा कटुरस वाली, उष्णवीर्य, वमनकारक, अग्निजनक, विबन्ध, आध्मान और शूल को नष्ट करने वाली एवं मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है। एवम् मिर्गी, कफ, उन्माद, भूतबाधा, कृमि तथा वायु को भी दूर करने वाली होती है। [१०२-१०३] २९. वच हिं०-वच, घोरवच, घोड़वच। बं०-वच। म०-वेखण्ड। ते०-वासा, वस। गु०-वज, घोड़ावज। क०- बजे। ता०-वशाम्बु। मला०-व्ययम्पु। गोमा०-वेखण्ड। पं०-बरि बोज। फा०-सोसन जर्द, अगरि तुर्की। अ०-उदल बुज, अकरुन, बज, बिज। यू०-अकुरुन्। अं०-Sweet Flag (स्वीट फ्लैग)। ले०-Acorus calamus, Linn. (एकोरस् कैलॅमस्, लिन.)। Fam. Araceae (एरेसी)। एशिया खण्ड का मध्य भाग तथा पूर्वी यूरोप वच का उत्पत्ति स्थान माना जाता है। मणीपुर, नागा पहाड़, काश्मीर, सिरमूर और युक्त प्रान्त के कितने ही देशों के दलदल और सजल स्थान, में यह उत्पन्न होती है। यह गुल्म जाति की वनौषधि ३-४ हाथ ऊँची होती है। इसकी जड़-अन्य पौधों की जड़ की तरह सीधी नहीं रहती बल्कि बहुत सी जटा के सदृश जड़ की शाखायें चारों ओर फैली हुई रहती हैं और इसकी मुटाई मध्यमा उँगली के समान होती है। प्रत्येक गाँठ के चारो ओर सघन रोवें से होते हैं। इसके पत्ते-लम्बे, पतले और तलवार के समान रहते हैं। मंजरियाँ-सघन, विदाण्डिक, २-४ इञ्च लम्बी, लम्ब गोल और ६-१८ इञ्च लम्बे पत्रकोशों से ढकी रहती हैं। वच के पौधों के सर्वाङ्ग में गन्ध आती है और इसकी जड़ में यह अत्यधिक होती है। मूलस्तम्भ तथा राइजोम (Rhizome) को टुकड़े-टुकड़े कर बाजार में बेचते हैं। ये भूरे रङ्ग के और सुगन्धित होते हैं जिनके निचले हिस्से पर मूल के निशान रहते हैं तथा ऊपर के भाग में लम्बी गढ़ेदार धारियाँ होती हैं।
हरीतक्यादिवर्गः २४५ बाजार में वच के नाम से प्रायः कुलिंजन (Alpinia galanga) की जड़ बेची जाती है। इसीलिये जहाँ वचा (Acorus calamus) की आवश्यकता हो वहाँ घोरवच नाम से ही औषधि खरीदनी चाहिये। वच के स्थान पर आंतरिक प्रयोग में बालवच का प्रयोग भी शास्त्रोक्त नहीं है न उचित ही है। रासायनिक संगठन- इसमें एक सुगन्धित उड़नशील पीले रङ्ग का तैल १.५-३.५%, एकोरिन (Acoria) नामक मधु के समान पतला तिक्त सुगन्धि ग्लूकोसाइड, एकोरेटिन (Acoretin) नामक राल सदृश पदार्थ, कैलामेन (Calamene) नामक रवेदार, क्षाराभ तथा स्टार्च, गोंद, टैनिन् एवं कॅल्शियम् ऑक्सैलेट (Calcium oxalate) आदि पदार्थ रहते हैं। इसके उड़नशील तैल में अॅसारिल् ऑल्डिहाइड् (Asaryl-aldehyde), अॅल्फापिनिन (a- pinene) एवं कैफीन् (Camphene) आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग-वच वामक, कफनिःसारक, हल्लासकर, उद्वेष्टन निरोधि, वातानुलोमक, दीपन, पाचन, मेध्य, वृष्य, कृमिघ्न एवं सुगन्धित है। अधिक मात्रा में देने से यह वामक है। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतंत्रक, श्वास, कास, कण्ठरोग, जीर्ण अतिसार, संग्रहणी, आध्मान, शूल, मन्दज्वर, विषमज्वर, कर्णमूल, ग्रन्थिशोथ एवं अश्मरी आदि रोगों में किया जाता है। (१) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं अंगघात आदि रोगों के लिये यह बहुत अच्छी औषधि है। इसके सेवन से धारणाशक्ति (मेधा) बढ़ती है। इसके लिये वच को मधु अथवा दूध के साथ अधिक दिन तक सेवन करना चाहिये। ब्राह्मी, शंखपुष्पी तथा वच तीनों समान मात्रा में लेकर इसके चूर्ण को ब्राह्मी के रस की ३ भावनाएं देनी चाहिये। इसको अथवा सारस्वत चूर्ण को १/२ से १ माशा मधु एवं घृत के साथ कुछ दिन लेने से उन्माद, स्मरणशक्ति का ह्रास एवं वाणी की जड़ता आदि दूर होकर बुद्धि का विकास होता है। बेहोशी दूर करने के लिये अन्य औषधियों के साथ इसका अच्छा उपयोग होता है। (२) यह अधिक मात्रा (१ से २ माशा) में वामक है तथा खाँसी और श्वास में वमन कराने के लिये इसको नमक और गरम जल से पिलाना चाहिये। इससे बिना किसी कष्ट के कफ निकल जाता है। यह इपिकाक की अपेक्षा अधिक अच्छी औषधि है। सरदी, गले की सूजन, खाँसी तथा बच्चों के सूक्ष्म श्वसनिका शोथ में इसका क्वाथ बहुत उपयोगी होता है। सूखी खाँसी में इसका टुकड़ा मुख में रखने से लाभ होता है। (३) इसमें रहने वाले टॅनिन के कारण इसका उपयोग जीर्ण अतिसार एवं संग्रहणी आदि में किया जाता है। इसके सेवन से आध्मान एवं शूल दूर होता है तथा पाचन सुधर कर भूख बढ़ती है। बच्चों के लिए इसको भूनकर देना चाहिए। यह कृमि तथा पथरी में भी लाभदायक है। दंतोद्भेद के समय इसकी चबाने को बच्चों को देते हैं। (४) मलेरिया आदि विषमज्वरों में अन्य औषधियों के साथ इसके उपयोग से अधिक लाभ होता है। (५) जयपाल के विष को दूर करने के लिए इसको भूनकर जल के साथ पिलाना चाहिये। (६) अर्श में भांग और अजवाइन के साथ इसकी धूनी देने से दर्द दूर होता है। (७) इसका बाह्य प्रयोग अंगघात, आमवात, संधिपीड़ा, आध्मान्, शूल तथा खाँसी और श्वास में उपयोगी है। (८) मक्खी एवं दीमक आदि कीटों का नाश करने के लिए इसका उपयोग होता है। मात्रा-वामक-१ से २ माशा; अन्य गुणों के लिए २-४ र०। अधिक मात्रा में शिरःशूल होता है। दर्पनाशक- सौंफ। अथ पारसीक (खुरासानी) वचाया नामानि गुणाँश्चाह पारसीकवचा शुक्ला प्रोक्ता हैमवतीति सा। हैमवत्युदिता तद्वद्वातं हन्ति विशेषतः ।।१०४।।
२४६ भावप्रकाशनिघण्टुः खुरासानी वच के नाम तथा गुण—पारसीकवचा, शुक्लवचा और हैमवती ये नाम खुरासानी वच के हैं। खुरासानी वच—शुक्लवर्ण की (सफेद) होती है तथा गुणों में पूर्वोक्त वच के समान ही होती है किन्तु विशेष करके यह वायु को दूर करने वाली होती है ॥१०४॥ ३०. खुरासानी वचा (पारसीक वचा) पारसीक वचा (हैमवती) के संबंध में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। कुछ लोग इसी को बालबच भी कहते हैं। कुछ परम्परा ऐसी है कि आंतरिक प्रयोग में जब 'वचा' लेनी हो तो बालबच नाम से मिलने वाला द्रव्य लिया जाय एवं बाह्य प्रयोग में 'वचा' के नाम से घोरबच लिया जाय। यद्यपि इसके लिए कोई शास्त्रीय आधार नहीं मिलता और प्रत्यक्षतः वचा के स्थान पर बाह्याभ्यन्तर प्रयोग में घोरबच का उपयोग अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है। बालबच के नाम से भी बाजार में भिन्न-भिन्न मूल की गाँठें बिकती हैं जिनमें से एक का विनिश्चय श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने किया है। इसका वैज्ञानिक नाम Paris polyphylla Sm. (पैरिस पॉलिफाइला) है तथा इसे हिन्दी में दुधवच एवं नेपाली में इसे सतुआ कहते हैं। इसकी मोटी-मोटी गाँठे जैसी होती हैं। डॉ देसाई के मत से मजार पोश (काश्मी०), ले०-Iris germanica Linn. (आइरिस् जर्मेनिका) यह बालबच है। यह कश्मीर में कब्र पर लगाई हुई मिलती है। बाजार में एक बहुत छोटे अन्य प्रकार के मूल भी बालबच के नाम से मिलते हैं। अथ महाभरीवचा यस्या लोके कुलिञ्जन इति नामान्तरं तस्या गुणानाह सुगन्धाऽप्युग्रगन्धा च विशेषात्कफकासनुत् । सुस्वरत्वकरी रुच्या हृत्कण्ठमुखशोधिनी ॥१०५॥ महाभरी (कुलिञ्जन) के गुण—महाभरी वच (कुलिंजन) सुगन्ध तथा उग्रगन्ध युक्त होती है। विशेष करके यह कफ तथा खाँसी दूर करने वाली, स्वर को उत्तम करने वाली, रुचिजनक, हृदय, कण्ठ तथा मुख को शुद्ध करने वाली होती है। [१०५] ३१. कुलिंजन हिं०-कुलंजन, बड़ा कुलञ्जन। बं०-कुरची वच, महाभरी वच, कुलञ्जन। म०-कुलिंजन कोष्ट कोलञ्जन, मोठे कोलञ्जन। गु०-कुलिंजन जानु, कोलिंजन। सिन्ध०-कुञ्जर, कंजर, कांठी। ता०-पेररत्तइ। ते०- पेड्डादुम्पराशष्ठकम् । मला०-पेरारट्टा। क०-धूम रास्मी। ब्रही०-पदगोजी। फा०-खिरदारु, खरदारु, खुशरवे दारु एकलान्। अ०-इर्क खोलिजान, खुलंजान, खुलांजाने कस्वी, खुलंजान्-ए-कबीर। अं०-Greater Galangal (ग्रेटर गॅलंगाल); Java Galangal (जावा गॅलंगाल)। ले०-Alpinia galanga Willd. (अॅल्पिनिया गॅलंगा)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबॅरेॅसी)। पहले यह जावा और सुमात्रा से आया करता था किन्तु अब बंगाल के पूर्व भाग, दक्षिण भारत, मालावार और गोमान्तक के जंगलों में यह अधिकता से उत्पन्न होता है। इसका क्षुप—आमा हल्दी के आकार का २ मी. तक ऊँचा होता है। पत्ते—२२ से ४५ से.मी. लम्बे, ३-१२ से.मी. चौड़े, चिकने, आयताकार-भालाकार होते हैं। फूल—हरे से सफेद छोटे-छोटे आते हैं। फल—८ मि.मी. गोल नारङ्गी रङ्ग के होते हैं। बहुवर्षायु क्षुप होने के कारण काण्ड के सूख जाने पर भी इसकी जड़ जीवित रहती है। जड़— कन्दवत् और सुगन्धयुक्त होती है। इसको टुकड़े-टुकड़े कर सुखा करके बेचते हैं। ये टुकड़े २.५ से.मी. से ६ से.मी. तक मोटे, बाहर से लाल या मोर्चा के समान बादामी रंग के और अन्दर से हल्के नारंगी बादामी रंग के होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २४७ रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धित हल्के पीले रंग का तेल १.५-४.८% पाया जाता है जिसमें यूजीनॉल (Eugenol 25%), सिनेओल-डी-पिनेन् (Cineole-d-pinene, कॅडेनेन्स (Cadenens), बॅसोरिन् (Bassorin) एवं गॅलैंगिन् (Galangin), रहते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें ३ पीले रवेदार पदार्थ कैंफेराइड (Kaempferide, C₁₆H₁₂O, H₂O), गलेंगाॅल् (Galangol), मॉनोमेथिल् ईथर ऑफ गॅलैंगिन् (Mono-methyl ether of galangin) और स्टार्च २३%, राल, टैनिन, फोलोबॅफेन (Pholobaphane), वसा और मोम आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग—प्राणियों में सिरा द्वारा इसके टिंक्चर या क्वाथ के प्रयोग से निम्न प्रभाव दिखलाई देते हैं। रक्त का दबाव पहले कम होकर बाद में ठीक हो जाता है। यह शायद औदरिक रक्तवाहिनियों के विस्फार के कारण होता है। रक्तवहासंस्थान तथा हृदय के ऊपर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इसकी अल्प मात्रा से श्वसन क्रिया उत्तेजित तथा अधिक मात्रा से श्वसन केन्द्र का घात होकर अवसादित होती है। इसकी अल्प मात्रा से भी श्वसनिकाओं (Bronchioles) का विस्फार होता है। यह पाइलोकारपीन द्वारा कृत्रिम रूप से उत्पन्न श्वसनिकाओं के संकोच को भी दूर करता है। रक्त के दबाव के कम होने के कारण ही प्रारंभ में मूत्र की मात्रा कम होती है जो बाद में प्रकृत हो जाती है। पृथक्कृत (Isolated) गर्भाशय इसके प्रयोग से शिथिल होता है तथा उसके संकोच नियमित होने लगते हैं। पाचन- संस्थान के ऊपर इसकी क्रिया अन्य सुगन्धित उड़नशील तैलों की तरह होती है। कुलंजन उत्तेजक, कफनिःसारक, दीपक, पाचक, वातानुलोमक, बल्य तथा वृष्य है। इसका व्यवहार सरदी जुकाम, आमवात, खाँसी, श्वास, स्वरभंग एवं मधुमेह आदि में किया जाता है। (१) श्वास, खाँसी, कुकास एवं सर्दी के लिये यह बहुत अच्छी औषध है। बच्चों एवं वृद्धों के श्वसनसंस्थान के विकारों में इसको मधु के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। इससे श्वासकृच्छ्र दूर होकर ज्वर भी कम होता है। दमे में इसके उद्वेष्ठननिरोधी गुण के कारण लाभ होता है। गले के प्रदाह में इसको चूसने से लाभ होता है। (२) इसके सुगन्धित, पाचक तथा दीपक गुणों के कारण पाचन के विकारों में यह उपयोगी है तथा अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिये इसका व्यवहार किया जाता है। (३) मधुमेह तथा अपने आप होने वाले मूत्रत्याग (Incontinence) में इसका क्वाथ लाभदायी है। (४) मुख की दुर्गन्ध दूर करने के लिये तथा वाजीकरण के लिये इसको चबाते हैं। (५) इससे सिद्ध तैल का उपयोगः मुखदूषिका तथा कर्णपिटिका आदि चर्म रोगों में किया जाता है। (६) दन्तशूल में इसके चूर्ण को दाँतों पर रगड़ते हैं। (७) अधिक पसीना आता हो तो इसके चूर्ण को शरीर पर रगड़ते हैं। (८) इसके बीज का भी उपर्युक्त गुणों के लिये व्यवहार होता है। मात्रा—२५० से ५०० मि.ग्रा.। विशेष—इसी की एक अन्य जाति जिसे ॲल्पीनिया ऑफिसिनेरम् हेन्स (Alpinia officinarum Hance) और अं० में लेसर गॅलेंगल (Lesser Galangal) कहते हैं, उसका भी व्यवहार कुलंजन के स्थान पर किया जाता है तथा हीन श्रेणी की सोंठ अथवा घोरबच की मिलावट भी इसमें रहती है। दक्षिण भारत में रास्ना के नाम से कुलंजन या उसके भेद का उपयोग करते हैं। अथ अपरा सुगन्धा स्थूलग्रन्थिः यस्या लोके महाभरी इति नाम तस्या गुणानाह स्थूलग्रन्थिः सुगन्धा स्यात्ततो हीनगुणा स्मृता ।।१०६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
२४८ भावप्रकाशनिघण्टुः **महाभरी वच के नाम तथा गुण—**जो मोटी गाँठवाली तथा सुगन्धयुक्त (महाभरी) वच होती है वह पूर्वोक्त वच की अपेक्षा हीन गुण वाली होती है। [१०६] ३२. महाभरीवच **हिं०—**महाभरी वच, कुलञ्जन भेद। **बं०—**महाभरी वच, नरकचूर। **पं०—**कचूर, नरकचूर। **मला०—**कटुइंशीकुआ। **ले०—**Zingiber zerumbet Rosc. ex Smith (जिंजीबेर जिरम्बेट्)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेॅसी)। इस देश के कई प्रान्तों में यह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप गन्ने के समान १ से १॥ मी. ऊँचा और १२ मि.मी. गोल होता है। **पत्ते—**२०-३० से.मी. लम्बे, ५-८ से.मी. चौड़े, नरसल के पत्तों के समान किञ्चित् आयताकार-भालाकार एवं नोंकदार होते हैं। ३० से ४५ से.मी. तक लम्बी डण्डियों पर फूल आते हैं। **फूल—**फीके पीले रङ्ग के होते हैं। **फल—**२.५ से.मी. लम्बा दीर्घवृत्ताकार होता है। **बीज—**छोटे-छोटे आयताकार काले रङ्ग के होते हैं। **मूलस्तम्भ—**कड़ा, द्विवर्षीय, भीतर से पीत एवं स्वाद में कुछ आर्द्रक जैसा ही किन्तु कुछ कड़वाहट लिये हुए होता है। इसका व्यवहार खाँसी, श्वास, कृमि, कुष्ठ तथा अन्य चर्मरोगों में किया जाता है एवं इसके अन्य गुण सोंठ की ही तरह हैं। अथ चोबचीनीति लोके या प्रसिद्धा तस्या नाम गुणाँश्चाह द्वीपान्तरवचा किञ्चित्तिक्तोष्णा वह्निदीप्तिकृत्। विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी।। १०७।। वातव्याधीनपस्मारमुन्मादं तनुवेदनाम्। व्यपोहति विशेषेण फिरङ्गामयनाशिनी।। १०८।। चोबचीनी के नाम तथा गुण—'द्वीपान्तरवचा' यह संस्कृत नाम चोबचीनी का है। **चोबचीनी—**कुछ तिक्तरसयुक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, विबन्ध, आध्मान तथा शूल को नष्ट करने वाली, मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है एवं वातव्याधि, अपस्मार (मिर्गी), उन्माद (पागलपन) और शरीर के दर्द को दूर करती है और विशेष करके यह फिरङ्गरोग को दूर करने में उत्तम होती है। [१०७-१०८] ३३. चोबचीनी **हिं०—**चोबचीनी, तोबचीनी, चोबचिंनी। **बं०—**तोबचीना, कुमारिका, शूकचिन। **म०-गु०—**चोबचीनी। ते०— पिरङ्गीचेवक्का। **ता०—**परङ्गिचेक्कई। मला०— चाइना पैवू या पैर्रू। **ने०—**चोबचीनी। **यू०—**खसिलियर आशसिनी। **फा०—**चोबचीनी। **अ०—**कशवचीनी, खुशबुस्सीनी। **अं०—**China root (चाइनारूट)। ले०— Smilax china Linn. (स्माइलैक्स चाइना)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। वच की अनेक जातियों में चोबचीनी भी एक मानी गई है। यह चीन देश में अधिक उत्पन्न होती है और वहीं से इस देश में आती है। इस कारण इसका नाम द्वीपान्तरवचा रखा गया है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में फैलनेवाली होती है। इस लता की जड़ को ही चोबचीनी कहते हैं। चोबचीनी ८-१० से.मी. लम्बी, २५ मि.मी. तक मोटी, गाँठदार, बेरेशा, खुरदुरी तथा दृढ़ काष्ठवत् जड़ है। इसका स्वरूप सफेदी मायल पीत, गुलाबी एवं किंचित् कालापन युक्त होता है। अधिक पुरानी होने पर चोबचीनी में प्रायः घुन लग जाते हैं, जिससे वह छिद्रयुक्त दिखाई देती है। घुनी हुई तथा गाँठविहीन चोपचीनी को उपयोग में नहीं लाना चाहिये।
हरीतक्यादिवर्गः २४९ रासायनिक संगठन—इसमें वसा, शर्करा, ग्लूकोसाइड, रञ्जक पदार्थ, सॅपोनिन्, गोंद तथा स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—सम्राट् चार्ल्स पंचम के वातरक्त (Gout) में इस औषधि की बहुत सफलता सिद्ध होने से इसका यूरोप में बहुत प्रचार हुआ था। १७वीं शताब्दी में सार्सपरिला के समान इसका व्यवहार किया जाता रहा। यह स्वेदल, स्नेहन, उत्तेजक, रसायन, रक्तशोधक, बल्य, वाजीकर, फिरंगहर तथा धातुओं को गलाने वाली (Resolvent – रीसॉलवेण्ट) है। (१) इसको दूध में उबालकर इसमें मस्तगी, इलायची तथा दालचीनी मिलाकर इसका व्यवहार आमवात, वातरक्त, अपस्मार, जीर्ण वातविकार, कार्श्य, धातुक्षीणता, ग्रन्थिविकार तथा फिरंग की तृतीयावस्था में किया जाता है। (२) अनन्तमूल के साथ इसको पुराने सिरदर्द में देने से लाभ होता है तथा आमवात एवं फिरङ्ग में भी इसका व्यवहार करते हैं। (३) डॉ. देसाई के मतानुसार यह श्रेष्ठ रसायन है। इसकी क्रिया त्वचा, सन्धियों के बन्धन तथा रसग्रन्थियों पर होती है। सोज़ाक से उत्पन्न सन्धिशोथ आदि विकारों में तथा फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा तृतीयावस्था में इससे बहुत लाभ होता है। पोटैशियम् आयोडाइड् की अपेक्षा यह शीघ्र लाभकर एवं निर्दुष्ट औषध है। फिरङ्गादि से उत्पन्न ग्रन्थिवृद्धि में इसके उपयोग से प्रथम वेदना कम होकर बाद में सूजन कम होती है। चोबचीनी जितना चूर्ण रूप में काम करती है उतना फाण्ट या क्वाथ रूप में नहीं करती। मात्रा—चूर्ण २-४ ग्रा. सोंठ के साथ दूध में। इस जाति की जिन अन्य औषधियों का व्यवहार किया जाता है, प्रसंगतः उनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है— (क) जङ्गली उषाबा हिं०-जङ्गली उषाबा, चोबचीनी। बं०-कुमारिका। मल०-कुरिबिलाण्डि। म०-घोटवेल। गु०-गुटी। ता०- मलैतामर। ले०-Smilax macrophylla Roxb. (स्माइलॅक्स मॅक्रोफाइला)। यह एक बड़ी लता होती है जो समस्त भारत में उत्पन्न होती है। पत्ते—लम्बे, बड़े, अखण्ड और नुकीले रहते हैं जिन पर ५, ७ मोटी सिराएँ होती हैं। काँटे दूर-दूर या प्रायः अनुपस्थित होते हैं। पुष्प—गुच्छों में आते हैं। फल— चने के समान गोल, हरित एवं पकने पर रक्तवर्ण के हो जाते हैं। मूल—बहुत तथा सार्सपरिला के समान लाल रंग की होती है। इसकी जड़ों का व्यवहार किया जाता है। इसकी जड़ें ताजी काम में लानी चाहिये। गुण और प्रयोग—यह स्वेदल, मूत्रल, पौष्टिक, कामोद्दीपक और रसायन है। फिरङ्ग की द्वितीयावस्था, जीर्ण आमवात तथा सन्धिशोथ में इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। फिरङ्ग से उत्पन्न होने वाले फोड़े-फुन्सियाँ, सन्धिवात, अस्थिशोथ, अस्थिवात और शूल तथा ग्रन्थियों की वृद्धि में उपयोगी है। पुराने चर्मरोग तथा गण्डमाला में इससे लाभ होता है। नेपाल में ३ ग्रा. चूर्ण सोजाक तथा अन्य श्लैष्मिककला के स्रावों के लिए दिया जाता है। मात्रा—१०-२० ग्रा. चूर्ण का क्वाथ दिन में एक बार। (ख) बड़ी चोबचीनी हिं०-बड़ी चोबचीनी। बं०-हरिनाशुकचिन। म०-गोटी शूकचिन। पहा०-हझिन। ले०-Smilax glabra Roxb. (स्माइलॅक्स ग्लॅब्रा)।
२५० भावप्रकाशनिघण्टुः यह लता आसाम, सिलहट, खासिया की निम्न श्रेणियों एवं तेनासेरिम आदि स्थानों में उत्पन्न होती है। इसमें काँटे नहीं होते। पत्र—नुकीले, पतले, अधोभाग हल्के रंग का; पुष्प—सफेद विदण्डिक; मूल—चोबचीनी की तरह। गुण और प्रयोग—इसके ताजे मूल का क्वाथ त्वक् रोग तथा फिरंग आदि रतिजन्य उपसर्गों से उत्पन्न फोड़े- फुन्सी आदि में दिया जाता है। (ग) हरिया शुकचिन पहा०-हूरिन शूकचिन बं०-गुचिया शूकचिन। ले०-Smilax lanceaefolia Roxb. (स्माइलैक्स लॅन्सिफोलिया)। यह भी लता सिक्किम, हिमालय, आसाम एवं म्यानमार (बर्मा) में होती है। पत्र—पतले तथा उन पर ३ बड़ी शिराएँ रहती हैं। इसकी जड़ चोबचीनी के समान होती हैं जिसका व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग—इसकी जड़ का रस निकालकर आमवात में पिलाते हैं तथा इसके कल्क को वेदनास्थान पर बाँधते हैं। (घ) उशबा, सार्सापरिला हिं०-उशबामग्रबी, सार्सापरिला। अं०-Sarsaparilla (सार्सापरिला)। ले०-Smilax ornata Hook. (स्माइलैक्स ओर्नेटा)। यह स्माइलैक्स की उपर्युक्त विदेशी जाति तथा अन्य विदेशी जातियों के सुखाये हुए मूल हैं। कभी-कभी भौमिक काण्ड (राइजोम) के टुकड़े इसके साथ मिले रहते हैं। यह बहुत लंबे, धारीदार एवं कुछ लालिमा लिये हुए होते हैं। स्थान भेद से तथा वर्ण, धारी एवं भौमिक या वायवीय भाग की अधिकता इत्यादि के कारण इसके स्वरूप में भिन्नता रहती है। यह प्रायः गंधहीन एवं कुछ मीठापन लिये हुए कटु होती है। रासायनिक संगठन—इसमें मुख्यतया सॅपोनिन् (Saponin) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—फिरंग, आमवात, जीर्ण चर्मविकार एवं रक्तदोष के लिए यह बहुत प्रसिद्ध औषध रही है। यह कैसे कार्य करती है यह स्पष्ट नहीं है। संभवतः शारीरिक क्षमता को बढ़ाकर या अन्य औषध के प्रचूषण में सहायता का कार्य करती है। विदेशों में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा—१ से ३ ग्रा.। अथ हपुषाद्वयम् तन्मध्ये प्रथमं फलं मत्स्यसदृशं विस्रगन्ध्यं द्वितीयमश्वत्थफलसदृशं मत्स्यगन्धम्, तयोर्नामानि गुणाँश्चाह- हपुषा हबुषा विस्रा पराऽश्वत्थफला मता। मत्स्यागन्धाप्लीहहन्त्री विषघ्नी ध्वांक्षनाशिनी ।।१९०९।। हपुषा दीपनी तिक्ता मृदूष्णा तुवरा गुरुः। पित्तोदरसमीराशोग्रहणीगुल्मशूलहृत् ।। पराऽप्येतद्गुणा प्रोक्ता रूपभेदो द्वयोरपि ।।१९१०।। हपुषाद्वयम के नाम तथा गुण—दो प्रकार का 'हाऊबेर' होता है। उसमें पहला जो आकार में मछली के समान तथा आम गन्धवाला होता है और दूसरा जो आकार में पीपल के फल के समान तथा मछली के समान गन्धवाला होता
हरीतक्यादिवर्गः २५१ है, उन दोनों के नाम तथा गुण—हपुषा, हबुषा और विस्रा ये तीन नाम प्रथम हाऊबेर के हैं और दूसरे के नाम- अश्वत्थफला, मत्स्यगन्धा, प्लीहहन्त्री, विषघ्नी और ध्वाङ्क्षनाशिनी (इसके खाने से कौवे मर जाते हैं) ये हैं। प्रथम हाऊबेर—अग्निदीपक, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, मृदु, उष्णवीर्य, पाक में गुरु, पित्त, उदर और वात सम्बन्धी रोग, बवासीर, ग्रहणी, गुल्म तथा शूल को दूर करता है और दूसरा हाऊबेर भी इन्हीं पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है अन्तर केवल आकार तथा गन्ध मात्र में ही है। ३४. हपुषा (हाऊबेर) हिं०-हाऊबेर, हाऊबैर, आरार। बं०-हवुषा। म०-होश। मा०-हाऊबेर। पं०-हाऊबेर, पेत्यरी, अवहुल। कुमा०-चिचिया। काश्मी०-वेंथा, पेथरा। फा०-तुख्बदुलह, ओरस। अ०-अरअर, अवहाल, हब्बउलअरअर। अं०-Juniper Berry (जूनिपेर बेरी)। ले०-Juniperus communis Linn. (जूनिपेरस् कम्युनिस्)। Fam. Cupressaceae (क्यूप्रेसेंसी)। हाऊबेर दो प्रकार का होता है। एक का संस्कृत नाम 'हपुषा' और दूसरे का 'अश्वत्थफला' है। हपुषा और अश्वत्थफला वास्तव में दोनों फल और गन्धभेद से दो द्रव्य हैं, परन्तु दोनों के गुण समान हैं और दोनों ही के वृक्ष भी समान ही होते हैं। हपुषा—मछली के समान आकृति का एवं आम गन्ध युक्त और अश्वत्थफल—मछली के समान गन्ध और पीपर (अश्वत्थ) वृक्ष के फलों के समान फलवाला होता है। हपुषा के वृक्ष हिमालय के पश्चिमोत्तर भाग में कुमाऊँ से पश्चिम की ओर ४००० से ४७०० मी. की ऊँचाई तक देखने में आते हैं। इसका वृक्ष बड़ा नहीं होता बल्कि इसका झाड़ होता है जो सघन, फैला हुआ तथा बारहो मास हरा-भरा रहता है। पत्ते—रेखाकार, नुकीले, ५ से १३ मि.मी. लंबे, एक साथ तीन-तीन एवं काण्ड से समकोण बनाते हुए होते हैं। फूल—पीत वर्ण के गुच्छों में आते हैं। फल—१/३-२/३ इञ्च के घेरे में गोलाकार, गूदेदार और पकने पर नीलापन युक्त काले या कुछ बैंगनी रंग के दिखाई पड़ते हैं। इनके ऊपर रजावरण रहता है। अग्रभाग पर शल्कपत्र के त्रिविभक्त निशान रहते हैं और आधार पर भी शल्क पत्र के दो चक्र रहते हैं। प्रत्येक फल में तीन-तीन बीज रहते हैं जिनके पृष्ठ पर तैलग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। फलों से तेल निकाला जाता है। कुल लोग ले०-टैमरिक्स गॉलिका (Tamarix gallica Linn.), हिं०-झाऊ तथा फ्लूजिया ल्यूकोपाइरस (Flueggea leucopyrus Willd.) को ग्रहण करते हैं जो उचित नहीं है। रासायनिक संगठन—इसमें एक उड़नशील तैल ०.२५%, राल १०%, मधुशर्करा ३३%, एक तिक्त पदार्थ ज्यूनिपेरिन (Juniperin), ऑक्सैलिक एसिड तथा कुछ आर्गेनिक अम्ल (Organic acid) आदि पदार्थ रहते हैं। इसी की एक अन्य जाति जू. मैक्रोपोडा (J. macropoda Boiss) के फल कुछ लम्बे रहते हैं तथा उसमें तैल की मात्रा ३.२४% पाई गई है। गुण और प्रयोग—हाऊबेर सुगन्धित, मूत्रजनक, वातानुलोमक, आध्मानहर, पाचक, उत्तेजक, वृष्य, रक्तस्कन्दक, आर्तवजनक एवं उपसर्गनाशक है। इसका उपयोग उदर
२५२ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) आध्मान, शूल तथा पाचन के विकारों में इसको मद्यसार के साथ देते हैं। (३) इसका तैल उत्तेजक, मूत्रल तथा वातानुलोमक है एवं इसका उपयोग कटिशूल, आध्मान तथा शूल में किया जाता है। उत्सर्ग के समय प्रत्याक्षेप क्रिया द्वारा यह गर्भाशय का संकोच करता है इसलिए आर्तवस्राव वृद्धि के लिए इसका उपयोग किया जाता है। इसके बाह्य प्रयोग से चर्म में प्रक्षोभ उत्पन्न होता है। वृक्क रोग में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। (४) इसका काष्ठ स्वेदल है तथा ग्वायकम और सासाफ्रास के बदले में प्रयुक्त होता है। (५) हाऊबेर का रस एक अच्छा उपसर्ग नाशक है। स्थूलांत्र दण्डाणु (बी. कोलाइ) जैसे जीवाणुओं का भी यह नाश करता है। इसके धूम्र का व्यवहार किया जाता है तथा यह मांस तथा मद्यों के संरक्षण के लिये भी प्रयोग में आता है। जानपदिक संक्रामक रोगों के मरक (Pestilence) को रोकने की दृष्टि से यह उपयोगी समझा जाता है। मरक के समय इसके चूर्ण का दैनिक सेवन करने से व्याधि का प्रतिषेध होता है। (६) बच्चों के राजयक्ष्मा में इसको पकाकर देने से भूख बढ़ती है, वजन बढ़ता है और लाभ होता है। (७) इसके चूर्ण को आमवातादि में संधियों तथा सूजन पर मलते हैं। (८) यह 'जिन' आदि आपानक मद्यों के निर्माण के लिये यूरोप में व्यवहार में आता है। मात्रा—चूर्ण २-६ ग्रा.। तैल- ½ से १ बूँद पाचक, ४-६ बूँद मूत्रल। स्पिरिट (२० में १) २०-६० बूँद। फांट-२-३ औंस। अथ विडङ्गस्य नामानि गुणाँश्चाह पुंसि क्लीबे विडङ्गः स्यात्कृमिघ्नो जन्तुनाशनः । तण्डुलश्च तथा वेल्लममोघा चित्रतण्डुलः ।।१११।। विडङ्गं कटु तीक्ष्णोष्णं रूक्षं वह्निकरं लघु । शूलाध्मानोदरश्लेष्मकृमिवातविबन्धनुत् ।।११२।। वायविडङ्ग के नाम तथा गुण—'विडङ्ग' (यह शब्द पुल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग दोनों ही में व्यवहृत होता है), कृमिघ्न, जन्तुनाशन, तण्डुल, वेल्ल, अमोघा और चित्रतण्डुल ये सब वायविडङ्ग के पर्यायवाची शब्द हैं। वायविडङ्ग— कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण और उष्ण वीर्य होता है तथा रूक्ष, अग्निवर्धक एवं पाक में लघु होता है और यह शूल, आध्मान, उदर, कफ, कृमि तथा वात रोग एवं विबद्धता को दूर करता है। [१११-११२] ३५. वायविडङ्ग प्रायः सभी पंसारी धनिये के समान गोल-गोल किञ्चित् लाली युक्त बीज को वायविडङ्ग के नाम से बेचते हैं और अधिकांश वैद्य इसी को लेकर व्यवहार में लाते हैं, किन्तु आजकल के कतिपय विद्वान् वैद्यों की सम्मति है कि शास्त्रीय 'विडङ्ग' वास्तव में आजकल व्यवहार में आने वाले फल वायविडङ्ग नहीं है बल्कि 'नाड़ीहिङ्गु' को उपयोग में लेना चाहिये। कुछ विद्वान् काम्पिल्ल के फल को ही वायविडङ्ग मानते हैं। इस प्रकार वायविडङ्ग एक भ्रमात्मक औषधि मानी जाने लगी है। किन्तु मेरी समझ में विडङ्ग और नाड़ीहिङ्गु एक वस्तु नहीं है और न वायविडङ्ग काम्पिल्ल का फल ही है। प्रचलित विडङ्ग में शास्त्रोक्त कृमिघ्न, अग्निदीपक आदि गुण पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं, अतः इसी का व्यवहार औषधि-कार्यों में करना चाहिए। हिं०-वायविडङ्ग, भाभिरंग, बाबिरंग। बं०-विरंग। म०-वावडिङ्ग। गु०-वावडीङ्ग। क०-वायुविडङ्ग, वायबिलंग। ते०-वायुविडंघमु। ता०-वायुविलंगम। पं०-बबरंग, वाबरंग। मा०-वायविरंग। सिंहली०-उम्बेलिया, अम्बेलिया।- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २५३ वंसज काबुली ने०-हिमलचेरी। अ०-विरंज काबुली। फा०-बरंग कावली, विरंज काबली। अं०-Babreng, Fruit of Embelia ribes। बाबरिंग, फ्रूट आफ अम्बेलिया राइब्स ले०-Embelia ribes Burm. (एम्बेलिया राइब्स)। Fam. Myrsinaceae (मिर्सिनेसी)। यह मध्य हिमालय से भारतवर्ष के पहाड़ी भागों में तथा सिलोन से सिंगापुर तक बहुत पाया जाता है। इसकी झाड़ी—बहुत विस्तार में बढ़ने वाली होती है। छाल—वातरन्ध्रों के कारण खुरदुरी होती है। टहनियाँ— लंबी, पतली, लचीली, गोल एवं लंबे पर्व युक्त होती हैं। पत्ते—चर्मवत्, ५ से १० से.मी. लंबे, दीर्घवृत्ताकार या कुछ भालाकार, तीक्ष्णाग्र, ऊपर से चमकीले एवं अधोतल पर हलके या कुछ रजताभ एवं सूक्ष्म रक्ताभ ग्रन्थियों से युक्त होते हैं। फूल—सफेद या किञ्चित् हरियाली लिये फीके पीले रंग के गुच्छों में आते हैं। फल—५ मि.मी. तक गोलाकार, पकने पर लाल रंग के किन्तु सूखने पर झुर्रीदार काले रंग के दिखाई पड़ते हैं। फलों में डण्ठल के साथ पाँच पट्टों का पुष्प पात्र लगा रहता है और अग्र की तरफ नुकीला रहता है। फल तोड़ने पर चितकबरे लाल रंग के पतले आवरण से युक्त एक-एक बीज निकलता है, जो स्वाद में चरपरा और गरम मसाले के समान सुगन्धित होता है। चित्रतण्डुलः यह पर्याय इसी चितकबरे वर्ण का द्योतक है। रासायनिक संगठन—इसके फलों में एम्बेलिक् एसिड (Embelic acid) या एम्बेलिन (Embelin, C₁₈ H₂₈ O₄) नामक एक सुनहरे पीले रंग का रवेदार पदार्थ २.५% पाया जाता है। यह जल में अघुलनशील तथा मद्यसार, ईथर, क्लोरोफार्म और बेंझीन में घुलनशील होता है। क्षारीय घोल में यह घुलकर घोल लाल रंग का हो जाता है। इसके अतिरिक्त अल्प मात्रा में क्रिस्टेम्बिन (Christembine) नामक एक क्षाराभ तथा तैल, उड़नशील तैल, रञ्जक द्रव्य, टॅनिन एवं राल सदृश पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह उत्तम कृमिघ्न, वातानुलोमक, वातहर, दीपन, पाचन, वातनाडी संस्थान के लिये बल्य, रक्त शोधक, आनुलोमिक तथा रसायन है। रसग्रन्थियों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका उत्सर्ग मूत्र द्वारा होता है जिससे मूत्र लाल रंग का हो जाता है। (१) स्फीतकृमि (Tape-worm) के लिये यह अत्युत्तम औषधि है। मेलफर्न (Malefern) के समान इससे मरोड़ नहीं होती और अधिक लाभ होता है। बच्चों को ४ ग्रा. तथा बड़ों को ८ ग्रा. चूर्ण मधु या दही के साथ सुबह खिलाकर ४ घंटे पश्चात्, एरण्ड तैल अथवा कोई विरेचन देना चाहिये। अथवा कोष्ठ शुद्धि के पश्चात् रात में इसका चूर्ण मट्ठे के साथ देकर दूसरे दिन सुबह विरेचन देना चाहिये। इससे मरे हुए कृमि निकल जाते हैं। अन्य कृमियों पर भी इससे लाभ होता है। इसका कृमिघ्न गुण एम्बेलिक् एसिड के कारण है। इसके लवण अमोनियम् एम्बेलेट Ammonium embelate (१ १/२ - ३ र०) का भी उपयोग मधु के साथ अच्छा होता है। इसके पूर्व तथा पश्चात् एरण्ड तैल से विरेचन कराना चाहिये। (२) यह एक अच्छा रसायन है। सुश्रुत में एक 'सर्वोपघातशमनीय' नामक प्रयोग बतलाया है। नित्य एक महीने तक विडंग के मगज का चूर्ण तथा मुलेठी खाकर ऊपर से ठण्डा जल पीना चाहिये। पथ्य में बिना नमक, मूँग का आँवले के साथ सिद्ध किया यूष तथा घी और भात औषध पचने पर लें। इसके उपयोग से सब प्रकार के अर्श अच्छे होते हैं। ग्रहण शक्ति तथा धारणा शक्ति बढ़ती है। शरीर के सभी प्रकार के कृमि नष्ट होकर शरीर स्वस्थ होता है। इसके हर साल प्रयोग से मनुष्य निरोग तथा शतायु होता है। इससे सब प्रकार के पुराने रोग जैसे अर्श, संग्रहणी, प्रमेह, कुष्ठ, क्षय, श्वास, उपदंश एवं व्रण आदि अच्छे होते हैं तथा हैजा, प्लेग आदि उपसर्गों का भय नहीं रहता।
२५४ भावप्रकाशनिघण्टुः (३) बालकों के सभी रोगों की यह अच्छी औषधि है। सुखण्डी, आध्मान, शूल, कुपचन एवं अग्निमांद्य आदि में दूध में इसको डालकर उबालते हैं और वही दूध पिलाते हैं। इससे बच्चे तन्दुरुस्त रहते हैं। यदि इसके साथ अनन्तमूल भी दिया जाय तो अधिक लाभ होता है। (४) गण्डमाला के लिये-वायविडङ्ग, गुग्गुलु, मनःशिला तथा शृङ्गभस्म, मधु और घृत के साथ देने से धीरे-धीरे लाभ होता है। (५) चर्म रोगों में इसका आन्तरिक एवं बाह्य प्रयोग किया जाता है। दाद में इसके लेप से लाभ होता है। (६) मज्जातन्तु के रोग जैसे अर्धांगघात, आक्षेप एवं अपस्मार आदि में लहसुन के साथ दूध में उबालकर देना चाहिये। (७) पीनस, शिरःशूल तथा अर्धावभेदक में इससे सिद्ध तैल के नस्य से लाभ होता है। शिरःशूल में कपाल पर इसकी मालिश करनी चाहिये। (८) बिच्छू के काटने तथा सर्प दंश पर इसका उपयोग लिखा गया है। (९) इसका ताजा रस शीतल, मूत्रल तथा आनुलोमिक होता है। मात्रा—चूर्ण ४ से १६ ग्रा.। ३६. विडङ्ग भेद सं०-विडङ्गभेद। हिं०-वायविडङ्ग भेद, वायविभाङ्ग। अवध०-बेबरङ्ग। देहरादून०-वायविरङ्ग, गैया। गोंड०- कोपडल्ली। कुरकु०-भारङ्गेली। मु०-आमटी, गोंदली, बार्बटी। ने०-कलय बोगोटी। अं०-Basal (बासल)। ले०-E. tsjeriam-cottam A. DC. (ए. त्स्जेरियम-कोट्टम ए. डीसी.)। Fam. Myrsinaceae (मिरसिनेंसी)। यह हिमालय पहाड़ के पूर्व की ओर बङ्गाल तथा दक्षिण की ओर सिलोन तक कहीं न कहीं पाया जाता है। इसके वृक्ष—छोटे और बहुत झाड़दार होते हैं। पत्ते कुछ अधिक बड़े होते हैं तथा शिराएँ कुछ मुरचई रोमावरण से युक्त होती हैं। फूल—हरियाली लिये सफेद रंग या हरापन युक्त फीके पीले रंग के बहुत छोटे-छोटे आते हैं। फल— छोटे-छोटे गोल होते हैं और लंबाई में महीन धारीदार होते हैं। गुण और प्रयोग—यह वातानुलोमक, कृमिघ्न, अर्शोघ्न, शोथप्रतीकारक और रसायन है। इसका उपयोग विडङ्ग के समान किया जाता है। बाजार में दोनों ही जाति के फल मिले हुये रहते हैं। (१) वह भी विडङ्ग के समान विशेषरूप से स्फीतकृमि नाशक होता है। (२) गण्डमाला में अनन्तमूल के साथ इसका क्वाथ पिलाते हैं तथा ठण्डे जल में पीसकर गाँठों पर लेप करते हैं। (३) दन्तशूल में इसका चूर्ण हींग के साथ दाँत के गड्ढे में रखने से लाभ होता है तथा इसका मञ्जन में व्यवहार करते हैं। इसके मूल की छाल का भी इसमें उपयोग होता है। (४) इसके कोमल पत्तों का सोंठ के साथ क्वाथ बनाकर गले की सूजन, मुख के छाले एवं व्रण में कवल कराने से लाभ होता है। (५) न्यूमोनिया तथा अन्य छाती के विकारों में चावल की माँड़ के साथ इसकी छाल को उबाल- कर पिलाते हैं तथा छाल पीसकर छाती पर लेप करते हैं। इसके फलों को पीसकर मक्खन के साथ छाती पर लगाने से फुप्फुसावरण शोथ में लाभ होता है तथा शिरःशूल में भी इसी प्रकार कपाल में इसका लेप करते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २५५ विशेष—एक अन्य मिरसीन अफ्रिकाना (Myrsine africana Linn.) के फलों को भी कहीं-कहीं विडंग कहा जाता है, किन्तु इसमें शास्त्रोक्त गुण नहीं हैं। ३७. नाड़ी हिङ्गु (डिकामाली) नाडीहिङ्गु पलाशाख्या जन्तुका रामठी च सा । वंशपत्री च पिण्डाह्वा सुवीर्य्या हिङ्गुनाडिका ।। (रा.नि.) सं०-नाडीहिङ्गु, पलाशाख्या, जन्तुका, रामठी, वंशपत्री, पिण्डाह्वा, सुवीर्य्या, हिङ्गुनाडिका। हिं०- नाड़ीहिङ्गु, नारीहींग, कलपतीहींग, डिकामाली, डिकेमाली, कमरी। बं०-हिंगुविशेष। म०-डिकेमाली। गु०-डीकामारी। काठी. मालण, मालडी। क०-डिक्कामल्लि। ता०-कुंवै। ते०-गेरिविक्कि, करिगा, तेल्लामंगा। अ०-कनखाम। अं०- Gummy Gardenia (गम्मी गार्डेनीया); Cambi resin (कॅम्बी रेसिन)। ले०-Gardenia gummifera Linn. (गार्डेनिया गम्भीफेरा)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। इसके वृक्ष अधिकतर दक्षिण भारत में पाये जाते हैं। इसका वृक्ष—छोटा तथा झाड़दार होता है। पत्ते—विनाल, ४.५-७ x २-२.५ से.मी. बड़े, दीर्घवृत्ताभ, आयताकार, स्वरूप में कुछ अमरूद के पत्तों के समान तथा चिकने, चमकीले होते हैं। फूल—सुगंधहीन, प्रारंभ में श्वेत किन्तु बाद में पीतवर्ण के १ से ३ साथ-साथ रहते हैं। फल—२.५-३.८ से. मी., आयताकार या दीर्घवृत्ताभ, चिकना, लंबाई में धारीदार एवं नोकदार होता है। इन पौधों की कोमल शाखाओं के बीच तथा कलियों में से जाड़े के दिनों में हरियाली लिए हुए किञ्चित् पीले रंग का गोंद निकलता है। उसी को 'डीकामाली' कहते हैं। इसकी छाल से गोंद नहीं निकलता। जंगली गोंड लोग ठीकरों में इकट्ठा कर सुखा करके बाजार में बेचते हैं। इस गोंद में छोटी- छोटी लकड़ियां, फूस-घास आदि मिली रहती है अतएव इसे गरम जल में घोल, छान एवं सुखा करके औषधि के काम में लेना चाहिये। शुद्ध डिकामाली में बिलार के मूत्र जैसी गन्ध आती है तथा वह कुछ आर्द्र एवं चमकीला रहता है और उसके चूर्ण बनाने में कठिनाई होती है। गुण--नाडीहिङ्गु कटूष्णं च कफवातार्त्तिशान्तिकृत् । विष्ठाविबन्धदोषघ्नमानाहामयहारि च ।। रा. नि. नाड़ीहिंगु—कटु, उष्ण, कफ और वात की पीड़ा को शमन करने वाली तथा विष्ठा विबन्ध और आनाह रोग को नष्ट करने वाली है। नाडीहिङ्गुस्तु कटुकस्तीक्ष्णश्चोष्णश्च दीपकः । कफवातमलस्तम्भमनोमोहामनाशनः ।। निघण्टुरत्नाकरः नाड़ीहिंगु—कटु, तीक्ष्ण, उष्ण, अग्निप्रदीपक तथा कफ, वात, मलबन्ध, मन का मोह और आम का नाश करने वाली है। रासायनिक संगठन—इसमें दो प्रकार के राल के सदृश पदार्थ रहते हैं जिसमें से गार्डेनिन् (Gardenin) रवेदार सुनहले पीले रंग का तथा दूसरा डिकेनाली (Dikenali) कुछ मुलायम तथा हरे रंग का होता है। गुण और प्रयोग—यह उद्वेष्ठन निरोधि, वातानुलोमक, अग्निदीपक, विरेचक, कृमिघ्न, ज्वरहर, स्वेदजनन, श्लेष्मनिःसारक, त्वक् दोषहर एवं प्रतिदूषक है। गुणों में वायविडङ्ग और डिकामाली बहुत समानता रखते हैं। किन्तु शास्त्रों में विडङ्ग को कृमिघ्न लिखा है और डिकामाली के विषय में उसकी कृमिघ्नता के गुण का स्पष्टीकरण नहीं किया है। आधुनिक शोध द्वारा सिद्ध हुआ है कि डिकामाली भी विशेष कृमिघ्न है। नाड़ीहिङ्गु के प्रयोग से कोष्ठान्तर्गत वर्तुलाकार कृमि नष्ट या निर्जीव हो जाते हैं। वायविडङ्ग—विशेष रूप से पक्वाशय के लम्बे चिपटे कृमियों का विनाशक है। डिकामाली-इन कृमियों का नाश नहीं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
२५६ भावप्रकाशनिघण्टुः कर सकती। इससे गोल (Round) या कुछ लम्बे नन्हें-नन्हें कृमियों का नाश होता है। डिकेमाली का फांट नियत कालिक ज्वर में देने से कम्पन कम होता है। आन्त्र की विकृतियाँ जैसे आध्मान, कुपचन एवं शूल आदि में इससे लाभ होता है। बच्चों को दन्तोद्भव के समय जो पाखाना एवं वमन आदि विकार होते हैं उसमें इससे अच्छा लाभ होता है। आध्मान में एलुवा के साथ पेट पर इसका लेप करते हैं तथा डिकेमाली खिलाते हैं। इसके फल विरेचक तथा कृमिघ्न होते हैं। मोटापा तथा प्लीहावृद्धि में इसका गोंद व्यवहार किया जाता है। बाहरी प्रयोग से दूषित व्रण साफ किये जाते हैं। इससे कीड़े नहीं पड़ने पाते तथा पड़े हुए कीड़े निकल जाते हैं और मक्खियाँ नहीं बैठने पातीं। इससे दन्तशूल में लाभ होता है। नारू में इसे ६०० मि.ग्रा. की मात्रा में देते हैं। अतएव नाड़ीहिङ्गु शास्त्रीय 'विडङ्ग' कदापि नहीं हो सकती। मात्रा—चूर्ण ६०-२५० मि.ग्रा.। अथ तुम्बुरुफलस्य नामानि गुणाँश्चाह तुम्बुरुः सौरभः सौरो वनजः सानुजोऽन्धकः ।।११३।। तुम्बुरु प्रथितं तिक्तं कटुपाकेऽपि तत्कटु । रूक्षोष्णं दीपनं तीक्ष्णं रुच्यं लघु विदाहि च ।।११४।। वातश्लेष्माक्षिकर्णौष्ठशिरोरुग्गुरुताकृमीन् । कुष्ठशूलारुचिश्वासप्लीहकृच्छ्राणि नाशयेत् ।।११५।। 'तुम्बुरु' फल के नाम तथा गुण—तुम्बरु, सौरभ, सौर, वनज, सानुज और अन्धक ये नाम 'तुम्बुरु फल' के हैं। तुम्बुरु फल—तिक्त तथा कटुरस युक्त है और विपाक में भी कटुरस युक्त है। यह रूक्ष, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, तीक्ष्ण, रुचिजनक, पाक में लघु और विदाही होता है। यह वातश्लेष्म, नेत्र, कर्ण, ओष्ठ तथा शिर के रोगों को एवं गुरुता (शरीर का भारीपन), कृमि, कुष्ठ, शूल, अरुचि, श्वास, प्लीहा और मूत्रकृच्छ्र इन सभी रोगों को भी दूर करता है। [११३-११५] ३८. तुम्बुरु हिं०-तुम्बुरु, तुम्बुल, तेजफल। बं०-तम्बुल, तुम्बुरु फल, नेपाली धने, नेपाली धनियाँ। म०- नेपाली धनियाँ। मा०-तूगरू। क०-तुम्बरु। ते०-तुम्दुरुलु। पं०-तुम्बर। गु०-तुम्बुरुफल। लिपचा०-तंग्रु कंग। ले०-Zanthoxylum alatum Roxb. (झैन्थोक्साइलम् ॲलॅटम्); Zanthoxylum acanthopodium DC. (झैन्थोक्साइलम् एकैन्थोपोडियम) दूसरी जाति। Fam. Rutaceae (रूटॅसी)। यह हिमालय की गरम तराइयों में जम्मू से भूटान तक, खासिया पहाड़, टेहरी, गढ़वाल, नाग पहाड़, विजिगापट्टम और गंजाम के पहाड़ों पर पाया जाता है। इसका वृक्ष—झाड़ीदार या क्वचित् छोटे वृक्षवत् रहता है। काँटे—सीधे, १-२ से. मी. लंबे एवं अंडाकार आधार के ऊपर रहते हैं। पत्ते—संयुक्त लंबे पत्र दण्ड वाले एवं आधार की तरफ सपंख तथा गुलाबी एवं सीधे काँटों से युक्त होते हैं। पत्रक—५ से ११, भालाकार, न्यूनाधिक दन्तुर, ऊपर से चमकीले एवं नीचे से हल्के रंग के होते हैं। छोटे- छोटे पीले रंग के फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल—काली मरिच के समान झुमकों में रहते हैं, किन्तु उनके मुख फटे होते हैं। फलों में सुगन्ध आती है। इन फलों के ऊपर तेलिया राल की गाँठे होती हैं तथा इनके अन्दर कागज के समान परदा रहता है। फल प्रायः खाली रहते हैं किन्तु कभी-कभी उनके अन्दर गोल, काले चमकीले बीज रहते हैं। उत्तर हिन्दुस्तान में इसका व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में इसके स्थान पर ले०-झैँ. हेट्सा (Z. rhetsa DC.), हि०- चिरफल, तिरफल, के फल का व्यवहार किया जाता है जो तुंबुरु के फल से बड़े होते हैं। उन पर तेलिया राल की गाँठे तथा अन्दर कागज के समान परदा नहीं रहता। उनका स्वाद चटपटा अकरकरहा के समान एवं गन्ध संतरे के छिलके के समान होती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः २५७ रासायनिक संगठन—इसकी छाल में एक कडुवा पदार्थ, उड़नशील तैल और राल रहती है। यह कडुवा पदार्थ दारुहरिद्रा में पाये जाने वाले बर्बेरीन (Berberine) के सदृश होता है। इसके फलों में एक उड़नशील तैल, राल, एक अम्ल पदार्थ और एक रवेदार पदार्थ झैंथ्योक्शाइलिन् (Xanthoxylin) पाया जाता है। यह तैल यूकैलिप्टस् (Eucalyptus) तैल के सदृश गन्ध एवं गुण वाला होता है। गुण और प्रयोग—यह सुगन्धित, उष्ण, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, ग्राही और उत्तेजक है। इसकी क्रिया गन्धबिरोजा तथा यूकैलिप्टस् तेल के समान होती है। इसके छाल की क्रिया दारुहरिद्रा के समान होती है। (१) ज्वर, कुपचन, अतिसार, हैजा एवं मंदाग्नि आदि में इसके मूलत्वक् और फल का फांट उत्तेजक तथा बल्य औषध के रूप में दिया जाता है। (२) दमे में इसका गुडाखू बनाकर धूम्रपान उपयोगी है। (३) गले की सूजन में इसके ताजे पत्तों को पीसकर चावल के आटे के साथ गरम करके बाँधने से लाभ होता है। (४) यह एक अच्छा प्रतिदूषक (Antiseptic) होने के कारण व्रणों के लिये इसके फलों का आन्तरिक तथा बाह्य प्रयोग किया जाता है। इसके मूलत्वक् क्वाथ से व्रण प्रक्षालन से लाभ होता है। (५) इसके फलों का व्यवहार दन्तशूल में किया जाता है। इसकी दातुन दाँतों के लिये अच्छी समझी जाती है एवं छाल तथा फल का दन्तमञ्जनों में प्रयोग किया जाता है। (६) इसका तैल प्रतिदूषक, कीटाणुनाशक तथा दुर्गन्धहर है। मात्रा—फल–२००-५०० मि.ग्रा., छाल–१०-२० ग्रा. फांट बनाकर। ३९. तिरफल सं०–तुंबरु। म०–चिरफल, तिसल। ते०–इरतचै। ता०–राचामम्। क०–जिसुमी मारा। ले०- Zanthoxylum rhetsa DC. (झैंथ्योक्साइलम् रेट्सा) । Fam. Rutaceae (रुटेंसी) । यह मध्यम ऊँचाई का कटीला वृक्ष दक्षिण में विशेषकर कोंकण में होता है। इसके पत्ते—सदलपर्ण एवं मोटी टहनियों के अग्र पर समूहबद्ध होकर रहते हैं। पत्रक—प्रायः १९-२५, तून के सदृश, आयताकार या प्रासवत्, अखण्ड या गोल दन्तुर धार वाले होते हैं। पुष्प—छोटे, पीले, गुच्छों के रूप में। फल—गुच्छों के रूप में, कच्ची अवस्था में हरे तथा बाद में काले से हो जाते हैं। अन्य वर्णन ऊपर तुम्बुरु के साथ दिया गया है। इसके फल तथा जड़ की छाल का प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—तुम्बुरु के समान तैल, राल आदि। गुण और प्रयोग—इसके गुण तुम्बरु के समान हैं। इसके मूलत्वक् की क्रिया दारुहरिद्रा, मझोरियून, चोबेहयात या पीतचम्पक के छाल की तरह होती है। इसकी जड़ सुगन्धित, कड़वी, मूत्रल तथा पौष्टिक है। (१) इसके फल उत्तेजक, ग्राही, दीपन एवं पाचन होते हैं और इनका व्यवहार, आध्मान, कुपचन, अजीर्ण एवं अतिसार आदि में किया जाता है। सड़ी हुई मछलियों के खाने से उत्पन्न अजीर्ण, वमन एवं अतिसार में इसका व्यवहार करते हैं। मछली खाने वालों के लिये यह पाचक है। तिरफल तथा अजवायन का अर्क हैजे में दिया जाता है। आमवात में मधु के साथ इसे खिलाते हैं। (२) मूलत्वक्—शिथिलताजन्य कुपचन में प्रयोग में लाई जाती है। यह मूत्रल होती है। दन्तशूल में तथा लकवा से जिह्वा का कार्य ठीक न होता हो तो इसे चबाने को देते हैं। जीर्ण आमवात में भी इससे लाभ होता है। यह वृष्य, कड़वी और सुगन्धित होती है और फल की तरह भी इसका उपयोग किया जाता है। २० भाव.I
२५८ भावप्रकाशनिघण्टुः मात्रा—बीज निकाले हुए फल का चूर्ण—१२५-२५० मि.ग्रा. मधु के साथ; मूलत्वक् १०-२० ग्रा. फांट बनाकर नित्य एक बार। अथ वंशलोचनस्य नामानि गुणाँश्चाह स्याद्वंशरोचना वांशी तुगाक्षीरी तुगाशुभा । त्वक्क्षीरी वंशजा शुभ्रा वंशक्षीरी च वैणवी ॥११६॥ वंशजा बृंहणी वृष्या बल्या स्वादी च शीतला । तृष्णाकासज्वरश्वासक्षयपित्तास्रकामलाः ॥ हरेत्कुष्ठं व्रणं पाण्डुं कषाया वातकृच्छ्रजित् ।।११७।। वंशलोचन के नाम तथा गुण—वंशरोचना, वांशी, तुगाक्षीरी, तुगा, शुभा, त्वक्क्षीरी, वंशजा, शुभ्रा, वंशक्षीरी और वैणवी ये नाम वंशलोचन के हैं। वंशलोचन—बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), बलकारक, स्वादु, कषाय रसयुक्त और शीतल होता है और यह तृष्णा, कास, ज्वर, श्वास, क्षय, रक्तपित्त, कामला, कुष्ठ, व्रण, पाण्डु, वात तथा मूत्रकृच्छ्र को दूर करता है। [११६-११७] ४०. वंशलोचन हिं०—वंशलोचन, वंशलोचन। बं०—बाँस काबर। म०—वंसलोचन। गु०—वंशकपूर, बाँसकपूर। क०—वंशलोचना, वंशरोचना, वंशरोचना। ते०—तवक्षीरी, तरक्षीरी, वंशलोचनमु। ता०—वंशलोचनम्। फा०—तवासीर, तवासीर। अ०— तवाशीर। अं०—Bamboo Manna (बाम्बू मन्ना)। ले०—Bambusa arundinacia Willd. (बाँबुजा अरूण्डिनेसिया)। Gramineae (ग्रॅमिनी); Syn. Poaceae । बाँस के वृक्ष भारतवर्ष के प्रायः सभी प्रान्तों में उत्पन्न होते हैं, विशेषकर बंगाल की तरफ इसकी खेती होती है। मोटे और दृढ़ बाँस के भीतर एवं बड़े मोटे पोली जाती के पहाड़ी बाँसों के भीतर जिसे नजला बाँस कहते हैं जब सफेद रस सूखकर कंकर के समान बन जाता है, तब इस सफेद कंकरी को वंशलोचन कहते हैं। यह केवल मादा जाति के ही बाँसों में जमता है। बाँसों को काटकर जब फाड़ते हैं तब किसी-किसी बाँस के भीतर से यह निकलता है। कहते हैं कि स्वाती नक्षत्र का जल बांस के भीतर पड़ने से उसमें वंशलोचन उत्पन्न होता है। असली वंशलोचन नीलापन युक्त सफेद रङ्ग का होता है, लकड़ी पर घिसने पर रेशा नहीं उभरता तथा जल में डालने पर पारदर्शक हो जाता है। लेकिन मिट्टी के तेल में डालने पर पारदर्शकता कम हो जाती है। स्वाद में यह फीका होता है। लेकिन आजकल बाजार में प्रायः नकली वंशलोचन ही बिकता है जो देखने में बहुत सुन्दर नीली आभा युक्त बड़े-बड़े कंकड़ों के रूप में होता है। पहले असली वंशलोचन जावा, सिङ्गापुर आदि से आता था। अब तो शायद किसी रासायनिक विधि से यह तैयार करके असली के नाम पर बिका करता है जिसका स्वाद कुछ तीक्ष्ण रहता है। वंशलोचन के अतिरिक्त बाँस के कोमल प्रांकुर, पत्र, गाँठ, बीज तथा मूल का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—वंशलोचन में सिलिका (Silica) ९०% या सिलिसिक् एसिड के हाइड्रेट के रूप में सिलिकम् (Silicum as hydrate of silicic acid), मंडूर (Peroxide of iron), पोटॅश (Potash), चूना, ॲल्युमिनिया (Aluminia) तथा कुछ वानस्पतिक पदार्थ जैसे कोलिन (Colin), बिटेन (Betain), न्यूक्लिएस (Nuclease), यूरिएस (Urease), प्रभुजिन एवं कार्बोज के पाचक किण्व तथा स्नेहविलेयक किण्व (Proteolytic, diastatic and emulsifying enzymes), तथा सायनोजेनिटक् ग्लूकोसाइड (Cyanogenetic glucoside) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। बाँस की राख में सिलिका २८, चूना ४, मॅग्नेशिया ६, पोटॅशियम् ३४, सोडियम् १२, क्लोरीन २, गंधक १० भाग और कुछ जल रहता है। कुछ लोग इसके क्षार को तथा असली वंशलोचन को गरम करके जल में डालते हैं और सूखने पर वंशलोचन के स्थान पर बेचते हैं।
हरीतक्यादिवर्गः २५९ गुण और प्रयोग-(१) वंशलोचन उत्तेजक, ज्वरहर, कफनिःसारक, बल्य, वृष्य, प्यासशमन करने वाला, उद्वेष्ठननिरोधि एवं ग्राही होता है। इससे श्वसनसंस्थान की श्लेष्मलकला को पुष्टि मिलती है तथा कफ की मात्रा कम होती है। इससे बने हुए सितोपलादि चूर्ण का व्यवहार जीर्णज्वर, श्वास, कास, क्षय, मन्दाग्नि, कमजोरी, कफ में खून जाना, दाह, पूयमेह, मूत्रदाह तथा वातविकार एवं सर्पदंश में किया जाता है। ग्राही औषधियों के साथ जीर्ण संग्रहणी तथा आन्तरिक रक्तस्रावों में इसका उपयोग करते हैं। (२) इसकी कोमल गाँठ तथा पत्रों का क्वाथ गर्भाशय संकोचक होता है। इसका उपयोग प्रसूता में आर्तवशुद्धि के लिए एवं अन्य आर्तव विकारों में किया जाता है। (३) इसके कोमलपत्र का उपयोग कफ से खून जाना, कुष्ठ, ज्वर तथा बच्चों के सूत्रकृमि में किया जाता है। (४) इसके प्रांकुर (Shoots) का रस निकाल कर कृमियुक्त घावों पर डाला जाता है तथा बाद में उसका पोल्टिस उन पर बाँध दिया जाता है। जिन लोगों का पाचन ठीक नहीं होता उनको इसके कोमल प्रांकुरों से बने सिरके का उपयोग मांस मछली के साथ उपयोगी होता है। इससे भूख बढ़ती है तथा पाचन भी ठीक होता है। (५) इसकी गाँठों को पीसकर जोड़ों के दर्द पर उसका बन्धन उपयोगी है। (६) इसके बीज को गरीब लोग चावल के रूप में खाते हैं। (७) इसका मूल विस्फोटक व्याधियों (Eruptive affections) में बहुत उपयोगी है तथा दाद पर लाभदायक है। इसके पुष्परस का उपयोग कर्णबिन्दु के रूप में कर्णशूल एवं बाधिर्य आदि में किया जाता है। मात्रा-चूर्ण ½-२ माशा। अथ समुद्रफेनस्य नामानि गुणांश्चाह समुद्रफेनः फेनश्च हिण्डीरोऽब्धिकफस्तथा ॥१९८॥ समुद्रफेनश्चक्षुष्यो लेखनः शीतलश्च सः। कषायो विषपित्तघ्नः कर्णरुक्कफहृत्सरः ॥१९९॥ समुद्रफेन के नाम तथा गुण-समुद्रफेन, फेन, हिण्डीर और अब्धिकफ ये सब नाम 'समुद्रफेन' के हैं। समुद्रफेन-नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, शीतल, कषाय रस युक्त, विष और पित्त का नाशक, कर्णरोग तथा कफ का भी नाशक और यह सारक भी होता है। [१९८-१९९] ४१. समुद्रफेन हिं०-समुद्रफेन, समुन्दरफेन, दर्या का कफ। बं०-समुद्रेर फेना, समुद्रफेला। म०-समुद्रफेण। मा०- समन्दरझाग, पं०-समुन्द्रझाग, समुद्रझाग। गु०-समुद्रफिण। क०-समुद्रनालिगे। मल०, ता०-कड़ल नीरे। ते०-सोरुपेनक, समुद्रपुनुरुगु। फा०-कफदरिया। अ०-जुबदुल्लहेरे, अब्दुल बहेर। अं०-Cuttle Fish Bone (कटिल फिश बोन); Os Sepiae (ऑस् सीपी)। ले०-Sepia officinalis (सेपिया ऑफिसिनॉलिस)। जाति- (Family)-Cephalopoda (सिफैलोपोडा)। वर्ग-(Class)-Mollusca (मोल्यूस्का)। समुद्रफेन यह समुद्र का झाग नहीं है वरन् यह एक समुद्री जीव (मछली) का अस्थिपञ्जर (या कवच) है जो कुछ समय बाद विशेष आकृति का हो जाता है और समुद्र के पानी पर तैरता रहता है। इसके टुकड़े १-३ इञ्च चौड़े और ५-१० इञ्च लम्बे होते हैं। ये लम्बे, चिपटे, आयताकार अथवा अण्डाकार, सफेदी लिये हुये, कठोर तथा भंगुर होते हैं। इसकी बाह्य सतह कई परतों से बनी दिखलाई देती है तथा सुचूर्ण्य होती है। भीतरी सतह कठोर, सुषिर एवं आसानी से टूटने वाली होती है। इसका स्वाद फीका, तीक्ष्ण तथा क्षारीय होता है। रासायनिक संगठन-इसमें कैल्शियम् कार्बोनेट (Calcium Carbonate) ८०-८५% तथा फास्फेट, सल्फेट और सिलिका (Silica) आदि पदार्थ रहते हैं।