भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ भावप्रकाशनिघण्टुः कर सकती। इससे गोल (Round) या कुछ लम्बे नन्हें-नन्हें कृमियों का नाश होता है। डिकेमाली का फांट नियत कालिक ज्वर में देने से कम्पन कम होता है। आन्त्र की विकृतियाँ जैसे आध्मान, कुपचन एवं शूल आदि में इससे लाभ होता है। बच्चों को दन्तोद्भव के समय जो पाखाना एवं वमन आदि विकार होते हैं उसमें इससे अच्छा लाभ होता है। आध्मान में एलुवा के साथ पेट पर इसका लेप करते हैं तथा डिकेमाली खिलाते हैं। इसके फल विरेचक तथा कृमिघ्न होते हैं। मोटापा तथा प्लीहावृद्धि में इसका गोंद व्यवहार किया जाता है। बाहरी प्रयोग से दूषित व्रण साफ किये जाते हैं। इससे कीड़े नहीं पड़ने पाते तथा पड़े हुए कीड़े निकल जाते हैं और मक्खियाँ नहीं बैठने पातीं। इससे दन्तशूल में लाभ होता है। नारू में इसे ६०० मि.ग्रा. की मात्रा में देते हैं। अतएव नाड़ीहिङ्गु शास्त्रीय 'विडङ्ग' कदापि नहीं हो सकती। मात्रा—चूर्ण ६०-२५० मि.ग्रा.। अथ तुम्बुरुफलस्य नामानि गुणाँश्चाह तुम्बुरुः सौरभः सौरो वनजः सानुजोऽन्धकः ।।११३।। तुम्बुरु प्रथितं तिक्तं कटुपाकेऽपि तत्कटु । रूक्षोष्णं दीपनं तीक्ष्णं रुच्यं लघु विदाहि च ।।११४।। वातश्लेष्माक्षिकर्णौष्ठशिरोरुग्गुरुताकृमीन् । कुष्ठशूलारुचिश्वासप्लीहकृच्छ्राणि नाशयेत् ।।११५।। 'तुम्बुरु' फल के नाम तथा गुण—तुम्बरु, सौरभ, सौर, वनज, सानुज और अन्धक ये नाम 'तुम्बुरु फल' के हैं। तुम्बुरु फल—तिक्त तथा कटुरस युक्त है और विपाक में भी कटुरस युक्त है। यह रूक्ष, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, तीक्ष्ण, रुचिजनक, पाक में लघु और विदाही होता है। यह वातश्लेष्म, नेत्र, कर्ण, ओष्ठ तथा शिर के रोगों को एवं गुरुता (शरीर का भारीपन), कृमि, कुष्ठ, शूल, अरुचि, श्वास, प्लीहा और मूत्रकृच्छ्र इन सभी रोगों को भी दूर करता है। [११३-११५] ३८. तुम्बुरु हिं०-तुम्बुरु, तुम्बुल, तेजफल। बं०-तम्बुल, तुम्बुरु फल, नेपाली धने, नेपाली धनियाँ। म०- नेपाली धनियाँ। मा०-तूगरू। क०-तुम्बरु। ते०-तुम्दुरुलु। पं०-तुम्बर। गु०-तुम्बुरुफल। लिपचा०-तंग्रु कंग। ले०-Zanthoxylum alatum Roxb. (झैन्थोक्साइलम् ॲलॅटम्); Zanthoxylum acanthopodium DC. (झैन्थोक्साइलम् एकैन्थोपोडियम) दूसरी जाति। Fam. Rutaceae (रूटॅसी)। यह हिमालय की गरम तराइयों में जम्मू से भूटान तक, खासिया पहाड़, टेहरी, गढ़वाल, नाग पहाड़, विजिगापट्टम और गंजाम के पहाड़ों पर पाया जाता है। इसका वृक्ष—झाड़ीदार या क्वचित् छोटे वृक्षवत् रहता है। काँटे—सीधे, १-२ से. मी. लंबे एवं अंडाकार आधार के ऊपर रहते हैं। पत्ते—संयुक्त लंबे पत्र दण्ड वाले एवं आधार की तरफ सपंख तथा गुलाबी एवं सीधे काँटों से युक्त होते हैं। पत्रक—५ से ११, भालाकार, न्यूनाधिक दन्तुर, ऊपर से चमकीले एवं नीचे से हल्के रंग के होते हैं। छोटे- छोटे पीले रंग के फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल—काली मरिच के समान झुमकों में रहते हैं, किन्तु उनके मुख फटे होते हैं। फलों में सुगन्ध आती है। इन फलों के ऊपर तेलिया राल की गाँठे होती हैं तथा इनके अन्दर कागज के समान परदा रहता है। फल प्रायः खाली रहते हैं किन्तु कभी-कभी उनके अन्दर गोल, काले चमकीले बीज रहते हैं। उत्तर हिन्दुस्तान में इसका व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में इसके स्थान पर ले०-झैँ. हेट्सा (Z. rhetsa DC.), हि०- चिरफल, तिरफल, के फल का व्यवहार किया जाता है जो तुंबुरु के फल से बड़े होते हैं। उन पर तेलिया राल की गाँठे तथा अन्दर कागज के समान परदा नहीं रहता। उनका स्वाद चटपटा अकरकरहा के समान एवं गन्ध संतरे के छिलके के समान होती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA