भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २५७ रासायनिक संगठन—इसकी छाल में एक कडुवा पदार्थ, उड़नशील तैल और राल रहती है। यह कडुवा पदार्थ दारुहरिद्रा में पाये जाने वाले बर्बेरीन (Berberine) के सदृश होता है। इसके फलों में एक उड़नशील तैल, राल, एक अम्ल पदार्थ और एक रवेदार पदार्थ झैंथ्योक्शाइलिन् (Xanthoxylin) पाया जाता है। यह तैल यूकैलिप्टस् (Eucalyptus) तैल के सदृश गन्ध एवं गुण वाला होता है। गुण और प्रयोग—यह सुगन्धित, उष्ण, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, ग्राही और उत्तेजक है। इसकी क्रिया गन्धबिरोजा तथा यूकैलिप्टस् तेल के समान होती है। इसके छाल की क्रिया दारुहरिद्रा के समान होती है। (१) ज्वर, कुपचन, अतिसार, हैजा एवं मंदाग्नि आदि में इसके मूलत्वक् और फल का फांट उत्तेजक तथा बल्य औषध के रूप में दिया जाता है। (२) दमे में इसका गुडाखू बनाकर धूम्रपान उपयोगी है। (३) गले की सूजन में इसके ताजे पत्तों को पीसकर चावल के आटे के साथ गरम करके बाँधने से लाभ होता है। (४) यह एक अच्छा प्रतिदूषक (Antiseptic) होने के कारण व्रणों के लिये इसके फलों का आन्तरिक तथा बाह्य प्रयोग किया जाता है। इसके मूलत्वक् क्वाथ से व्रण प्रक्षालन से लाभ होता है। (५) इसके फलों का व्यवहार दन्तशूल में किया जाता है। इसकी दातुन दाँतों के लिये अच्छी समझी जाती है एवं छाल तथा फल का दन्तमञ्जनों में प्रयोग किया जाता है। (६) इसका तैल प्रतिदूषक, कीटाणुनाशक तथा दुर्गन्धहर है। मात्रा—फल–२००-५०० मि.ग्रा., छाल–१०-२० ग्रा. फांट बनाकर। ३९. तिरफल सं०–तुंबरु। म०–चिरफल, तिसल। ते०–इरतचै। ता०–राचामम्। क०–जिसुमी मारा। ले०- Zanthoxylum rhetsa DC. (झैंथ्योक्साइलम् रेट्सा) । Fam. Rutaceae (रुटेंसी) । यह मध्यम ऊँचाई का कटीला वृक्ष दक्षिण में विशेषकर कोंकण में होता है। इसके पत्ते—सदलपर्ण एवं मोटी टहनियों के अग्र पर समूहबद्ध होकर रहते हैं। पत्रक—प्रायः १९-२५, तून के सदृश, आयताकार या प्रासवत्, अखण्ड या गोल दन्तुर धार वाले होते हैं। पुष्प—छोटे, पीले, गुच्छों के रूप में। फल—गुच्छों के रूप में, कच्ची अवस्था में हरे तथा बाद में काले से हो जाते हैं। अन्य वर्णन ऊपर तुम्बुरु के साथ दिया गया है। इसके फल तथा जड़ की छाल का प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—तुम्बुरु के समान तैल, राल आदि। गुण और प्रयोग—इसके गुण तुम्बरु के समान हैं। इसके मूलत्वक् की क्रिया दारुहरिद्रा, मझोरियून, चोबेहयात या पीतचम्पक के छाल की तरह होती है। इसकी जड़ सुगन्धित, कड़वी, मूत्रल तथा पौष्टिक है। (१) इसके फल उत्तेजक, ग्राही, दीपन एवं पाचन होते हैं और इनका व्यवहार, आध्मान, कुपचन, अजीर्ण एवं अतिसार आदि में किया जाता है। सड़ी हुई मछलियों के खाने से उत्पन्न अजीर्ण, वमन एवं अतिसार में इसका व्यवहार करते हैं। मछली खाने वालों के लिये यह पाचक है। तिरफल तथा अजवायन का अर्क हैजे में दिया जाता है। आमवात में मधु के साथ इसे खिलाते हैं। (२) मूलत्वक्—शिथिलताजन्य कुपचन में प्रयोग में लाई जाती है। यह मूत्रल होती है। दन्तशूल में तथा लकवा से जिह्वा का कार्य ठीक न होता हो तो इसे चबाने को देते हैं। जीर्ण आमवात में भी इससे लाभ होता है। यह वृष्य, कड़वी और सुगन्धित होती है और फल की तरह भी इसका उपयोग किया जाता है। २० भाव.I