भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 309

२५८ भावप्रकाशनिघण्टुः मात्रा—बीज निकाले हुए फल का चूर्ण—१२५-२५० मि.ग्रा. मधु के साथ; मूलत्वक् १०-२० ग्रा. फांट बनाकर नित्य एक बार। अथ वंशलोचनस्य नामानि गुणाँश्चाह स्याद्वंशरोचना वांशी तुगाक्षीरी तुगाशुभा । त्वक्क्षीरी वंशजा शुभ्रा वंशक्षीरी च वैणवी ॥११६॥ वंशजा बृंहणी वृष्या बल्या स्वादी च शीतला । तृष्णाकासज्वरश्वासक्षयपित्तास्रकामलाः ॥ हरेत्कुष्ठं व्रणं पाण्डुं कषाया वातकृच्छ्रजित् ।।११७।। वंशलोचन के नाम तथा गुण—वंशरोचना, वांशी, तुगाक्षीरी, तुगा, शुभा, त्वक्क्षीरी, वंशजा, शुभ्रा, वंशक्षीरी और वैणवी ये नाम वंशलोचन के हैं। वंशलोचन—बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), बलकारक, स्वादु, कषाय रसयुक्त और शीतल होता है और यह तृष्णा, कास, ज्वर, श्वास, क्षय, रक्तपित्त, कामला, कुष्ठ, व्रण, पाण्डु, वात तथा मूत्रकृच्छ्र को दूर करता है। [११६-११७] ४०. वंशलोचन हिं०—वंशलोचन, वंशलोचन। बं०—बाँस काबर। म०—वंसलोचन। गु०—वंशकपूर, बाँसकपूर। क०—वंशलोचना, वंशरोचना, वंशरोचना। ते०—तवक्षीरी, तरक्षीरी, वंशलोचनमु। ता०—वंशलोचनम्। फा०—तवासीर, तवासीर। अ०— तवाशीर। अं०—Bamboo Manna (बाम्बू मन्ना)। ले०—Bambusa arundinacia Willd. (बाँबुजा अरूण्डिनेसिया)। Gramineae (ग्रॅमिनी); Syn. Poaceae । बाँस के वृक्ष भारतवर्ष के प्रायः सभी प्रान्तों में उत्पन्न होते हैं, विशेषकर बंगाल की तरफ इसकी खेती होती है। मोटे और दृढ़ बाँस के भीतर एवं बड़े मोटे पोली जाती के पहाड़ी बाँसों के भीतर जिसे नजला बाँस कहते हैं जब सफेद रस सूखकर कंकर के समान बन जाता है, तब इस सफेद कंकरी को वंशलोचन कहते हैं। यह केवल मादा जाति के ही बाँसों में जमता है। बाँसों को काटकर जब फाड़ते हैं तब किसी-किसी बाँस के भीतर से यह निकलता है। कहते हैं कि स्वाती नक्षत्र का जल बांस के भीतर पड़ने से उसमें वंशलोचन उत्पन्न होता है। असली वंशलोचन नीलापन युक्त सफेद रङ्ग का होता है, लकड़ी पर घिसने पर रेशा नहीं उभरता तथा जल में डालने पर पारदर्शक हो जाता है। लेकिन मिट्टी के तेल में डालने पर पारदर्शकता कम हो जाती है। स्वाद में यह फीका होता है। लेकिन आजकल बाजार में प्रायः नकली वंशलोचन ही बिकता है जो देखने में बहुत सुन्दर नीली आभा युक्त बड़े-बड़े कंकड़ों के रूप में होता है। पहले असली वंशलोचन जावा, सिङ्गापुर आदि से आता था। अब तो शायद किसी रासायनिक विधि से यह तैयार करके असली के नाम पर बिका करता है जिसका स्वाद कुछ तीक्ष्ण रहता है। वंशलोचन के अतिरिक्त बाँस के कोमल प्रांकुर, पत्र, गाँठ, बीज तथा मूल का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—वंशलोचन में सिलिका (Silica) ९०% या सिलिसिक् एसिड के हाइड्रेट के रूप में सिलिकम् (Silicum as hydrate of silicic acid), मंडूर (Peroxide of iron), पोटॅश (Potash), चूना, ॲल्युमिनिया (Aluminia) तथा कुछ वानस्पतिक पदार्थ जैसे कोलिन (Colin), बिटेन (Betain), न्यूक्लिएस (Nuclease), यूरिएस (Urease), प्रभुजिन एवं कार्बोज के पाचक किण्व तथा स्नेहविलेयक किण्व (Proteolytic, diastatic and emulsifying enzymes), तथा सायनोजेनिटक् ग्लूकोसाइड (Cyanogenetic glucoside) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। बाँस की राख में सिलिका २८, चूना ४, मॅग्नेशिया ६, पोटॅशियम् ३४, सोडियम् १२, क्लोरीन २, गंधक १० भाग और कुछ जल रहता है। कुछ लोग इसके क्षार को तथा असली वंशलोचन को गरम करके जल में डालते हैं और सूखने पर वंशलोचन के स्थान पर बेचते हैं।