भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः २५५ विशेष—एक अन्य मिरसीन अफ्रिकाना (Myrsine africana Linn.) के फलों को भी कहीं-कहीं विडंग कहा जाता है, किन्तु इसमें शास्त्रोक्त गुण नहीं हैं। ३७. नाड़ी हिङ्गु (डिकामाली) नाडीहिङ्गु पलाशाख्या जन्तुका रामठी च सा । वंशपत्री च पिण्डाह्वा सुवीर्य्या हिङ्गुनाडिका ।। (रा.नि.) सं०-नाडीहिङ्गु, पलाशाख्या, जन्तुका, रामठी, वंशपत्री, पिण्डाह्वा, सुवीर्य्या, हिङ्गुनाडिका। हिं०- नाड़ीहिङ्गु, नारीहींग, कलपतीहींग, डिकामाली, डिकेमाली, कमरी। बं०-हिंगुविशेष। म०-डिकेमाली। गु०-डीकामारी। काठी. मालण, मालडी। क०-डिक्कामल्लि। ता०-कुंवै। ते०-गेरिविक्कि, करिगा, तेल्लामंगा। अ०-कनखाम। अं०- Gummy Gardenia (गम्मी गार्डेनीया); Cambi resin (कॅम्बी रेसिन)। ले०-Gardenia gummifera Linn. (गार्डेनिया गम्भीफेरा)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। इसके वृक्ष अधिकतर दक्षिण भारत में पाये जाते हैं। इसका वृक्ष—छोटा तथा झाड़दार होता है। पत्ते—विनाल, ४.५-७ x २-२.५ से.मी. बड़े, दीर्घवृत्ताभ, आयताकार, स्वरूप में कुछ अमरूद के पत्तों के समान तथा चिकने, चमकीले होते हैं। फूल—सुगंधहीन, प्रारंभ में श्वेत किन्तु बाद में पीतवर्ण के १ से ३ साथ-साथ रहते हैं। फल—२.५-३.८ से. मी., आयताकार या दीर्घवृत्ताभ, चिकना, लंबाई में धारीदार एवं नोकदार होता है। इन पौधों की कोमल शाखाओं के बीच तथा कलियों में से जाड़े के दिनों में हरियाली लिए हुए किञ्चित् पीले रंग का गोंद निकलता है। उसी को 'डीकामाली' कहते हैं। इसकी छाल से गोंद नहीं निकलता। जंगली गोंड लोग ठीकरों में इकट्ठा कर सुखा करके बाजार में बेचते हैं। इस गोंद में छोटी- छोटी लकड़ियां, फूस-घास आदि मिली रहती है अतएव इसे गरम जल में घोल, छान एवं सुखा करके औषधि के काम में लेना चाहिये। शुद्ध डिकामाली में बिलार के मूत्र जैसी गन्ध आती है तथा वह कुछ आर्द्र एवं चमकीला रहता है और उसके चूर्ण बनाने में कठिनाई होती है। गुण--नाडीहिङ्गु कटूष्णं च कफवातार्त्तिशान्तिकृत् । विष्ठाविबन्धदोषघ्नमानाहामयहारि च ।। रा. नि. नाड़ीहिंगु—कटु, उष्ण, कफ और वात की पीड़ा को शमन करने वाली तथा विष्ठा विबन्ध और आनाह रोग को नष्ट करने वाली है। नाडीहिङ्गुस्तु कटुकस्तीक्ष्णश्चोष्णश्च दीपकः । कफवातमलस्तम्भमनोमोहामनाशनः ।। निघण्टुरत्नाकरः नाड़ीहिंगु—कटु, तीक्ष्ण, उष्ण, अग्निप्रदीपक तथा कफ, वात, मलबन्ध, मन का मोह और आम का नाश करने वाली है। रासायनिक संगठन—इसमें दो प्रकार के राल के सदृश पदार्थ रहते हैं जिसमें से गार्डेनिन् (Gardenin) रवेदार सुनहले पीले रंग का तथा दूसरा डिकेनाली (Dikenali) कुछ मुलायम तथा हरे रंग का होता है। गुण और प्रयोग—यह उद्वेष्ठन निरोधि, वातानुलोमक, अग्निदीपक, विरेचक, कृमिघ्न, ज्वरहर, स्वेदजनन, श्लेष्मनिःसारक, त्वक् दोषहर एवं प्रतिदूषक है। गुणों में वायविडङ्ग और डिकामाली बहुत समानता रखते हैं। किन्तु शास्त्रों में विडङ्ग को कृमिघ्न लिखा है और डिकामाली के विषय में उसकी कृमिघ्नता के गुण का स्पष्टीकरण नहीं किया है। आधुनिक शोध द्वारा सिद्ध हुआ है कि डिकामाली भी विशेष कृमिघ्न है। नाड़ीहिङ्गु के प्रयोग से कोष्ठान्तर्गत वर्तुलाकार कृमि नष्ट या निर्जीव हो जाते हैं। वायविडङ्ग—विशेष रूप से पक्वाशय के लम्बे चिपटे कृमियों का विनाशक है। डिकामाली-इन कृमियों का नाश नहीं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA