भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 305, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ भावप्रकाशनिघण्टुः (३) बालकों के सभी रोगों की यह अच्छी औषधि है। सुखण्डी, आध्मान, शूल, कुपचन एवं अग्निमांद्य आदि में दूध में इसको डालकर उबालते हैं और वही दूध पिलाते हैं। इससे बच्चे तन्दुरुस्त रहते हैं। यदि इसके साथ अनन्तमूल भी दिया जाय तो अधिक लाभ होता है। (४) गण्डमाला के लिये-वायविडङ्ग, गुग्गुलु, मनःशिला तथा शृङ्गभस्म, मधु और घृत के साथ देने से धीरे-धीरे लाभ होता है। (५) चर्म रोगों में इसका आन्तरिक एवं बाह्य प्रयोग किया जाता है। दाद में इसके लेप से लाभ होता है। (६) मज्जातन्तु के रोग जैसे अर्धांगघात, आक्षेप एवं अपस्मार आदि में लहसुन के साथ दूध में उबालकर देना चाहिये। (७) पीनस, शिरःशूल तथा अर्धावभेदक में इससे सिद्ध तैल के नस्य से लाभ होता है। शिरःशूल में कपाल पर इसकी मालिश करनी चाहिये। (८) बिच्छू के काटने तथा सर्प दंश पर इसका उपयोग लिखा गया है। (९) इसका ताजा रस शीतल, मूत्रल तथा आनुलोमिक होता है। मात्रा—चूर्ण ४ से १६ ग्रा.। ३६. विडङ्ग भेद सं०-विडङ्गभेद। हिं०-वायविडङ्ग भेद, वायविभाङ्ग। अवध०-बेबरङ्ग। देहरादून०-वायविरङ्ग, गैया। गोंड०- कोपडल्ली। कुरकु०-भारङ्गेली। मु०-आमटी, गोंदली, बार्बटी। ने०-कलय बोगोटी। अं०-Basal (बासल)। ले०-E. tsjeriam-cottam A. DC. (ए. त्स्जेरियम-कोट्टम ए. डीसी.)। Fam. Myrsinaceae (मिरसिनेंसी)। यह हिमालय पहाड़ के पूर्व की ओर बङ्गाल तथा दक्षिण की ओर सिलोन तक कहीं न कहीं पाया जाता है। इसके वृक्ष—छोटे और बहुत झाड़दार होते हैं। पत्ते कुछ अधिक बड़े होते हैं तथा शिराएँ कुछ मुरचई रोमावरण से युक्त होती हैं। फूल—हरियाली लिये सफेद रंग या हरापन युक्त फीके पीले रंग के बहुत छोटे-छोटे आते हैं। फल— छोटे-छोटे गोल होते हैं और लंबाई में महीन धारीदार होते हैं। गुण और प्रयोग—यह वातानुलोमक, कृमिघ्न, अर्शोघ्न, शोथप्रतीकारक और रसायन है। इसका उपयोग विडङ्ग के समान किया जाता है। बाजार में दोनों ही जाति के फल मिले हुये रहते हैं। (१) वह भी विडङ्ग के समान विशेषरूप से स्फीतकृमि नाशक होता है। (२) गण्डमाला में अनन्तमूल के साथ इसका क्वाथ पिलाते हैं तथा ठण्डे जल में पीसकर गाँठों पर लेप करते हैं। (३) दन्तशूल में इसका चूर्ण हींग के साथ दाँत के गड्ढे में रखने से लाभ होता है तथा इसका मञ्जन में व्यवहार करते हैं। इसके मूल की छाल का भी इसमें उपयोग होता है। (४) इसके कोमल पत्तों का सोंठ के साथ क्वाथ बनाकर गले की सूजन, मुख के छाले एवं व्रण में कवल कराने से लाभ होता है। (५) न्यूमोनिया तथा अन्य छाती के विकारों में चावल की माँड़ के साथ इसकी छाल को उबाल- कर पिलाते हैं तथा छाल पीसकर छाती पर लेप करते हैं। इसके फलों को पीसकर मक्खन के साथ छाती पर लगाने से फुप्फुसावरण शोथ में लाभ होता है तथा शिरःशूल में भी इसी प्रकार कपाल में इसका लेप करते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA