भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २४३ चार वर्ष का वृक्ष होने पर इसको काटते हैं और भूमि के पास वाली जड़ को तिरछे तराशने से जो रस निकल कर सूख जाता है उसको दो दिन के बाद खुरच कर संग्रह कर लेते हैं। फिर दो दिन के बाद जड़ को उसी प्रकार ऊपर से तराश कर छोड़ देते हैं और सूखने पर खुरच कर इकट्ठा कर लेते हैं। यही सूखा हुआ पदार्थ हींग है। प्रत्येक वृक्ष से २-३ छटांक से ५-६ छटांक तक हींग मिल सकती है। देशी हींग की अपेक्षा काबुली हींग अच्छी होती है। साधारण परीक्षा-(१) जल के साथ घोटने से इसका पीताभ दुधिया घोल बनता है जो क्षार मिलाने पर हरिताभ पीत हो जाता है। (२) थोड़े से हींग को गन्धक के तेजाब के साथ गरम करने पर लाल से भूरे रंग का घोल बनता है। इस घोल को अधिक जल से विरल बनाकर (Dilute), छानकर (filtering) उसको क्षारीय करने से एक गाढ़े नीले रंग की चमक उत्पन्न होती है (Purplish-blue fluorescence) । मिलावटें-हींग में कङ्कड़, बालू, मिट्टी, मूल के टुकड़े, गोदन्ती तथा गोंद आदि मिलाये रहते हैं। रासायनिक संगठन-यह गन्धक का सेन्द्रिय योग है। इसमें लहसुन में पाये जाने वाला एक उड़नशील तैल ६-१७% रहता है। इस तैल में टरपेन्स् (Terpenes), डाइ-सल्फाइड्स (Disulphides, C₇H₁₄S₂ and C₁₁H₂₀S₂) और एक नीले रंग का तरल पदार्थ (C₁₀H₁₆O)n रहता है। इसमें राल रहती है जिसमें अॅसारेसिनोटेनॉल (Asaresino-tannol) ॲसारेसिनोल फेरूलिक् एसिड इस्टर (Asaresinol ferulic acid ester) तथा फ्री फेरूलिक् एसिड (Free ferulic acid-1.3%) रहता है। इसके अतिरिक्त इसमें गोंद की मात्रा २५% रहती है। शुद्ध हींग में ६५-७५% मद्यसार में घुलने वाले पदार्थ रहते हैं तथा राख ३-५% रहती है। इसकी राल का ऊर्ध्व पातन (Dry distillation) करने से अंबेलि-फेरोन् (Umbelliferone) प्राप्त होता है लेकिन भारतीय जाति से यह प्राप्त नहीं होता। गुण और प्रयोग-हींग दीपन, पाचन, वातानुलोमक, उद्वेष्टन निरोधि, उत्तेजक, कफदुर्गन्धि हर, कफनिःसारक, वातनाडियों के लिये बल्य, गर्भाशयसंकोचक एवं कृमिघ्न है। इसका उत्सर्ग फुफ्फुस, त्वचा, मूत्र तथा पसीने के द्वारा होता है। इसका उपयोग आध्मान, शूल, अपस्मार, अपतन्त्रक, वातविकार, श्वास, कास, कुकास एवं हृच्छूल आदि में किया जाता है। हींग को घृत में भूनकर व्यवहार में लाया जाता है जिससे वमन नहीं होने पाता। (१) फुफ्फुस के रोगों में हींग का अच्छा उपयोग होता है। जीर्ण श्वास नलिका शोथ, दमा, कुकास, बच्चों के फुफ्फुसपाक एवं शुष्क कास आदि में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके लिये जल के साथ हींग के घोल का व्यवहार करना चाहिये। (२) आध्मान, शूल, विबन्ध एवं आमाशय तथा आन्त्र की शिथिलता में अजवाइन अथवा एलुवा और साबुन के साथ गोली बनाकर दिया जाता है। ऐसे विकारों में हिंग्वाष्टक चूर्ण अथवा हिंगुकर्पूरवटी का बहुत व्यवहार किया जाता है। (३) विषमज्वर में प्रतिबन्धन की दृष्टि से अन्न के साथ हींग का व्यवहार किया जाता है। (४) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं तज्जन्य अन्य विकारों में इसका बहुत अच्छा उपयोग होता है। (५) प्रसव के बाद इसके उपयोग से आर्तव शुद्धि होती है। बार-बार होने वाले गर्भपात को रोकने के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। गर्भ रहते ही ६ माशे हींग की ६० गोलियाँ बनाकर प्रारम्भ में १ गोली दिन में दो बार देते हैं। बाद में धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ाते हुये १० गोली प्रतिदिन देते हैं और फिर प्रसव तक धीरे-धीरे इसकी मात्रा कम करते हैं।