भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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२४४ भावप्रकाशनिघण्टुः (६) आध्मान, शूल एवं आक्षेप आदि में २-३ माशा हींग जल के साथ घोटकर उसकी बस्ति दी जाती है। इससे सूत्र कृमि में भी लाभ होता है। (७) सीलोन में नारियल के दूध में हींग को उबालकर सर्पदंश के स्थान पर लगाते हैं तथा पानी में इसको घोलकर नाक में भी टपकाते हैं। बिच्छू के काटने पर भी इसको लगाने से लाभ होता है। (८) बच्चों के पेट फूलने पर इसका लेप पेट पर लगाते हैं तथा कुकास में छाती पर लेप करने से लाभ होता है। नारू तथा दाद पर इसको लगाने से लाभ होता है। (९) हींग तथा अफीम की गोली दाँत के दर्द में दाँत के गढ़े में रखने से लाभ होता है। (१०) हींग, लहसुन तथा सैंधव आदि पदार्थों से सिद्ध तैल कर्णरोगों में बहुत उपयोगी है। इसको १/२-१ चम्मच दूध के साथ दिन में ३, ४ बार या सुबह ४ चम्मच एक साथ ही दूध और मिश्री के साथ पिलाते हैं एवं इसको गर्म करके कान में ३, ४ बूँद डालते हैं। यह तैल बहुत अच्छा प्रतिदूषक (Antiseptic) है एवं इसका अन्तर्बाह्य प्रयोग उपयोगी है। मात्रा-२-८ रत्ती। अथ वचाया नामानि गुणाँश्चाह वचोग्रगन्धा षड्ग्रन्था गोलोमी शतपर्विका। क्षुद्रपत्री च मङ्गल्या जटिलोग्रा च लोमशा ।।१०२।। वचोग्रगन्धा कटुका तिक्तोष्णा वान्तिवह्निकृत्। विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी ।। अपस्मारकफोन्मादभूतजन्त्वनिलान्हरेत् ।।१०३।। वच के नाम तथा गुण-वचा, उग्रगन्धा, षड्ग्रन्था, गोलोमी, शतपर्विका, क्षुद्रपत्री, मङ्गल्या, जटिला, उग्रा और लोमशाा ये सब नाम वच के हैं। वच-उग्रगन्ध युक्त, तिक्त तथा कटुरस वाली, उष्णवीर्य, वमनकारक, अग्निजनक, विबन्ध, आध्मान और शूल को नष्ट करने वाली एवं मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है। एवम् मिर्गी, कफ, उन्माद, भूतबाधा, कृमि तथा वायु को भी दूर करने वाली होती है। [१०२-१०३] २९. वच हिं०-वच, घोरवच, घोड़वच। बं०-वच। म०-वेखण्ड। ते०-वासा, वस। गु०-वज, घोड़ावज। क०- बजे। ता०-वशाम्बु। मला०-व्ययम्पु। गोमा०-वेखण्ड। पं०-बरि बोज। फा०-सोसन जर्द, अगरि तुर्की। अ०-उदल बुज, अकरुन, बज, बिज। यू०-अकुरुन्। अं०-Sweet Flag (स्वीट फ्लैग)। ले०-Acorus calamus, Linn. (एकोरस् कैलॅमस्, लिन.)। Fam. Araceae (एरेसी)। एशिया खण्ड का मध्य भाग तथा पूर्वी यूरोप वच का उत्पत्ति स्थान माना जाता है। मणीपुर, नागा पहाड़, काश्मीर, सिरमूर और युक्त प्रान्त के कितने ही देशों के दलदल और सजल स्थान, में यह उत्पन्न होती है। यह गुल्म जाति की वनौषधि ३-४ हाथ ऊँची होती है। इसकी जड़-अन्य पौधों की जड़ की तरह सीधी नहीं रहती बल्कि बहुत सी जटा के सदृश जड़ की शाखायें चारों ओर फैली हुई रहती हैं और इसकी मुटाई मध्यमा उँगली के समान होती है। प्रत्येक गाँठ के चारो ओर सघन रोवें से होते हैं। इसके पत्ते-लम्बे, पतले और तलवार के समान रहते हैं। मंजरियाँ-सघन, विदाण्डिक, २-४ इञ्च लम्बी, लम्ब गोल और ६-१८ इञ्च लम्बे पत्रकोशों से ढकी रहती हैं। वच के पौधों के सर्वाङ्ग में गन्ध आती है और इसकी जड़ में यह अत्यधिक होती है। मूलस्तम्भ तथा राइजोम (Rhizome) को टुकड़े-टुकड़े कर बाजार में बेचते हैं। ये भूरे रङ्ग के और सुगन्धित होते हैं जिनके निचले हिस्से पर मूल के निशान रहते हैं तथा ऊपर के भाग में लम्बी गढ़ेदार धारियाँ होती हैं।