भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २४५ बाजार में वच के नाम से प्रायः कुलिंजन (Alpinia galanga) की जड़ बेची जाती है। इसीलिये जहाँ वचा (Acorus calamus) की आवश्यकता हो वहाँ घोरवच नाम से ही औषधि खरीदनी चाहिये। वच के स्थान पर आंतरिक प्रयोग में बालवच का प्रयोग भी शास्त्रोक्त नहीं है न उचित ही है। रासायनिक संगठन- इसमें एक सुगन्धित उड़नशील पीले रङ्ग का तैल १.५-३.५%, एकोरिन (Acoria) नामक मधु के समान पतला तिक्त सुगन्धि ग्लूकोसाइड, एकोरेटिन (Acoretin) नामक राल सदृश पदार्थ, कैलामेन (Calamene) नामक रवेदार, क्षाराभ तथा स्टार्च, गोंद, टैनिन् एवं कॅल्शियम् ऑक्सैलेट (Calcium oxalate) आदि पदार्थ रहते हैं। इसके उड़नशील तैल में अॅसारिल् ऑल्डिहाइड् (Asaryl-aldehyde), अॅल्फापिनिन (a- pinene) एवं कैफीन् (Camphene) आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग-वच वामक, कफनिःसारक, हल्लासकर, उद्वेष्टन निरोधि, वातानुलोमक, दीपन, पाचन, मेध्य, वृष्य, कृमिघ्न एवं सुगन्धित है। अधिक मात्रा में देने से यह वामक है। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतंत्रक, श्वास, कास, कण्ठरोग, जीर्ण अतिसार, संग्रहणी, आध्मान, शूल, मन्दज्वर, विषमज्वर, कर्णमूल, ग्रन्थिशोथ एवं अश्मरी आदि रोगों में किया जाता है। (१) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं अंगघात आदि रोगों के लिये यह बहुत अच्छी औषधि है। इसके सेवन से धारणाशक्ति (मेधा) बढ़ती है। इसके लिये वच को मधु अथवा दूध के साथ अधिक दिन तक सेवन करना चाहिये। ब्राह्मी, शंखपुष्पी तथा वच तीनों समान मात्रा में लेकर इसके चूर्ण को ब्राह्मी के रस की ३ भावनाएं देनी चाहिये। इसको अथवा सारस्वत चूर्ण को १/२ से १ माशा मधु एवं घृत के साथ कुछ दिन लेने से उन्माद, स्मरणशक्ति का ह्रास एवं वाणी की जड़ता आदि दूर होकर बुद्धि का विकास होता है। बेहोशी दूर करने के लिये अन्य औषधियों के साथ इसका अच्छा उपयोग होता है। (२) यह अधिक मात्रा (१ से २ माशा) में वामक है तथा खाँसी और श्वास में वमन कराने के लिये इसको नमक और गरम जल से पिलाना चाहिये। इससे बिना किसी कष्ट के कफ निकल जाता है। यह इपिकाक की अपेक्षा अधिक अच्छी औषधि है। सरदी, गले की सूजन, खाँसी तथा बच्चों के सूक्ष्म श्वसनिका शोथ में इसका क्वाथ बहुत उपयोगी होता है। सूखी खाँसी में इसका टुकड़ा मुख में रखने से लाभ होता है। (३) इसमें रहने वाले टॅनिन के कारण इसका उपयोग जीर्ण अतिसार एवं संग्रहणी आदि में किया जाता है। इसके सेवन से आध्मान एवं शूल दूर होता है तथा पाचन सुधर कर भूख बढ़ती है। बच्चों के लिए इसको भूनकर देना चाहिए। यह कृमि तथा पथरी में भी लाभदायक है। दंतोद्भेद के समय इसकी चबाने को बच्चों को देते हैं। (४) मलेरिया आदि विषमज्वरों में अन्य औषधियों के साथ इसके उपयोग से अधिक लाभ होता है। (५) जयपाल के विष को दूर करने के लिए इसको भूनकर जल के साथ पिलाना चाहिये। (६) अर्श में भांग और अजवाइन के साथ इसकी धूनी देने से दर्द दूर होता है। (७) इसका बाह्य प्रयोग अंगघात, आमवात, संधिपीड़ा, आध्मान्, शूल तथा खाँसी और श्वास में उपयोगी है। (८) मक्खी एवं दीमक आदि कीटों का नाश करने के लिए इसका उपयोग होता है। मात्रा-वामक-१ से २ माशा; अन्य गुणों के लिए २-४ र०। अधिक मात्रा में शिरःशूल होता है। दर्पनाशक- सौंफ। अथ पारसीक (खुरासानी) वचाया नामानि गुणाँश्चाह पारसीकवचा शुक्ला प्रोक्ता हैमवतीति सा। हैमवत्युदिता तद्वद्वातं हन्ति विशेषतः ।।१०४।।