भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ भावप्रकाशनिघण्टुः (५) इसके पत्र मूत्रल तथा उत्तेजक होते हैं एवं इनका सलाद प्रशीताद (Scurvy = स्कर्वी) नामक रोग में व्यवहार में लाया जाता है। (६) इसकी जड़ का व्यवहार फिरङ्ग तथा निस्तानिका (Tenesmus = टेनेस्मस्) में किया जाता है। मात्रा—१/४-१ तो०। अथ चतुर्बीजगुणानाह मेथिका चन्द्रशूरश्च कालाऽजाजी यवानिका। एतच्चतुष्टयं युक्तं चतुर्बीजमिति स्मृतम् ।।९८।। तच्चूर्णं भक्षितं नित्यं निहन्ति पवनामयम् । अजीर्णं शूलमाध्मानं पार्श्वशूलं कटिव्यथाम् ।।९९।। 'चतुर्बीज' (चारदाना) के गुण—मेथी, चनसुर, मंगरैला और अजवाइन इन चारों के बीजों के योग को 'चतुर्बीज' (चारदाना) कहते हैं और इस चतुर्बीज और कमर का दर्द दूर होता है। [९८-९९] अथ हिंगुनामगुणानाह सहस्रवेधि जतुकं बाह्लीकं हिङ्गु रामठम् ।।१००।। हिङ्गूष्णं पाचनं रुच्यं तीक्ष्णं वातवलासनुत्¹। शूलगुल्मोदरानाहकृमिघ्नं पित्तवर्द्धनम् ।।१०१।। हींग के नाम तथा गुण—सहस्रवेधि, जतुक, बाह्लीक, हिङ्गु और रामठ ये सब नाम हींग के हैं। हींग उष्णवीर्य, पाचक, रुचिकारक, तीक्ष्ण, वात-श्लेष्म को दूर करने वाला, शूल, गुल्म, उदर सम्बन्धी रोग, आनाह (अफरा) और कृमियों को नष्ट करनेवाला एवम् पित्त को बढ़ाने वाला होता है। [१००-१०१] २८. हींग हिं०—हींग। बं०—हिंगु। पं०—हिंगे, हींग। म०—हिंग। मा०—हींग। गु०—हिंगड़ो, वधारणी, हिंग बघारणी। ते०—इङ्गुव, इंगुर, इंगुरा। ता०—पेरुंगियम्, पेरुंग्यम्। क०—हिंगु। फा०—अंगूजह, अंगुजा, अंघुजेह-इलरी। अ०— हिल तीत्, हिलतीस। अं०—Asafoetida (असेफीटिडा)। ले०—Ferula narthex, Boiss. (फेरुला नार्थेक्स, बॉ यस); F. alliacea Boiss. (फे, एलिएंसिआ); Ferula foetida Regel (फेरुला फीटिडा)। Fam— Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। हींग सर्व प्रसिद्ध वस्तु एक विदेशीय वृक्ष का निर्यास है। इसकी उपर्युक्त कई जातियाँ विभिन्न स्थानों पर होती हैं जिनसे कुछ-कुछ भिन्न प्रकार का निर्यास प्राप्त किया जाता है। अधिकांश मिलावटी हींग बिकती है। इनमें चोखी हींग, हीरा हींग, तलाव हींग इत्यादि अच्छी समझी जाती हैं। जो हींग रूमी मस्तगी के समान वर्ण वाली, गरम घी में डालने से लावा के समान खिल जाने वाली तथा लालिमा लिये भूरे या बादामी रंग की वह अच्छी मानी जाती है। उत्तम हींग की डली को तोड़ने से वह भाग बादामी रंग का दिखाई पड़ता है। इसका स्वाद कड़वा और लहसुन के समान खराशदार तथा इसकी गन्ध लहसुन के समान तीव्र होती है। पानी में घोलने से सफेद रंग की दिखाई पड़ती है। हींग के वृक्ष काबुल, हिरात, खुरासान, फारस एवं अफगानिस्तान आदि प्रदेशों में उत्पन्न होते हैं तथा इस देश के पंजाब और काश्मीर में कहीं-कहीं देखने में आते हैं। विभिन्न जातियों में थोड़ा बहुत स्वरूप में अंतर होता है। इसका वृक्ष—झाड़ के समान छोटा ५ से ८-९ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते—अनेक भागों में विभक्त, अजमोदे के पत्तों के समान कटे किनारे वाले एवं १-२ फूट लम्बे होते हैं तथा टहनियों के अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल—तिहाई से तीन चौथाई इञ्च के घेरे में अण्डाकार होते हैं। १. 'हृदि'ति पा०।