भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः २४१ अथ चन्द्रशूरस्य नामानि गुणाँश्चाह चन्द्रिका चर्महन्त्री च पशुमेहनकारिका१। नन्दिनी कारवी भद्रा २वासपुष्पा सुवासरा ।।९६।। चन्द्रशूरं हितं हिक्कावातश्लेष्मातिसारिणाम्। असृग्वातगदद्वेषि बलपुष्टिविवर्द्धनम् ।।९७।। चनसूर के नाम तथा गुण-चन्द्रिका, चर्महन्त्री, पशुमेहनकारिका, नन्दिनी, कारवी, भद्रा, वासपुष्पा और सुवासरा ये नाम चनसूर के हैं। चनसूर-हिचकी, वात-श्लेष्मा और अतिसार ग्रस्त रोगी तथा रक्तवातग्रस्त रोगियों के लिए हितकर है और बल तथा पुष्टिवर्धक भी है। [९६-९७] २७. चन्द्रिका (हालों) हिं०-हालों, हालिम, चनसुर, चन्द्रशूर। बं०-हालिम, हालिमा, हालो, चान्दसूर, अलेवेरी। म०-आलीव, हालिम, अहालीव। गु०-अशेलीओ, अशोरिया, आशाल बीज। यू०-तरम राह के बीज। फा०-तुख्म तरह तेजक। अ०-वातरुज्जरजीर। कुमा०-हालिम। ता०-अलिविरइ। ते०-अदित यलु। पं०-तेजक। सि०-अहेरो। क०- अल्लिबीज। अं०-Common Cress (कॉमनक्रेस)। ले०-Lepidium sativum Linn. (लेपिडियम् सेटिवम्) Fam. Cruciferae (क्रुसिफेरी)। यह सब प्रान्तों में बोया जाता है। इसका क्षुप-१ से ३ फीट ऊँचा, मसृण या कुछ रोएंदार होता है। पत्ते- विभक्त होते हैं। पुष्प-सफेद तथा छोटे होते हैं। फल-०.२ इञ्च, चिपटे, अण्डाकार परन्तु अग्र पर भीतर की तरफ दबे हुये रहते हैं। बीज-छोटे, लाल तथा जल में डालने पर लुआबदार होते हैं। अधिकतर इसके बीजों का उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में एक सुगन्धि उड़नशील तथा स्थिर तैल पाया जाता है। इसमें आयोडीन (Iodine), लोह, फॉस्फेट्स (Phosphates), पोटैश (Potash), कुछ लवण, एक तिक्त सत्व एवं जल आदि पदार्थ रहते हैं तथा गन्धक अधिक मात्रा में रहता है। इसके ग्लूकोसाइड (Glucoside) को ग्लूकोट्रोपोइओलियन (Glucotro-poeolin) कहते हैं। गुण और प्रयोग- चनसुर रसायन, बल्य, वाजीकर, उत्तेजक, आनुलोमिक, दुग्धवर्धक एवं शूलहर है। इसका उपयोग प्रसूतावस्था, रक्तदोष, त्वचा के रोग, नेत्र रोग, यकृत और प्लीहा की जीर्ण वृद्धि, ग्रन्थिरोग, रक्तार्श, श्वास, कास एवं अतिसार आदि में किया जाता है। (१) इसके फांट का व्यवहार आमाशय के प्रक्षोभ से उत्पन्न हिक्का में किया जाता है। इसको बार-बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पिलाना चाहिये। इसी प्रकार प्रक्षोभजन्य अतिसार एवं ग्रहणी में भी इससे लाभ होता है। (२) गरी के साथ इसकी बर्फी या दूध में लप्सी बनाकर प्रसूता को दिया जाता है। यह रसायन, पौष्टिक तथा दुग्धवर्धक है। इससे कटिशूल एवं श्वेतप्रदर में भी लाभ होता है। दूध में उबाल कर गर्भपात कराने के लिए प्रयोग में लाते हैं। पुरुषों के लिए भी यह रसायन तथा बाजीकर है एवं इसका व्यवहार शरीर की ऊँचाई बढ़ाने के लिए करते हैं। (३) मिश्री के साथ इसका चूर्ण कुपचन, अतिसार एवं ग्रहणी आदि में देते हैं। (४) नींबू के रस में पीसकर इसका लेप कटिशूल, आन्तरिक शोथ, आमवात तथा सन्धीशूल आदि में करते हैं। १. 'चन्द्रिकाया' इति पाठा०। २. 'वामपुष्पे'ति पाठा०। १९ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA