भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ भावप्रकाशनिघण्टुः ४३. यष्टीमधु हिं०-मुलहठी, मुलेटी, मुलेठी, मीठी लकड़ी, जेठीमध । बं०-यष्टिमधु । म०-जेष्टिमध । गु०-जेठीमध । क०-जेष्ठमधु । ते०-यष्टिमधुकम । पं०-मुलेटी । मा०-मलहठी । ता०-अतिमधुरं । फा०-आसरेहमहक, बिखेमहक । अ०-असलुसूस । अं०-Liquorice Root (लिकोरिस् रूट) । ले०-Glycyrrhiza glabra, Linn. (ग्लिस्रहाइझा ग्लैंब्रा, लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । इसका क्षुप अरब, फारस की खाड़ी, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान एवं साइबेरिया आदि स्थानों में उत्पन्न होता है । इसकी उपज पञ्जाब तथ चेनाव से लेकर पेशावर आदि हिमालय के निचले हिस्से में तथा अंडमान द्वीप एवं वर्मा में होती है । बलूचिस्तान तथा चित्रााल में भी यह उत्पन्न होता है। काश्मीर में वरमूला घाटी में इसको उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त हुई है । इसका क्षुप २-४ फुट ऊँचा होता है। पत्रक-छोटे, ४ से ७ जोड़े, आयताकार से चौड़ाई लिये हुए मालाकार; अपरिमित सदण्डिक पुष्प व्यूह; पुष्प-बैंगनी वर्ण के, लगभग १/२ इञ्च लम्बे; फली-छोटी, बारीक, १/२-१ इञ्च लम्बी, चिपटी; बीज-बहुतया २-३ होते हैं । इसकी जड़ तथा भौमिक तने को सुखा कर छाल सहित अथवा छाल निकालकर बाजार में मुलेटी के नाम से बेचा जाता है। ये लम्बे टुकड़े, पीताभ बादामी रंग के झुर्रीदार होते हैं तथा छाल निकाले हुये हलके पीले रंग के रेशेदार होते हैं। इनमें एक प्रकार की हल्की गन्ध तथा स्वाद मीठा होता है । स्थान भेद से इसकी अन्य जातियाँ होती हैं जिनके स्वाद में अन्तर रहता है। यूनानी मत से ३ प्रकार की मुलेठी मानी गई है जिसमें से मिश्र की उत्तम, अरब की मध्यम तथा तुरुष्क वा फारस की अधम होती है जो उत्तरोत्तर कम मीठी होती हैं । रासायनिक संगठन-इसमें एक सफेद, मीठा, रवेदार पदार्थ ग्लिसहाइज्जिन् (Glyoyrrhizin) ५-१०% पाया जाता है जिसमें ग्लिसहाइजिक् एसिड (Glycyrrhizic acid) से बने चूना तथा पोटैशियम् (Potassium) के लवण होते हैं । यह एसिड भी शुभ्र रवेदार होता है तथा इसका द्रवणांक २५° श० होता है। यह चीनी से ५० गुना अधिक मीठा होता है। गरम जल में ग्लिसहाइज्जिन् का बना घोल ठंडा होने पर गाढ़ा हो जाता है। इसके अतिरिक्त मुलेठी में ५-१०% शर्करा, ३०% स्टार्च, प्रभुजिन, स्नेह, राल एवं अॅस्पराजिन् (Asparagin) करीब १% होता है। गुण और प्रयोग-मुलेठी मधुर, शीतल, स्नेहन, बल्य, वृष्य, रसायन, कफशामक, स्वर्य, नेत्र्य, मूत्रजनन, स्तन्यवर्धक, शोथहर एवं व्रणरोपक गुणों से युक्त होती है। (१) इसमें स्नेहन तथा सौम्य कफ निःसारक गुण होने के कारण इसका मुख्य उपयोग स्वरभंग, कास, श्वसनिका शोथ एवं गलशोथ आदि में किया जाता है। इसके लिये इसके टुकड़े को मुख में रख कर चूसने को दिया जाता है तथा तीसी के साथ इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है। (२) मीठी होने के कारण क्वाथों को मधुर बनाने के लिये तथा अनेक औषधियाँ जैसे सनाय, एलुवा आदि को सुस्वादु बनाने के लिये तथा खाँसी के लिये चूसने की गोलियों में इसका उपयोग करते हैं। इसके चूर्ण का उपयोग गोली बनाने में सहायक द्रव्य के रूप में व्यवहार में आता है । (३) मूत्र मार्ग के प्रक्षोभ में यह बहुत उपयोगी है। इससे पेशाब की जलन दूर होती है। (४) अम्लपित्त में इसके उपयोग से आमाशयिक अम्ल कम होकर शूल दूर होता है। (५) चीन में इसका व्यवहार रसायन औषधि की दृष्टि से बहुत किया जाता रहा तथा अपने यहाँ भी इसे रसायन, -बल्य तथा शुक्रल मानते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA