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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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२७० भावप्रकाशनिघण्टुः

इसका क्षुप—कश्मीर तथा हिमालय के उत्तरी पश्चिमी शिखरों पर ५०००-११००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। पत्र—मूलीय; कोषमय आधार वाले, ३-५ इञ्च लम्बे, रेखाकार (Linear); पुष्प—नीले सफेद दागों से युक्त; मूल—हलका, पीला, चौपहल; फली—लम्बी। चिकित्सा में इसके भौमिक तने तथा मूल का व्यवहार किया जाता है। कुटकी तथा विदेशी ‘जेन्शियन्’ के स्थान पर इसका प्रयोग किया जाता है। इसकी अन्य जातियों का भी इसी प्रकार व्यवहार किया जाता है। इसके टुकड़े १ इञ्च लम्बे एवं इन पर चक्राकार धारियाँ होती हैं तथा ये ऐंठे हुए से प्रतीत होते हैं। अन्य पार्थक्य ऊपर लिखा गया है।

रासायनिक संगठन—इसमें एक कडुवा पदार्थ तथा एक पारदर्शक राल के समान पीले रंग का बिना स्वाद का पदार्थ २०% पाया जाता है जो क्षारीय घोल में नहीं घुलता। इसमें जेन्शिय पिक्रिन (Gentiopicrin) नहीं होता जिसे विदेशी जेन्शियन् (G. lutea) का प्रभावकारी द्रव्य समझा जाता है। शायद यह इसके ताजे मूल से प्राप्त हो सकता है।

गुण और प्रयोग—यह कडुवा तथा बल्य है। इससे आमाशयिक रसों की अभिवृद्धि होकर भूख बढ़ती है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह विरेचन कराती है। इसका स्वाद एवं गन्ध अच्छी होने के कारण अनेक बल्य एवं पाचक औषधियों के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। इसमें टॅनिन न होने के कारण यह ग्राही भी नहीं होता है। ज्वर में इससे लाभ होता है।

मात्रा—चूर्ण ५/१५ र० ।

४६. (ख) खुरासानी कुटकी

हिं०—खुरासानी कुटकी। गु०—कडू। म०—कडू। अ०—खेरतिक। इरान—खेरबेकसीआ। अं०—Black hellebore (ब्लैक् हेलीबोर), Christmas rose (क्रिस्टमस रोज़)। ले०—Helleborus niger Linn. (हेलीबोरस नाइगर)। Fam. Rananculaceae (रेनन्क्युलेसी)।

इस वनस्पति के मूल नेपाल, हिमालय और अरब से आते हैं। कुटकी में इसकी मिलावट रहती है। विशेष वर्णन कुटकी के साथ दिया गया है।

रासायनिक संगठन—इसमें हेल्लेबोरिन् (Helleborin) तथा हेल्लेबोरेइन् (Helleborein) नामक पदार्थ पाये जाते हैं।

गुण और प्रयोग—यह हृद्य, ज्वरहर, वेदनाहर, विरेचक, आर्तववृद्धिकर एवं कृमिघ्न है। अधिक मात्रा में यह विषैली औषधि है। इससे हृदयातिपात होकर मृत्यु हो सकती है। अधिक मात्रा से प्रथम वमन और विरेचन प्रारम्भ होता है, फिर नाड़ी की गति कम होते-होते मृत्यु हो सकती है।

(१) हृदय की अकार्यक्षमता के कारण उत्पन्न जलोदर में पुनर्नवा, अपामार्ग, चिरायता एवं सोंठ के साथ इसका क्वाथ बहुत लाभकर होता है। हृदय पर इसकी क्रिया डिजिटेलिस् के समान होती है। इससे हृदय को बल मिलता है एवं नाडी की गति मंद होकर नाडी बलवान् होती है और जलोदर दूर होता है।

(२) वेदनायुक्त ज्वर जैसे फुफ्फुस पाक, तीव्र सन्धि शोथ एवं प्रसूतिज्वर आदि में इसके प्रयोग से लाभ होता है। इन रोगों में इसकी क्रिया वत्सनाभ के समान होती है।


१. 'कटुम्बरे'ति पा.।