भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 322

हरीतक्यादिवर्गः २७१ (३) इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन करने से व्रणपीडा दूर होती है। यह स्थानिक वेदनाहर भी है। मात्रा-चूर्ण ४-८ र० । अथ किरातकस्य (चिरायता) नामगुणानाह किराततिक्तः कैरातरतः कटुतिक्तः किरातकः ।।१५३।। काण्डतिक्तोऽनार्यतिक्तो भूनिम्बो रामसेनकः ।। किरातकोऽन्यो नैपालः सोऽर्द्धतिक्तो ज्वरान्तकः ।।१५४।। किरातः सारको रूक्षः शीतलस्तिक्तको लघुः । सन्निपातज्वरश्वासकफपित्तास्रदाहनुत् । कासशोथतृषाकुष्ठज्वरव्रणकृमिप्रणुत् ।।१५५।। चिरायता के नाम तथा गुण-किराततिक्त, कैरात, कटुतिक्त, किरातक, काण्डतिक्त, अनार्यतिक्त भूनिम्ब और रामसेनक ये सब चिरायता के नाम हैं। नेपाल देश में एक प्रकार की चिरायता उत्पन्न होती है जो कि इसकी अपेक्षा आधा तिक्तरसयुक्त होती है। अतएव उसे 'अर्धतिक्त' कहते हैं। वह ज्वरनाशक होती है। चिरायता-सारक (दस्तावर), रूक्ष, शीतल, तिक्तरसयुक्त एवं लघु होती है एवं सन्निपातज्वर, श्वास, कफ, पित्त, रक्तदोष, दाह, कास, शोथ, प्यास, कुष्ठ, ज्वर, व्रण और कृमि इन सबों को दूर करती है।।१५३-१५५] ४७. किरात (चिरायता) हिं०-चिरायता, चिरेता, चिरैता, चिराइता। बं०-चिराता, चिरेता। म०-काडेचिराईत, चिराइता। गु०- करियातुं। क०-नेलंबेडु। ते०-नीलवेमु। ता०-निलस्वेम्बु । फा०-नोनिहाद, मोनिहादन्दी। अ०-कसबुज्जराीरा, कसबुज्झारिरा, कसबुल् रायरह। अं०-Chireta (चिरेटा)। ले०-Swertia Chirata (Buch-Ham) । (स्वर्शिया चिराटा) Fam. Gentianaeae (जेन्शियार्नेंसी)। चिरायता हिमालय पहाड़ के गरम प्रान्तों में कश्मीर से भूटान तक और खासिया के पहाड़ पर उत्पन्न होता है। प्रायः पृथ्वी के सब देशों में १८० प्रकार का चिरायता पाया जाता है, इनमें हमारे देश में ३७ प्रकार का होने का अनुभव किया गया है। जिस चिरायते को हम लोग व्यवहार में लाते हैं और जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है, वह हिमालय पहाड़ के लगभग ४ हजार से १० हजार फीट ऊँची चोटियों पर तथा खासिया के पहाड़ पर ४ हजार से ५ हजार फीट की ऊँची चोटियों पर उत्पन्न होता है। इसका वर्षायु क्षुप-दो फीट से ५ फीट तक ऊँचा होता है। कांड-नारंगी कालासा या जामुनी, मूल की तरफ गोल, मोटा, ऊपर बहुशाखा युक्त तथा चौपहल; पत्र-चौड़े भालाकार, ४ x १.५ इञ्च, चिकने, नोकदार, ३ से ७ शिराओं से युक्त, विपरीत; दलपत्र-हरित पीत, परंतु बैंगनी रंग की छाया भी हो सकती है। प्रत्येक विच्छेद पर दो- दो हरिताभ और रोमश ग्रन्थियाँ होती हैं। फूलने पर इसमें डोंडी लगती है जिनमें बहुत, बारीक बीज निकलते हैं। पुष्पित होने पर सम्पूर्ण क्षुप को उखाड़ कर सुखाकर बेचते हैं जिसका औषधि में व्यवहार होता है। यह अत्यन्त कड़वा होता है। रासायनिक संगठन-इसमें चिरातिन् (Chiratin, C₅₂H₉₆O₃₀) और ओफेलिक् एसिड (Ophelic acid, C₂₆H₄₀O₂₀) नामक दो कडुवे द्रव्य १.४२-१.५२% रहते हैं। इनमें पहला हलके पीले रंग का पदार्थ है एवं दूसरा