भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ भावप्रकाशनिघण्टुः भी हलके पीले बादामी रंग का, आर्द्र, चासनी की तरह पदार्थ होता है जो जल तथा मद्यसार में घुल जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें यवक्षार, चूना, राल एवं ओलिक् (Oleic), पामिटिक् (Palmitic) और स्टियरिक् अम्ल (Stearic acids) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। **गुण और प्रयोग—**चिरायता दीपन, पाचन, तिक्तपौष्टिक, ज्वरहर, दाहप्रशमन, पित्तविरेचक एवं कृमिघ्न है। जेन्शियन की तरह ही यह लाभदायक है। इसके प्रयोग से भूख बढ़ती है, पखाना साफ होता है तथा पुराने ज्वर में लाभ होता है। इसका उपयोग स्वतन्त्र की अपेक्षा अन्य औषधियों के साथ अधिक किया जाता है। इसका प्रयोग ज्वर, विषमज्वर, दाह, अग्निमान्द्य, शैथिल्यप्रधान, कुपचन, आध्मान, अम्लपित्त, यकृत् विकार, कामला, पांडु, श्वास, शोथ, गण्डमाला तथा कृमिरोग एवं व्रण में किया जाता है। (१) पुराने ज्वर में जब अग्निमांद्य तथा शरीर में दाह रहता है तब इसके फांट या चूर्ण से लाभ होता है। सुदर्शन चूर्ण, जिसमें इसकी आधी मात्रा रहती है, बहुत व्यवहार में आता है। (२) रोग संनिवृत्तावस्था में पाचन सुधारने के लिए तथा अग्निवृद्धि के लिए बल्य औषधि के रूप में इसके फाण्ट का व्यवहार लौंग, दालचीनी आदि सुगन्धि औषधियों के साथ किया जाता है। (३) हिचकी, गर्भिणीवमन एवं मद्यपान करने वालों में यदि वमन हो तो इसके चूर्ण का क्वाथ का प्रयोग मधु या शर्करा मिलाकर करते हैं। (४) वातरक्त में बल्य औषधि की तरह इसका प्रयोग किया जाता है। (५) उष्ण कटिबन्धज यकृत् विकारों में धनियाँ तथा चिरायते का क्वाथ मधु के साथ देने से लाभ होता है। (६) भूनिम्बादि चूर्ण जिसमें चिरायता, कुटकी, त्रिकटु, मुस्तक, इन्द्रयव, कुरैया की छाल एवं चित्रक आदि पदार्थ रहते हैं, उसका व्यवहार कुपचन, संग्रहणी, ज्वर तथा कृमिरोग में किया जाता है। (७) सुदर्शन चूर्ण तथा टङ्क