भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २३९ (४) इसका मूल विरेचक होता है । (५) इसके फलों को पीसकर लेप करने से गरमी के दिनों में होने वाला चक्कर तथा शिरःशूल दूर होता है । (६) आध्मान में इसके क्वाथ से बस्ति देने से लाभ होता है । मात्रा—४ रत्ती से २ माशा तक । नोट—एक अन्य प्रकार की सौंफ जिसे 'बादियाण' (Pimpinella anisum Linn. पिंपेनेल्ला एनिसन्) कहते हैं उसका वर्णन परिशिष्ट में देखें । अथ मेथीवनमेथीनामगुणानाह १मेथिकामेथिनी मेथी दीपनी बहुपत्रिका । बोधिनी बहुबीजा च ज्योतिर्गन्धफला२ तथा ।।९३।। वल्लरी चन्द्रिका मन्था मिश्रपुष्पा च केंरवी । कुञ्चिका बहुपर्णी च पीतबीजा३ मुनिच्छदा ।।९४।। मेथिकावातशामनी श्लेष्मघ्नीज्वरनाशिनी । ततः स्वल्पगुणावन्या४ वाजिनां सा तु पूजिता ।।९५।। मेथी तथा वनमेथी के नाम तथा गुण—मेथिका, मेथिनी, मेथी, दीपनी, बहुपत्रिका, बोधिनी, बहुबीजा, ज्योतिः, गन्धफला, वल्लरी, चन्द्रिका, मन्था, मिश्रपुष्पा, कैरवी, कुञ्चिका, बहुपर्णी, पीतबीजा और मुनिच्छदा ये सब नाम मेथी के हैं । मेथी—वायु को शमन करने वाली, कफ को दूर करने वाली तथा ज्वर को नष्ट करने वाली है और वनमेथी— मेथी की अपेक्षा कम गुण वाली होती है, किन्तु वह घोड़ों के लिये अत्यन्त उत्तम (हितकर) होती है । [९३-९५] २५. मेथी हिं०—मेथी । पं०—बं०—म०—गु०—मेथी । ते०—मेंदुलु, मेंतुलु, मेंति । ता०—वण्डयन्, वेंडयम, वेन्दयम । क०—मेत्रे । मल०—उल्लव । फा०—तुख्मशमलीत । अ०—बजरुल हुल्बा, वजरुलहल्बह, हुलबह । अं०—Fenugreek (फेनुग्रीक) । ले०—Trigonella foenumgraecum Linn. (ट्राइगोनेल्ला फोएनम् ग्रैइकम) । Papilionaceae (पॅपिलि-ओनेसी) । प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है परन्तु पञ्जाब और काश्मीर में यह आप-ही-आप जङ्गल में उत्पन्न होती है । इसका क्षुप—६ इञ्च से १६-१७ इञ्च तक ऊँचा होता है । पत्ते—संयुक्त एवं प्रत्येक सींक पर तीन-तीन पत्रक रहते हैं और वे आध से एक इञ्च तक लम्बे, अण्डाकार और बारीक कंगूरेदार होते हैं । फूल—नन्हें-नन्हें हलके पीत रङ्ग के आते हैं । फलियाँ—गोल २-३ इञ्च लम्बी कुछ टेढ़ी सी नोकदार रहती हैं । प्रत्येक से १०-२० पीले रङ्ग के दाने निकलते हैं । इन्हीं का चिकित्सा में अधिक उपयोग करते हैं । रासायनिक संगठन—इसके सूखे पञ्चाङ्ग में प्रोटीन (Protein) की मात्रा १६% रहती है जिसमें से इसके ग्लोब्यूलिन (Globulin) में हिस्टॅडीन् (Histadine) की काफी मात्रा रहती है । इसके अॅल्ब्यूमिन् (Albumin) भाग में फॉस्फोरस् (Phosphorus) तथा गन्धक रहता है । इसके बीजों में ट्रिगोनेल्लिन (Trigonelline, C₇ H₇ O₂ N), कोलीन (Choline) आदि क्षाराभ, एक पीत रञ्जक पदार्थ, स्थिरतैल ६%, प्रोटीन २२% तथा गोंद २८% रहता है । बीजों को जलाने से इसमें ७% राख निकलती १. 'मिथिती'ति पाठा० । २. 'जाती'ति पाठा० । ३. 'पित्तजिद्धायनुद्द्विधे'ति पाठा० । ४. 'बल्येऽति' पाठा० ।