भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ भावप्रकाशनिघण्टुः बालकों के पाचन विकारों में, विशेषकर आध्मान एवं शूल में चूने के जल के साथ इसके अर्क का बहुत व्यवहार किया जाता है। प्रसूता में भी वमन, अजीर्ण, हिक्का, आध्मान, शूल तथा दुग्ध वृद्धि आदि के लिये इसके क्वाथ का प्रयोग किया जाता है। अनार्तव में भी इसका प्रयोग करते हैं। केस और म्हसकर के मतानुसार अंकुश कृमि (Hookworm) में यह उपयोगी है। (१) अतिसार में मेथी और सोआ घी में भूनकर देते हैं। (२) इसके पत्तों को तेल लगा कर गरम करके फोड़े-फुन्सियों पर बाँधने से वे जल्दी, पक जाते हैं। (३) इसके पत्ते तथा मूल को पीसकर जोड़ों की सूजन पर बाँधने से लाभ होता है। (४) विरेचक औषधियों के साथ इसके तैल या अर्क के व्यवहार से मरोड़ नहीं होती। (५) चरक की राजयक्ष्मा की चिकित्सा में पार्श्वशूलहर लेप में इसका उल्लेख है। मात्रा-फल चूर्ण-१-४ माशा, तैल-१-३ बूँद, अर्क-१/२-१ औंस। संकेन्द्रित जल (ॲक्वा कन्सेण्ट्रेटा = Aqua Concentrata)-५-१५ बूँद। २४. सौंफ हिं०-सौंफ, बड़ी सौंफ, सउँफ। बं०-मौरी, पान मौरी। पं०-बड़ी शेप गु०-वरीआली, बलीय़ारी। क०- वड़ी सोपु, सब्बसिंगे। मा०-सोंफ। पं०-सोंफ। ते०-सोपु, पेद्दजिलकुरां। ता०-सोहिकिरे, शोम्बु। फा०- राज़यानज़, राज़याना, बादियाँ, बादियान, राजियानह। अ०-एजियानज़, असलुल एजियानज़, राज़ियाज़। अं०- Fennel Fruit (फेन्नेल फ्रूट)। ले०-Foeniculum vulgare Mill. (फिनिक्यूलम् वल्गेरि); Syn. Anethum foeniculum (एनेथम् फिनिक्यूलम्)। Fam. Umbeliferae (अंबेलिफेरी)। प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में यह बोई जाती है। इसका क्षुप-लम्बा, पत्ते-कई भागों में विभक्त सोये के पत्तों के समान, फूल-छत्राकार किञ्चित् पीले रंग के और फल-६ से ७ मि० मि० लम्बे, ४ मि० मि० चौड़े, आयताकार, प्रायः अखण्डित एवं डंठल युक्त होते हैं। नये बीज हरे रंग के और पुराने होने पर पीलापन युक्त हो जाते हैं। जिन फलों का तेल निकाल लिया जाता है उनमें तैल की मात्रा कम हो जाती है और उनकी गन्ध भी कम होती है तथा वे अधिक गहरे रंग के हो जाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल १-२.९% और स्थिर तैल ८.८-१५.८% रहता है। इस उड़नशील तैल में एनीथॉल् (Anethol) ६०% तथा फेनकोन् (Fenchone) आदि कुछ अन्य पदार्थ रहते हैं। विदेशी सौंफ की अपेक्षा भारतीय सौंफ में इस तैल की मात्रा कम रहती है। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धित, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, दाहप्रशमन एवं मूत्रविरजनीय है। इसका उपयोग विशेष रूप से मसाले के रूप में एवं मादक पेयों में सुगन्धि के लिये किया जाता है। इसका अर्क बच्चों के पाचन के विकार जैसे आध्मान, शूल आदि में दिया जाता है और अन्य औषधियों के अनुपान के रूप में भी व्यवहार करते हैं। इसका व्यवहार आमातिसार, अजीर्ण, आध्मान, ज्वर, खाँसी, श्वास, वृक्करोग, प्लीहा वृद्धि, अनार्तव तथा दृष्टिमांद्य आदि रोगों में किया जाता है। (१) इसको पीसकर पीने से पेशाब की जलन दूर होकर पेशाब साफ होती है। (२) सूखी खाँसी और मुख के विकारों में इसे मुख में रखने से लाभ होता है। (३) इसके पत्र सुगन्धि, मूत्रल और स्वेदजनक होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA