भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २३७ अथ शतपुष्पामिश्रेययोर्नामानि गुणांश्चाह शतपुष्पा शताह्वा च मधुरा कारवी मिसिः । अतिलम्बी सितच्छत्रा संहितच्छत्रिकाऽपि१ च ।।८९।। छत्रा शालेयशालीनी मिश्रेया मधुरा मिसिः । शतपुष्पा लघुस्तीक्ष्णा पित्तकृद्दीपनी कटुः ।।९०।। उष्णा ज्वरानिलश्लेष्मव्रणशूलाक्षिरोगहृत् । मिश्रेया तद्गुणा प्रोक्ता विशेषाद्यो निशूलनुत् ।।९१।। अग्निमान्द्यहरी हृद्या बद्धविट्कृमिशुक्रहृत् । रूक्षोष्णा पाचनी कासवमिश्लेष्मानिलाहरेत् ।।९२।। सोया और सौफ के नाम तथा गुण-शतपुष्पा, शताह्वा, मधुरा, कारवी, मिसि, अतिलम्बी, सितच्छत्रा और संहितच्छत्रिका ये नाम सोवे के हैं और छत्रा, शालेय, शालीन, मिश्रेया, मधुरा और मिसि ये सब नाम सौफ के हैं। सोया- परिपाक में लघु, तीक्ष्ण, पित्तकारक, अग्निदीपक, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य तथा ज्वर, वातश्लेष्म, व्रण, शूल और नेत्रसम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली है और सौंफ के भी सोये के समान ही गुण हैं किन्तु विशेष करके यह योनि सम्बन्धी शूल को दूर करने वाली, अग्नि की मन्दता को नाश करने वाली, हृदय के लिये हितकारक, मल की विबद्धता को दूर करने वाली, कृमि तथा शुक्र का नाश करने वाली, रूक्ष, उष्णवीर्य पाचक एवं कास, वमन, कफ तथा वायु को दूर करने वाली होती है। [८९-९२] २३. सोआ हिं०-सोआ, सोया, सोवा, वनसौंफ । बं०-शुलफा, शुल्फा । पं०-सोया । म०-बालंत शोप, शेपु । क०- सल्बसिगे । गु०-शुवा । ते०-पुशतकुपिविट्टुलू, सोम्पा । मा०-सोवा, सुवा । ता०-शतकुप्पी विरह । अं०- Indian dill fruit (इण्डियन डिल फ्रूट) । ले०-Anethum sowa Kurz (अनेथम् सोवा) । Peucedanum graveolens Linn. (प्यूसिर्डेनम् ग्रॅवियोलेन्स लिन) Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी) । यूरोपीय जाति प्यूसिर्डेनम् ग्रॅवियोलेन्स (Peucedanum graveolens) से भारतीय जाति में कुछ अन्तर होने के कारण भारतीय जाति को अनेथम सोवा (Anethum sowa) कहते हैं। इस देश के सब प्रान्तों में विशेषकर गरम और शीत गरम प्रान्तों में इसकी खेती शीत ऋतु में की जाती है। यह क्षुप जाति की वनस्पति १-३ फीट तक ऊँची होती है। पत्ते-कई भागों में विभक्त, बारीक और अत्यन्त कोमल होते हैं। फूल-छत्राकार किञ्चित् पीले रंग के होते हैं। फल-अंडाकार, चिपटे, उन्नतोदार, किनारे पर सपक्ष एवं प्रायः दोनों अर्धखण्ड मिले हुये तथा आधार पर पतला डण्ठल लगा रहता है। ये विदेशी बीजों से कम चौड़े तथा अधिक उन्नतोदार और इनके पृष्ठ भाग की धारियाँ हल्के रंग की होती हैं। रासायनिक संगठन-इसके फलों में ३-३.५% एक उड़नशील तैल पाया जाता है। इस तैल में डिल एपिओल (Dill-apiol, C₁₂H₁₄O₄) नामक एक तैलीय पदार्थ रहता है जो पारस्ले एपिओल (Parsley apiole, C₁₂H₁₄O₄) के सदृश होते हुये भी गुणों में उससे पृथक् (Isomeric = आइसोमेरिक्) रहता है। इसके अतिरिक्त इसमें एक तरल हाइड्रोकार्बन अॅनीथेन् (Hydrocarbon-anethene, C₁₀H₁₀) और कारवोन (Carvone) सदृश पदार्थ रहता है। विदेशी और भारतीय तैल में थोड़ा अन्तर होता है। गुण और प्रयोग-सोआ दीपन, पाचन, वातानुलोमक, सुगन्धित, उत्तेजक, वातहर, गर्भाशय उत्तेजक एवं दुग्धवर्धक है। १. 'संहिते'ति पाठा० ।