भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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२३६ भावप्रकाशनिघण्टुः २२. धनियाँ हिं०-धनियाँ । बं०-धने, कोथिंबीर, धणे । गु०-धाना, धाणा, कोथमीर । क०-कोथुंबुरी, कोथम्बरी, हविज । ते०-कोत्तिमिरि, धनियलु । ता०-कोटमल्लि, कोतमल्ली । सिन्ध०-धानु । फा०-कश्नीज । अ०-कज़बुरा, कज़बुरह । अं०-Coriander fruit (कोरिएण्डर फ्रूट) । ले०-Coriandrum sativum Linn. (कोरिएण्ड्रम सैटिवम् लिन) । Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी) । इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में एवं विदेशों में भी इसकी उपज की जाती है। इसका पौधा-१-२ फुट ऊँचा, शाखायें-चिकनी, पत्ते-विषमवर्त्ती, जड़ के निकटवाले पत्ते गोलाकार, ३-४ या ५ भागों में विभक्त, प्रत्येक भाग कटे किनारे वाले और कँगूरेदार तथा शाखाओं के पत्ते सोआ, चनसुल आदि के पत्तों के समान होते हैं। फूल-छत्ते से सोया के फूल के समान सफेद या किंचित् गुलाबी रंगों के आते हैं। फल- नन्हें नन्हें, अण्डाकार, गुच्छों में छत्राकार लगते हैं। सूखने पर वे दो टुकड़े होकर धनिये के नाम से बिकते हैं। रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक उड़नशील तैल ०.५-१% तक पाया जाता है जिसमें ४५-५५% कोरिएण्ड्रॉल (Coriandrol, C₁₀ H₁₈ O) तथा कुछ अन्य पदार्थ रहते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें स्थिर तैल १३%, वसीय पदार्थ १३%, गोंद, टैनिन, मॅलिक एसिड तथा राख ५% आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-धनियाँ मूत्रल, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, संग्राही, दाहशामक एवं पिपासाघ्न है। इसका उपयोग नेत्र रोग, ज्वरजन्यदाह, वमन, अतिसार, आमाजीर्ण, आध्मान, शूल आदि में किया जाता है। मसाले के रूप में, अनेक औषधियों को सुगन्धित करने के लिए तथा विरेचक औषधियाँ जैसे सनाय रेवाचीनी आदि से मरोड़ न हो इसलिए इसका व्यवहार किया जाता है। (१) ज्वर में दाह एवं प्यास की शान्ति के लिए इसका शीत कषाय मिश्री तथा मधु मिलाकर पिलाते हैं। (२) नेत्राभिष्यन्द में इसके क्वाथ को छानकर नेत्र बिन्दु के रूप में डालने से लाभ होता है। पहले एरण्ड तैल डालकर फिर इसका प्रयोग करना चाहिये। शीतला में आँख धोने के लिये इसके जल का व्यवहार किया जाता है जिससे उत्तरकालीन नेत्राभिष्यन्द एवं नेत्रव्रण आदि उपद्रवों का प्रतिषेध होता है। (३) इसके तैल का व्यवहार वातनाड़ी शूल एवं जोड़ों के दर्द में करते हैं तथा बच्चों के आध्मान जन्य शूल में १-४ बूँद मिश्री के साथ देते हैं। (४) कच्ची धनियाँ का लेप सरदर्द तथा भिलावे से उत्पन्न दाह पर किया जाता हैं। (५) पुराने घाव, सूजन तथा विषैले फोड़ों पर यवके आटे के साथ इसकी पुल्टिस उपयोगी है। (६) इसके क्वाथ में मिश्री मिलाकर रक्तार्श में देने से लाभ होता है। (७) क्षोभशामक होने के कारण धनियाँ के शीत कषाय का उपयोग अनुपान या सहपान के रूप में स्वप्नमेह एवं श्वेतप्रदर में किया जाता है। (८) जीर्ण प्रतिश्याय में धनियाँ का फाण्ट या बीजों का चूर्ण मिश्री के साथ प्रयुक्त होता है। मात्रा-१/२-४ माशा । अधिक मात्रा में सेवन से कामशक्ति का ह्रास तथा स्त्रियों में मासिक धर्म रुक जाता है। दर्पनाशक-मधु, दालचीनी और अण्डा।