भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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हरीतक्यादिवर्गः २३३ जीरकत्रितयं रूक्षं कटूष्णं दीपनं लघु । संग्राहि पित्तलं मेध्यं गर्भाशयविशुद्धिकृतक ॥८४॥ ज्वरघ्नं पाचनं वृष्यं बल्यं रुच्यं कफापहम् । चक्षुष्यं पवनाध्मानगुल्मच्छर्द्यतिसार हृत् ॥८५॥ सफेद जीरा, स्याह जीरा तथा कलौंजी (मंगरैला) के नाम तथा गुण-उसमें से जीरक, जरण, अजाजी, कणा और दीर्घजीरक ये सब 'सफेद जीरा' के नाम हैं । कृष्णजीर, सुगन्ध और उद्गारशोधन ये नाम 'स्याहजीरा' के हैं और कालाजाजी (कोई-कोई काला तथा अजाजी ऐसा पृथक् दो नाम मानते हैं), सुषवी, कालिका, उपकालिका, पृथ्वी- का, कारवी, पृथ्वी, पृथु, कृष्णा, उपकुञ्चिका, उपकुञ्जी, कुञ्जी और बृहज्जीरक ये सब नाम कलौंजी (मँगरैला) के हैं। तीनों प्रकार के जीरे-रूक्ष, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, परिपाक में लघु, संग्राही, पित्तकारक, मेधा के लिये हितकारी, गर्भाशय को शुद्ध करने वाले, ज्वरनाशक, पाचक, वृष्य (वीर्यवर्धक), बलकारक, रुचिजनक, कफनाशक, नेत्रों के लिये हितकारी और वायु, आध्मान, गुल्म, वमन और अतिसार को भी दूर करने वाले होते हैं। [८१-८५] ९९. शुक्लजीरक (जीरा) हिं० - जीरा, सादाजीरा, साधारण जीरा, सफेद जीरा । बं० - सादाजीरे, शाहाजीरे, जीरे । म० - जीरें, पांढरे जीरे । गु० - जीरुं, शाकनु जीरुं, सादु जीरुं, धोलु जीरुं । क० - जीरिगे, विलिय जिरिगे विलिय जीरगे । ते० - जिलकारा, जील करर, जील कर्र । ता० - शीरागम । यू० - रवामुने । फा० - जीरये सफेद । अ० - कमून अवियज़ । अं० - Cumin seed (क्युमिन सीड) । ले० - Cuminum cyminum Linn. (क्युमिनम् साइमिनम्, लिन.) । Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी) । जीरा-एक सर्वप्रसिद्ध मसाले की वस्तु है । आसाम और बंगाल के सिवा प्रायः सब प्रान्तों में विशेषकर राजपूताना और उत्तर भारत के कई प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है । यह खेतों में प्रति वर्ष बोया जाता है । इस क्षुप जाति की वनस्पति की शाखायें पतली होती हैं । पत्ते-सौंफ के पत्तों के समान पतले-पतले, लम्बे तथा २-३ एक साथ रहते हैं । बारीक सफेद फूलों के छत्ते लगते हैं । फल-सौंफ के समान होता है ॥१८४॥ रासायनिक संगठन-इसमें एक सुगन्धि, उड़नशील तथा हलके पीले रङ्ग का तैल २.५-४% पाया जाता है । इस तैल में क्यूमिक ऑल्डिहाइड् (Cumic aldehyde) की मात्रा ५२% तक होती है जिसके अन्दर कई रासायनिक पदार्थ होते हैं । इस तैल को कृत्रिम रूप से थाइमॉल् (Thymol = अजवाइन का सत्) में परिवर्तित किया जा सकता है जो अच्छा प्रतिदूषक (Antiseptic) और कृमिघ्न पदार्थ है। इसके अतिरिक्त इसमें स्थिर तैल १०% एवं पेण्टोसान (Pentosan) ६.७% होता है । गुण और प्रयोग-यह पाचक, वातानुलोमक, मूत्रविरजनीय, वेदनाहर, उत्तेजक एवं संग्राही है । इसका उपयोग वमन, अतिसार, कुपचन, आध्मान, ज्वर तथा मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोग जैसे सुजाक, पथरी एवं मूत्रावरोध में किया जाता है । बालकों के पाचन के विकारों में यह अधिक उपयोगी है । (१) ज्वर में पाचन सुधरकर भूख बढ़ती है, पेशाब साफ होती है और दाह शांति होती है इसमें गुड़ के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये । (२) अतिसार में दही के साथ इसको दिया जाता है । जीरकाद्यमोदक का उपयोग जीर्ण अतिसार, अपचन एवं अग्निमांद्यादि रोगों में किया जाता है । गर्भिणी में पित्तजन्य वांति में नींबू के रस के साथ देने से लाभ होता है । (३) सुजाक आदि में निम्नलिखित चूर्ण १० रत्ती की मात्रा में देने से लाभ होता है-जीरा ४, खूनखराबा २, कलमीशोरा ५, धनियां ५ तथा गुलाब २ भाग । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA