भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ भावप्रकाशनिघण्टुः हा. म्यूटिकस् के बीज-पीताभ, चिपटे, गोलाई लिये हुये चौकोर, करीब उतने ही बड़े किन्तु सूक्ष्म गड्ढेदार, अल्प उग्रगंध युक्त किन्तु स्वादहीन होते हैं। बजार में दोनों मिले हुये मिलते हैं जिसमें अन्य पदार्थ भी मिले हुये पाये जाते हैं। आयुर्वेद में बीजों का तथा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में पत्र तथा पुष्पित अग्रभाग के विभिन्न कल्पों का उपयोग किया जाता है। यूनानी चिकित्सकों के मत से खुरासानी अजवायन सफेद, काली और लाल तीन जाति की होती है। इनमें से काली विष के समान हानिकर और घातक मानी जाती है। रासायनिक संगठन-इसकी पत्तियों में हायोसाएमिन (Hyoscyamine) नामक क्षाराभ तथा अल्प मात्रा में हायोसीन (Hyoscine) या स्कोपोलामाइन (Scopolamine), ॲट्रोपिन (Atropine), हायोसिप्रिन (Hyosciprin), कोलिन तैल, गोंद, ॲल्ब्यूमिन तथा पोटैशियम नाइट्रेट २% आदि पदार्थ रहते हैं। इसकी विभिन्न जातियों में क्षाराभों की मात्रा भिन्न-भिन्न रहती है। सहारनपुर तथा काश्मीर में लगाये पौधों में इनकी मात्रा प्राकृत पौधों की अपेक्षा अधिक (.०३%) होती है तथा ब्रिटिशफार्माकोपिया के प्रतिमान (.०५५%) के करीब होती है। इसके बीजों में हायोसाएमिन (Hyoscyamine), २५% तैल, तथा राख ४-५% होती है। गुण और प्रयोग-यह अवसादक, वेदनाहर, स्वापजनक, उद्वेष्टन निरोधी, शामक, बल्य कनीनिका विकासि, दीपन, पाचन तथा कृमिघ्न है। यह बहुत अच्छा वेदनाहर एवं निद्राकर है। इससे अफीम के समान कब्जियत नहीं होती। इसकी क्रिया बेलाडोना की तरह होती है, लेकिन इससे मस्तिष्क कम उत्तेजित होता है और सुषुम्ना एवं आन्त्र पर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इससे अनैच्छिक मांस पेशियों के उद्वेष्ठन के कारण होने वाले शूल-जैसे नाग (Lead) शूल तथा मूत्रमार्ग प्रक्षोभ से उत्पन्न शूल-दूर होते हैं। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतंत्रक, निद्राभंग, आक्षेप, नाड़ीशूल तथा अनेक मस्तिष्क के विकार एवं मानसिक अस्वस्थता में किया जाता है। सूखी खाँसी एवं दमा में श्वसनिकाओं का संकोच दूर होकर लाभ होता है। यह विरेचक औषधियों से उत्पन्न मरोड़ को दूर करती है। पथरी एवं बस्तिशोथ आदि से उत्पन्न प्रक्षोभ में यवक्षार, पाठा तथा गुरुच के साथ यह बहुत गुणकारी है। अल्प मात्रा में देने से यह हृदय के लिये शामक है और बल्य होने से हृदय की धड़कन में इससे लाभ होता है। पीड़ातार्तव, अनियमितार्तव में भी इसका अच्छा उपयोग होता है। मद्य के साथ इसके बीजों को पीसकर स्तनशोथ, अंडशोथ, यकृत पीड़ा एवं संधिशोथ में लगाने से शोथ एवं वेदना कम होती है। दाँत के गड्ढे में इसके बीजों को पीस कर रखने से दंतशूल दूर होता है। इसकी अंगारों पर जलाकर उसके धूएँ का मुख में जाने देने से भी दंतशूल में लाभ होता है। अधिक मात्रा में यह मादक विष है जिससे प्रलाप, संन्यास आदि होकर शीघ्र मृत्यु होती है। वृद्ध एवं दुर्बल इसकी अधिक मात्रा सहन नहीं कर सकते, लेकिन बच्चे अधिक मात्रा सहन कर सकते हैं। मात्रा-पत्र चूर्ण १ १/२-३ र०, बीज चूर्ण १ १/२-३ र०, तरल एक्स्ट्रॅक्ट ३-६ बूँद, शुष्क एक्स्ट्रॅक्ट १/८-१/२ र०, टिंक्चर ३०-६० बूँद। अथ शुक्लजीरककृष्णजीरककालिकानां नामानि गुणाँश्चाह जीरको जरणोऽजाजी कणा स्याद्दीर्घजीरकः ।।८१।। कृष्णजीरः सुगन्धश्च तथैवोद्गारशोधनः । कालाजाजी तु सुषवी कालिका चोपकालिका ।।८२।। पृथ्वीका कारवी पृथ्वी पृथुकृष्णोपकुञ्चिका । उपकुञ्ची च कुञ्ची च बृहज्जीरक इत्यपि ।।८३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA