भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ भावप्रकाशनिघण्टुः (४) प्रसूता को देने से दुग्ध वृद्धि होती है । (५) हिचकी में घृत के साथ इसका धूम्रपान बहुत उपयोगी है । (६) इसको स्वरभंग एवं सर्पविष में भी उपयोगी बतलाया गया है । (७) इसका बाह्यलेप पीड़ाहर है एवं यह अर्श, स्तन, अण्डकोष तथा उदर की पीड़ा पर लगाया जाता है और घृत, मधु एवं नमक के साथ बिच्छू के काटने पर लगाने से लाभ होता है । इसके क्वाथ से स्नान करने से खुजली दूर होती है तथा इससे सिद्ध तैल का चर्मरोगों में उपयोग होता है । मात्रा—१/२-२ माशा । २०. कृष्ण जीरक हिं०-काला जीरा, स्या जीरा, स्याह जीरा, कृष्णजीरा । बं०-काल जीरें, कृष्णजीरा । म०-शहाजीरें, शाहाजीरं, कालेजीरे । गु०-स्याजीरूं । क०-करिजीरके, करिजिरेगे । ते०-शिमइसपू । ता०-शिमह शोम्बू । मा०-श्याजीरो । चुनाव०-गूंयूं । फा०-सियाहजीरा, स्याहजीरा, जीरेस्याह, जीरयेस्याह । अ०-कमूने किरमानी, कमून अस्वद । अं०-Black Caraway seed (ब्लॅक कॅरावे सीड) । ले०-Carum carvi Linn. (कॅरम् कॅरुइ) । Fam. Umbelliferae (अम्बेलिफेरी) । इसका क्षुप—उत्तरी हिमालय के पहाड़ी भागों में उत्पन्न होता है । इसकी खेती भारत के मैदानी भागों में एवं काश्मीर, कुमाऊँ, गढ़वाल, चम्बा आदि पहाड़ी स्थानों में की जाती है । यह अफगानिस्तान एवं ईरान में भी होता है । यह १-२ फूट ऊँचा, शाखा-कोमल, हरित, एकांतर; पत्र-बहुविभक्त; पुष्प-श्वेत, छत्राकार; फल-कुछ टेढ़ापन लिये लंबे, सुगंधि, भूरापन लिये हुये काले, करीब ७ मि० मि० तक लंबे एवं २ मि० मि० चौड़े एवं दोनों सिरों पर नोकीले होते हैं । रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल ३.१%-७% पाया जाता है । गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक और स्तन्यजनन है । आधमान, उदरशूल, अतिसार, अपचन, जीर्णज्वर आदि में इसका उपयोग किया जाता है । प्रसूतिकाल में दूध बढ़ाने के लिए इसको देते हैं । यूरोप में इसको शान्तिदायक, मस्तिष्क के लिए उत्तेजक और अपतंत्रक में उपयोगी मानते हैं । (१) इसके तैल का उपयोग अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिए एवं उनसे उत्पन्न हल्लास और मरोड़ को दूर करने के लिए किया जाता है । (२) इसके अर्क का उपयोग बच्चों का पेट फूलना, शूल आदि में अनुपान के रूप में किया जाता है । (३) अर्श में सूजन हो तो इसके क्वाथ से सेंकने से लाभ होता एवं गर्भाशय की पीड़ा में स्त्री को इसके क्वाथ में बैठाते हैं । मात्रा—१/२-२ माशा । नोट—एक अन्य प्रकार के जीरक का वर्णन जिसे संस्कृत में अरण्यजीरक और लैटिन में वर्नोनिया ॲन्थेल्मिण्टिका; कॉम्पोसिटी (Vernonia anthelmintica Willd; Fam. Compositae) कहते हैं, परिशिष्ट में देखें । २१. कालाजाजी (कलौंजी) हिं०-कलौंजी, कलवंजी, कलौंजी, मँगरेला, मंगरैल, मंगरैला । बं०-मोटा कालेजीरे, मोटकालजीर । म०- कलौंजी जीरे, कालेजीरे । गु०-कलौंजी जीरु । क०-करि जीरिगे । ते०-नल्लजील कारा । फा०-स्याहदाना ।