भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 278

हरीतक्यादिवर्गः २२७ लोग यह भी कहते हैं कि नीले चित्रक के सेवन करने से बाल काले हो जाते हैं और यदि गौ इसके क्षुप को केवल सूँघ ले अथवा इसकी जड़ दूध में डाली जावे तो दूध का रङ्ग काला हो जाता है। परन्तु इसमें कहाँ तक सत्यता है परीक्षा करने से ही मालूम हो सकती है।

अथ पञ्चकोलस्य लक्षणगुणानाह

पिप्पली पिप्पलीमूलं चव्यचित्रकनागरैः । पञ्चभिः कोलमात्रं यत्पञ्चकोलं तदुच्यते ।। ७२ ।। पञ्चकोलं रसे पाके कटुकंरुचिकृन्मतम् । तीक्ष्णोष्णं पाचनं श्रेष्ठं दीपनं कफवातनुत् ।। गुल्मप्लीहोदरानाहशूलघ्नं पित्तकोपनम् ।। ७३ ।। 'पञ्चकोल' के लक्षण तथा गुण—पीपल, पिपरामूल, चव्य, चीता तथा सोंठ ये सब पाँच द्रव्य यदि कोलमात्र अर्थात् आधा-आधा तोला की मात्रा में एकत्र किये जायँ तो उसी को 'पञ्चकोल' कहते हैं। पञ्चकोल—स्वाद तथा पाक में कटुरस युक्त, रुचिकारक, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य होता है। तथा पाचक अत्यन्त अग्निदीपक, कफ-वातनाशक, गुल्म, प्लीहा, उदरसम्बन्धी रोग, आनाह और शूल का नाश करने वाला तथा पित्त को कुपित करने वाला होता है। [७२-७३] मात्रा—५-१५ र० दिन में दो बार।

अथ षडूषणस्य लक्षणगुणानाह

पञ्चकोलं समरिचं षडूषणमुदाहृतम् । पञ्चकोलगुणं तत्तु रूक्ष्मुष्णं विषापहम् ।। ७४ ।। 'षडूषण' के लक्षण तथा गुण—ऊपर कहे हुये 'पञ्चकोल' के पीपल आदि पाँचों द्रव्यों के साथ यदि छठाँ द्रव्य 'मरिच' भी सम भाग में मिला दिया जाय तो उसे 'षडूषण' कहते हैं। पञ्चकोल के जो गुण कह आये हैं वे ही सब 'षडूषण' के समझने चाहिये, अन्तर केवल इतना ही है कि यह रूक्ष, उष्ण तथा विषनाशक भी होता है। [७४]

अथ यवान्या नामानि गुणाँश्चाह

यवानिकोग्रगन्धा च ब्रह्मदर्भाऽजमोदिका ।। ७५ ।। सैवोक्ता दीप्यका दीप्या तथा स्याद्यवसाह्वया । यवानी पाचनी रुच्या तीक्ष्णोष्णा कटुका लघुः ।। ७६ ।। दीपनी च तथा तिक्ता पित्तला शुक्रशूलहृत् । वातश्लेष्मोदरानाहगुल्मप्लीहकृमिप्रणुत् ।। ७७ ।। 'अजवायन' के नाम तथा गुण—यवानिका, उग्रगन्धा, ब्रह्मदर्भा, अजमोदिका, दीप्यका, दीप्या और यवसाह्वया ये सब नाम 'अजवाइन' के हैं। अजवाइन—पाचक, रुचिकारक, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य, कटुरसयुक्त, परिपाक में लघु, अग्निदीपक, तिक्तरसयुक्त, पित्तवर्धक एवम् शुक्र तथा शूल की नाशक है। और यह वात, श्लेष्मा, उदर सम्बन्धी रोग, आनाह, गुल्म, प्लीहा तथा कृमि की भी नाशक है। [७५-७७]

१४. अजवायन (यवानी)

हिं०—अजवायन, अजवाइन, अजमायन, जवाइन, जवाय़न, अजवाँ, अजोवां। बं०—यमानी, यउयान, योयान्, जोवान्। मं०—ओँवा, उंबा। गु०—अजमा, यवान, जवाइन, अजमो। क०—वोम, ओमु। ते०—वामु, ओममी, ओममु, ओमा। ता०—अमन, ओमम्, ओमन। मा०—अजवाण। कच्छ०—वोह्रा। काश्मी०—जविन्द। फा०—नानुखा, झिनियानस नानख़्वाह, जीनान्। अ०—कमूमे 'मुलुकी, अमूसा, तोलिबउल खुब्जा अं०—The Bishop's weed (दी विशॉप्स् वीड); Ajova seeds (अजोवां सीड्स), Lovage (लोहाज)। ले०—Carum copticum Benth & Hook (करम् कोप्टिकम्); Syn. Trachyspermum ammi Linn. (ट्रीकीस्पर्मम् अम्मी लिन); Syn. Ptychotis ajawan DC (प्टिकोटिस् अजोवाँ)। Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA