भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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२२६ भावप्रकाशनिघण्टुः होता है। गर्भाशय के ऊपर इसकी बहुत तीव्र संकोचक क्रिया होती है जिससे गर्भिणी में इसको किसी भी समय प्रयोग करने से एक दो प्रहर में गर्भपात हो जाता है लेकिन गर्भ हमेशा मृत ही होता है। गर्भपात के लिये आंतरिक प्रयोग के साथ-साथ इसको गर्भाशयमुख में प्रविष्ट करते हैं या इसका लेप करते हैं। इसके प्रयोग में यदि विशेष सावधानी न रक्खी जाय तो इससे रक्तस्राव, धातुनाश एवं कोथ आदि गंभीर उपद्रव उत्पन्न हो सकते हैं। अतः इसका प्रयोग गर्भिणी में कभी भी न करना चाहिये। विषम ज्वर में यकृत् प्लीहा वृद्धि होकर पाण्डु हो गया हो तो इसका सेवन करना चाहिये। सूतिका ज्वर में निर्गुण्डी के साथ इसके उपयोग से ज्वर कम होता है तथा दूषित आर्तव निकलकर मक्कलशूल भी दूर होता है। (१) अग्निमांद्य, अरोचक, अजीर्ण, अतिसार आदि में चित्रक, वायविडङ्ग एवं मुस्ता का प्रयोग करना चाहिये। (२) अर्श में इसे दही के साथ सेवन करना चाहिये। (३) यकृत् एवं प्लीहा वृद्धि में इसका क्षार मट्ठे के साथ उपयोगी है। (४) इसका उपयोग कुष्ठ, फिरङ्ग की द्वितीयावस्था आदि में लाभकारी है। चित्रक मूल बाह्य प्रयोग में तीव्र कृमिघ्न, दाहजनक एवं स्फोटोत्पादक है। आमवात, संधिशूल अङ्गघात आदि में इससे सिद्ध तैल की मालिश करने से लाभ होता है। प्लेग की गांठों पर गांठों को फोड़ने के लिये इसको काम में लाते हैं। श्वित्र एवं खालित्य में इसका लेप उपयोगी है। आमवातादि में स्फोटोत्पादन के लिये इसका लेप १५, २० मिनट से अधिक न रखना चाहिये। इससे उत्पन्न स्फोटों में पीड़ा बहुत होती है इसलिये जहाँ तक हो उसका प्रयोग न किया जाय। हानिकारक-फुफ्फुस के लिये मस्तगी एवं बबूल का गोंद तथा यकृत् के लिये गुलाब के फल एव चन्दन। मात्रा-१/२ से २ माशा। १२. लाल चीता हिं०-लाल चीत, लाल चीता, लालचित्रक, लाल चितउर इत्यादि। बं०-लालचिता, रक्तोचितो। म०- लालचित्रक। क०-क्रेम्पू, चित्रमूल। ते०-येर्राचित्रमूलम् ता०-शिवप्पु चित्रमूलम्, चित्तुरमोल, कोडिमूली। उ०- रक्तचिता, रकतचिता। मला०-चेक्कीकोटुवेरी। अं०-Rose coloured Leadwort (रोज .कलर्ड लेडवोर्ट) ले०-Plumbago rosea Linn. (प्लम्बैगो रोज़िया)। यह सिक्कम और खसिया की तराइयों में पाया जाता है। इसको वाटिकाओं में भी लगाते हैं परन्तु थोड़ी असावधानी से नष्ट हो जाता है इसका क्षुप-२-४ फूट ऊँचा, सदा हरा-भरा रहता है। गर्मी के दिनों में कुछ पुराने पत्ते सूखकर गिर जाते हैं। पत्ते-उक्त चित्रक के समान होते हैं। फूल-लाल और फल-सफेद चीते के समान लसीले होते हैं। लाल चित्रक गुणों में सफेद चित्रक की अपेक्षा अधि प्रभावशाली और तीव्र गुण सम्पन्न है, विशेष कर रुचिकारी, रसायन, शरीर को नवीन और स्थूल करने वाला, पारे को बाँधने वाला, लोहे को बेंधने वाला तथा कुष्ठ को नष्ट करने वाला है। इसकी थोड़ी मात्रा उत्तेजक तथा अधि मात्रा तीव्र मदकारी विष के समान हानिकारक होती है। [१२] १३. नीला चित्रक ले०-Plumbago capensis Thumb (प्लम्बैगो कॅपेनसिस थम्ब)। काले चित्रक का क्षुप-उक्त चित्रक के समान किन्तु पत्र चक्रिक क्रम में आते हैं। पुष्प सफेदी युक्त नीले रङ्ग के होते हैं। यद्यपि यह दक्षिण अफ्रीका का आदिवासी है तथापि बागों में लगाया हुवा मिलता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA