भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 251, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें२०० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ शुक्रलमाह- यस्माच्छुक्रस्य वृद्धिः स्याच्छुक्रलं हि तदुच्यते । यथा नागबलाऽऽद्याः स्युर्बीजं च कपिकच्छुजम् ।। २२६।। 'शुक्रल' गुण युक्त द्रव्य—जिस द्रव्य के सेवन से शुक्र की वृद्धि हो वह 'शुक्रल' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—गुलशकरी आदि तथा केवाँच का बीज ॥२२६॥ नागबला=गुल १शकरी इति लोके ।।२२६।। यहाँ 'नागबला' से लोक प्रसिद्ध 'गुलशकरी' का ग्रहण करना चाहिये ॥२२६॥ अथ शुक्रस्य जनकं रेचकञ्चाह- दुग्धं भाषाश्च भल्लातफलमज्जामलानि च। एतानि जनकानि स्यू रेचकानि च रेतसः ।। २२७।। शुक्र के जनक तथा रेचक गुण युक्त पदार्थ—दूध, उड़द, भिलावे के फल की मींगी और आँवला ये सब शुक्र के जनक तथा रेचक भी हैं ॥२२७॥ ❖ जनकानि=प्रभावाच्छीघ्रमेव रसाद्युत्पादनपूर्वकं शुक्रं जनयन्ति । रेचकानि=आधिक्यात्प्रवर्तयन्ति च ।। २२७।। यहाँ 'जनकानि' पद से अपने प्रभाव से शीघ्र ही रस रक्तादि को उत्पन्न करके शुक्र को उत्पन्न करने वाले' और 'रेचकानि' पद से वीर्य की अधिकता कर देने से क्षरण कराने वाले यह अर्थ समझना चाहिये ॥२२७॥ अथ शुक्रस्य प्रवर्त्तकं रेचकं स्तम्भकं क्षयकारकञ्चाह- प्रवर्तिनी स्त्री शुक्रस्य रेचनं बृहतीफलम् । जातीफलं स्तम्भकं स्यात्कालिङ्गं क्षयकारि च ।। २२८।। शुक्र के प्रवर्त्तक (रेचक), स्तम्भक तथा क्षयकारक पदार्थ—'स्त्री'-शुक्र का प्रवर्त्तन (क्षरण) कराने वाली होती है। 'बड़ी भटकटैया'-रेचन अर्थात् क्षरण कराने वाली है। 'जायफल'—स्तम्भन करने वाला और कलीदा का फल अर्थात् 'तरबूज'—क्षयकारक होता है ॥२२८॥ ❖ स्त्री-स्मरणकीर्त्तनदर्शनसम्भाषणस्पर्शनचुम्बनालिङ्गननिधुवनैः समस्तर्व्यस्तैश्च शुक्रस्य प्रवर्तिनी प्रवृत्तिकारिणी२। रेचनं बृहतीफलम्, बृहत्कण्टकारीफलमपि शुक्रस्य रेचकं प्रवर्त्तकम् । कालिङ्गं- कालिन्दफलम्' ।। २२८।। यहाँ 'स्त्री शुक्रस्य प्रवर्त्तिनी' इन पदों से 'स्त्री-स्मरण, कीर्तन, दर्शन, सम्भाषण, स्पर्श, चुम्बन, आलिङ्गन और सम्भोग इन सब कर्मों को एक साथ करने से अथवा अलग-अलग चाहे जो कोई करने से शुक्र की प्रवर्त्तिनी अर्थात् प्रवर्त्तन (क्षरण) कराने वाली होती है'। 'रेचनं बृहती-फलम्' इन पदों से 'बड़ी भटकटैया का फल भी शुक्र का रेचक अर्थात् प्रवर्त्तक होता है' तथा 'कालिङ्गम्' पद से 'कलोंदा का फल अर्थात् तरबूज' ये अर्थ समझना चाहिये ॥२२८॥ अथ रसायनमाह- रसायनन्तु तज्ज्ञेयं यज्जराव्याधिनाशनम् । यथा हरीतकी दन्ती गुग्गुलुश्च शिलाजतु ।। २२९।। रसायन गुण युक्त पदार्थ—'रसायन' गुण युक्त पदार्थ उसे कहते हैं जो वृद्धावस्था तथा व्याधियों को दूर करने वाला हो। जैसे—हरैं, दन्ती, गूगल और शिलाजीत ॥२२९॥ · १. 'गोरक्षचाकुलिया' इति पाठा. । २. क्वचित् 'राजकर्कटी' क्वचिच्च 'कालिन्दीफलम्' इत्यपि पाठा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA