भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 250

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १९९ अथ ग्राह्याह- दीपनं पाचनं यत्स्यादुष्णत्वाद् द्रवशोषकम्। ग्राहि तच्च यथा शुण्ठी जीरकं गजपिप्पली ।।२२१।। ग्राही गुण युक्त द्रव्य—जो दीपन तथा पाचन हो एवं उष्ण होने से द्रवपदार्थों का शोषण करने वाला हो वह ग्राही गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—सोंठ, जीरा और गजपीपल ॥२२१॥ अथ स्तम्भनमाह- रौक्ष्याच्छैत्यात्कषायत्वाल्लघुपाकाच्च यद्भवेत्। वातकृत्स्तम्भनं तत्स्याद्यथा वत्सकटुण्डुकौ ।।२२१।। स्तम्भन गुण युक्त द्रव्य—जो रूक्ष, शीतल, कषाय रस युक्त तथा लघुपाकी (शीघ्र पचनेवाला) होने से वातकारक होता है वह 'स्तम्भन' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—कुरैआ और सोनापाठा ॥२२२॥ ❖ वातकृत्=प्रतिलोमवातकृत्। स्तम्भनमधोगामि मलादीनाम्। वत्सकः (कुरैआ) टुण्डुकः (सोनापाठा) ।।२२२।। यहाँ 'वातकृत्' से 'वायुकारक अर्थात् अधोगामी वायु का प्रतिलोम करनेवाला अर्थात् ऊर्ध्वगामी करने वाला एवं ऊर्ध्वगामी को अधोगामी करने वाला' तथा 'स्तम्भन' पद से 'अधोगामी मलादि को रोकने वाला' और 'वत्सक' से 'कुरैआ' एवं 'टुण्डुक' से 'सोनापाठा' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२२२॥ अथ छेदनमाह- श्लिष्टान्कफादिकान्दोषानुन्मूलयति यद्बलात्। छेदनं तद्यथा क्षारा मरिचानि शिलाजतु ।।२२३।। 'छेदन' गुण युक्त द्रव्य—जो चिपके हुये कफादि दोषों को बलपूर्वक जड़ से अलग कर दे वह 'छेदन' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—क्षारपदार्थ, मरिच और शिलाजीत ॥२२३॥ ❖ क्षाराः=यवक्षारादयः ।।२२३।। यहाँ 'क्षार' से 'जवाखार' आदि का ग्रहण करना चाहिये ॥२२३॥ अथ लेखनमाह- धातून्मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत्। लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नीरमुष्णं वचा यवाः ।।२२४।। 'लेखन' गुण युक्त द्रव्य—जो देह के धातुओं तथा मलों को सुखा कर उल्लेखन करे अर्थात् कृश कर दे वह 'लेखन' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—शहद, गरम जल, वच तथा इन्द्रयव ॥ ❖ उल्लेखयेत्कृशीकुर्यात्। लेखनं=कृशीकारकम्। क्षौद्रं=मधु। यवाः=इन्द्रयवाः ।।२२४।। यहाँ 'उल्लेखयेत्' से 'उल्लेखन करे अर्थात् कृश कर दे', 'लेखन' से 'जो कृश न हो उसे कृश कर देने वाला', 'क्षौद्र' से 'शहद' और 'यव' से 'इन्द्रयव' अर्थ समझना चाहिये ॥२२४॥ अथ वाजीकरमाह- यस्माद् द्रव्याद्भवेत्स्त्रीषु हर्षो वाजीकरं हि तत्। यथाऽश्वगन्धा मुसली शर्करा च शतावरी ।।२२५।। 'वाजीकर' गुण युक्त द्रव्य—जिस द्रव्य के सेवन से स्त्री के विषय में हर्ष हो वह 'वाजीकर' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—असगन्ध, मुसली, शक्कर और शतावर ॥२२५॥ ❖ हर्षो=रन्तुं समुत्साहः ।।२२५।। यहाँ 'स्त्री के विषय में हर्ष अर्थात् स्त्री के साथ सम्भोग करने में उत्साह' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२२५॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA