भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

१९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ भेदनमाह- मलादिकमबद्धं यद्बद्धं वा पिण्डितं मलैः । भित्त्वाऽधः पातयति यद्भेद नं कटुकी यथा ।।२१७।। ‘भेदन’ गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य शिथिल अथवा गाढे एवं मलों से पिण्डाकार को प्राप्त हुये मलादि का भेदन करके नीचे गिराता है वह ‘भेदन’ गुण युक्त द्रव्य कहलाता है। जैसे—कटुकी ॥२१७॥ अबद्धं=शिथिलं, बद्धं=गाढं, मलैः=दोषैस्तत्रापि वातैः, बहुत्वमाधिक्यबोधनार्थ तैः पिण्डितं=गुटिकीकृतम् ।।२१७।। यहाँ ‘अबद्ध’ से शिथिल और ‘बद्ध’ से ‘गाढे’ एवं ‘मलैः’ से ‘दोषों से उसमें भी विशेष कर वायु से’ यह अर्थ समझना चाहिये। यहाँ ‘मलैः’ पद में जो बहुवचन का निर्देश किया है वह अधिकता का बोध कराने के लिये है, अतः ‘मलों से अर्थात् अधिक वायु से ‘पिण्डित’ (गुटिकागोली) की भाँति आकार को प्राप्त हुये’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥२१७॥ अथ रेचनमाह- विपक्वं यदपक्वं वा मलादि द्रवतां नयेत् । रेचयत्यपि तज्ज्ञेयं रेचनं त्रिवृता यथा ।।२१८।। ‘रेचन’ गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य पक्व अथवा अपक्व मलादिकों को द्रवीभूत (पतला) करके रेचन कराता है वह ‘रेचन’ गुण युक्त द्रव्य कहलाता है। जैसे—निसोथ ॥२१८॥ ❖ रेचयत्यपि=अधः पातयति च । त्रिवृता=पनिलर१ इति लोके ।।२१८।। यहाँ ‘रेचयत्यपि’ से नीचे गिराता है अर्थात् रेचन करता है’ तथा ‘त्रिवृता’ से ‘तेओडि अथवा पनिलर’ नाम से लोक प्रसिद्ध द्रव्य का ग्रहण करना चाहिये ॥२१८॥ अथ वमनमाह- अपक्वं पित्तश्लेष्माणं २बलादूर्ध्वं नयेत्तु यत् । वमनं तद्धि विज्ञेयं मदनस्य फलं यथा ।।२१९।। ‘वमन’ गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य अपक्व पित्त, कफ अन्न को बलपूर्वक ऊपर की ओर ले जाता है उसे ‘वमन’ गुण युक्त द्रव्य जानना चाहिये । जैसे—मयनफल ॥२१९॥ ❖ ऊर्ध्वं नयेन्मुखमार्गेण बहिष्कुर्यात् । मदनस्य फलं ‘मयनफल’ इति लोके ।।२१९।। यहाँ ‘ऊर्ध्वं नयेत्’ से ‘ऊपर की ओर लेजावे अर्थात् मुख के रास्ते से बाहर कर देवे’ तथा ‘मदनस्य फलम्’ से लोकप्रसिद्ध ‘मयनफल’ को ग्रहण करना चाहिये ॥२१९॥ अथ देहसंशोधनमाह- स्थानाद्बहिर्नयेदूर्ध्वमधो वा मलसञ्चयम् । देहसंशोधनं तत्स्याद् देवदालीफलं यथा ।।२२०।। ‘देहसंशोधन’ गुण युक्त द्रव्य—जो द्रव्य सञ्चित हुये मल को उसके रहने के स्थान से ऊपर अथवा नीचे के मार्ग से निकाल कर बाहर कर देवे वह ‘देह संशोधन’ गुण युक्त द्रव्य कहलाता है। जैसे—देवदाली का फल (घघरवेल) ॥२२०॥ ❖ देवदाली ‘सोनैआ’ इति लोके ।।२२०।। यहाँ ‘देवदाली’ से लोक प्रसिद्ध ‘सोनैआ’ का ग्रहण करना चाहिये ॥२२०॥ १. ‘तेओडि’ इति पाठा. । २. ‘नयत्यूर्ध्वमि’ति पाठा. ।