भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 252, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् २०९ अथ व्यवाय्याह- पूर्वं व्याप्याखिलं कार्यं ततः पाकञ्च गच्छति । व्यवायि तद् यथा भङ्गा फेनञ्चाहि समुद्भवम् ।।२३०।। 'व्यवायि' गुण युक्त पदार्थ—जो सेवन करने मात्र से ही सर्व प्रथम समस्त शरीर में अपनी क्रिया दिखाकर तदनन्तर परिपाक को प्राप्त होता है वह 'व्यवायि' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है । जैसे—भाँग या अफीम ।।२३०।। ❖ अन्यद् द्रव्यं पक्वं तद्¹ गुणं करोति । व्यवायि तु अपक्वमेव स्वगुणैः सकल शरीरं व्याप्य पाकं याति । अहिसमुद्भवं फेनम्=अफीम ।।२३०।। अन्य द्रव्य परिपक्व होने के बाद शरीर में अपना गुण दिखलाता है किन्तु 'व्यवायि' गुण युक्त द्रव्य विना परिपक्व हुये ही अपने गुणों से सारे शरीर में व्याप्त होकर बाद में परिपाक को प्राप्त करता है-अर्थात् परिपक्व होता है । यहाँ 'अहि समुद्भवं फेनम्' इस पदसे 'अफीम' का ग्रहण करना चाहिये ।।२३०।। अथ विकाश्याह- सन्धिबन्धांस्तु शिथिलान्यत्करोति विकाशि तत् । विशोष्यौजश्च धातुभ्यो यथा क्रमुककोद्रवौ ।।२३१।। 'विकाशि' गुण युक्त पदार्थ—को धातुओं से 'ओज' को सुखा कर दूर करता है तथा सन्धि-बन्धनों को शिथिल करता है वह 'विकाशि' गुण युक्त द्रव्य कहलाता है । जैसे—सुपारी या कोदो ।। ❖धातुभ्यः=सकलशरीरस्थेभ्यो वीर्येभ्यः । ओजः=उपधातुविशेषं विशोष्य । क्रमुकं=पूग-फलम् ।।२३१।। 'धातुभ्यः' अर्थात् सकल शरीर में स्थित वीर्य से, 'ओजः' अर्थात् उपधातु विशेष को सुखा कर, तथा 'क्रमुक' अर्थात् 'सुपारी' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२३१।। अथ मदकार्याह- बुद्धिं लुम्पति यद् द्रव्यं मदकारि तदुच्यते । तमोगुणप्रधानञ्च यथा मद्यं सुराऽऽदिकम् ।।२३२।। 'मदकारि' गुण युक्त पदार्थ—जो द्रव्य सेवन करने से बुद्धि का लोप कर दे वह तमोगुण प्रधान 'मदकारि' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है । जैसे—मद्य और सुरा आदि ।।२३२।। ❖ मदकारि=मादकम् ।।२३२।। यहाँ 'मदकारि' से 'मादक' अर्थ समझना चाहिये ।।२३२।। अथ विषमाह- व्यवायि च विकाशि स्याच्छ्लेष्मच्छेदि मदावहम् । आग्नेयं जीवितहरं योगवाहि स्मृतं विषम् ।।२३३।। 'विष' गुण युक्त पदार्थ—जो 'व्यवायि' विकाशी कफनाशक, मदकारक, आग्नेय, जीवन हरण करने वाला और योग वाही गुणों से युक्त होता है वह विष गुण युक्त पदार्थ कहलाता है अर्थात् विष में ये गुण होते हैं ।।२३३।। ❖ व्यवायि-सकलकायगुणव्यापनपूर्वकपाकगमनशीलम् । विकाशि-ओजःशोषणपूर्वकसन्धिबन्ध- शिथिलीकरणशीलम् । मदावहं-तमोगुणाधिक्येन बुद्धिविध्वंसकम् । आग्नेयम्=अधिकाग्निगुणम् । योगवाहि- संसर्गिगुणग्राहकम् । विषं लक्ष्यं, दृष्टान्तो वत्सनाभशक्तुकादिभिः ।।२३३।। यहाँ 'व्यवायि' से 'सम्पूर्ण शरीर में गुणों से व्याप्त होते हुये परिपाक को प्राप्त होनेवाला' 'विकाशि' से 'ओज को सुखाते हुये सन्धि बन्धनों को शिथिल कर देनेवाला', 'मदावहम्' से 'तमोगुण की अधिकता होने से बुद्धि का विध्वंस १. 'तद्गुणमिति पा. चिन्त्यम् ।