भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे करने वाला' 'आग्नेयम्' से 'अधिकता से अग्नि के गुणों से युक्त' और 'योगवाहि' से 'अपने संसर्गों के गुणों को ग्रहण करने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये। यहाँ 'विष' लक्ष्य है अतः इसका दृष्टान्त वत्सनाभ तथा सक्तुक आदि विषविशेष से समझना चाहिये ॥२३३॥ अथ प्रमाथ्याह- निजवीर्येण यद् द्रव्यं स्रोतोभ्यो दोषसञ्चयम्। निरस्यति प्रमाथि स्यात्तद्यथा मरिचं वचा ॥२३४॥ 'प्रमाथि' गुण युक्त पदार्थ—जो द्रव्य अपने वीर्य के द्वारा स्रोतों से सञ्चित हुये दोषों को दूर करता है वह 'प्रमाथि' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे—मरिच, वच आदि ॥२३४॥ ❖ दोषाः=वातादयः ॥२३४॥ यहाँ 'दोष' पदसे 'वातादि' का ग्रहण करना चाहिये ॥२३४॥ अथाभिष्यन्द्याह- पैच्छिल्याद्गौरवाद् द्रव्यं रुद्ध्वा रसवहाः शिराः। धत्ते यद्गौरवं तत्स्यादभिष्यन्दि यथादधि ॥२३५॥ 'अभिष्यन्दि' गुण युक्त पदार्थ—जो द्रव्य पिच्छिल तथा गुरु होने से रस वहन करने वाली शिराओं के मुखों का अवरोध कर शरीर में गुरुता उत्पन्न करे, वह 'अभिष्यन्दि' गुण युक्त पदार्थ कहलाता है। जैसे दधि ॥२३५॥ ❖ गौरवं शरीरे¹ ॥२३५॥ यहाँ 'गौरवम्' पद से 'शरीर में गुरुता' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२३५॥ अथ विदाह्याह- विदाहि द्रव्यमुद्गारमम्लं कुर्यत्तथा तृषाम्। हृदि दाहं च जनयेत्पाकं गच्छति तच्चिरात् ॥२३६॥ 'विदाहि' गुण युक्त द्रव्य—'विदाही' गुण युक्त द्रव्य वह कहलाता है जिसके सेवन करने से खट्टी डकार आवे, प्यास लगे, हृदय में दाह हो एवं देर से हजम हो ॥२३६॥ अथ योगवाह्याह- गृह्णाति योगवाहि द्रव्यं संसर्गिवस्तुगुणान्। पच्यमानं यथैतन्मधुजलतैलाज्यसूतलोहादिः ॥२३७॥ 'योगवाही' गुण युक्त पदार्थ—जो द्रव्य अन्य किसी द्रव्य के साथ पचता हुआ उसी अपने संसर्गी द्रव्य के सम्पूर्ण को ग्रहण करता है, वही 'योगवाहि' गुण युक्त कहलाता है। जैसे—मधु-जल-तैल-घी-पारा और लोहा आदि ॥२३७॥ अथ वीर्यमाह, तत्र वाग्भटः- उष्णाशीतगुणोत्कर्षाद् बुधैर्वीर्यं द्विधा स्मृतम्। यत्सर्वमग्नीषोमीयं दृश्यते भुवनत्रयम् ॥२३८॥ द्रव्यगत वीर्य के भेद—संसार में उष्ण और शीत गुण अधिकता होने से द्रव्यों के वीर्य दो प्रकार के हैं क्योंकि तीनों लोक में सभी पदार्थ अग्नीषोमीय अर्थात् अग्निसम्बन्धी 'आग्नेय' तथा सोमसम्बन्धी 'सौम्य' दिखाई पड़ते हैं ॥२३८॥ अथ तद्गुणानाह- उष्णं वातकफौ हन्यात् पित्तं² तु तनुते जराम्। शीतं वातकफातङ्काङ्कुरुते पित्तहत्परम् ॥२३९॥ १. 'शरीरस्ये'ति पाठः। २. 'हन्याच्छीतमि'ति पाठः।