भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् २०३ उष्ण तथा शीत वीर्यों के गुण—उष्णवीर्यवाला पदार्थ वात तथा कफ का नाश करता है और पित्त को बढ़ाता है एवं वृद्धावस्था को करता है और शीतवीर्य वाला पदार्थ वात तथा कफ सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करता है तथा पित्त को सर्वथा नाश करता है ॥२३९॥ अन्यच्च— तत्रोष्णं भ्रमतृड्ग्लानिस्वेददाहाशुपाकताम्। शमञ्च वातकफयोः करोति शिशिरं पुनः। ह्लादनं जीवनं स्तम्भं प्रसादं रक्तपित्तयोः ॥२४०॥ वीर्य सम्बन्धी गुणों के सम्बन्ध में अन्य वचन यह भी है कि—उष्णवीर्य वाला पदार्थ भ्रम, प्यास, ग्लानि, स्वेद और दाह को उत्पन्न एवं शीघ्र पाक करता है तथा वात और कफ का शमन करता है और शीतवीर्य वाला पदार्थ आह्लादजनक, जीवन के लिये हितकारी, स्तब्धताकारक तथा रक्तपित्त को निर्मल करने वाला होता है ॥२४०॥ अथ विपाकमाह— जाठरेणाग्निना योगाद्यदुदेति रसान्तरम्। रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥२४१॥ विपाक के लक्षण—मधुरादि छः रसयुक्त पदार्थों में जठराग्नि के द्वारा परिपाक होने पर जो दूसरे प्रकार के रसों का उदय होता है वही 'विपाक' नाम से कहा जाता है ॥२४१॥ अथ मधुरादिरसयुक्तपदार्थानां विपाकरसानाह— मिष्टः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रसः। कटुतिक्तकषायाणां पाकःस्यात्प्रायशः कटुः ॥१४२॥ मधुरादि रसों का विपाक सम्बन्धी रस—मधुर और लवण रस युक्त पदार्थ का विपाक मधुर होता है और अम्ल रस का विपाक अम्ल होता है एवं कटु, तिक्त तथा कषाय रस का विपाक प्रायः करके कटु होता है ॥२४२॥ ❖ तथा च वाग्भटः— त्रिधा रसानां पाकः स्यात्स्वाद्वम्लकटुकात्मकः। प्रायः पदेन व्रीहिः स्यात्स्वादुरम्लो विपाकतः ।। शिवा कषाया मधुरा पाके, शुण्ठी कटुका मधुरपाकेत्यादि ।।२४२।। विपाक के सम्बन्ध में 'वाग्भट' का मत—मधुर, अम्ल तथा कटु रस भेद से विपाक तीन प्रकार का होता है और 'कटु, तिक्त तथा कषाय रस का विपाक प्रायः करके कटु होता है' इस जगह जो 'प्रायः' पद है उससे यह समझना चाहिये कि बहुत से स्थल पर उक्त नियम का व्यभिचार (नियमानुसार न होना) भी देखा जाता है। जैसे—व्रीहि (धान्य) मधुर रस युक्त है तथापि इसका नियमानुसार मधुर न होकर अम्ल ही विपाक होता है और हरड़ कषाय रस युक्त है, किन्तु विपाक मधुर होता है एवं सोंठ कटुरस युक्त हैं किन्तु विपाक मधुर होता है इत्यादि बातें और भी यहाँ समझना चाहिये ॥२४२॥ अथ विपाकानां गुणानाह— श्लेष्मकृन्मधुरः पाको वातपित्तहरो मतः। अम्लस्तु कुरुते पित्तं वातश्लेष्मगदापहः ॥२४३॥ कटुः करोति पवनं कफं पित्तञ्च नाशयेत्। विशेष एवं रसतो विपाकानां निदर्शितः ॥२४४॥ मधुरादि विपाकों के गुण—मधुरविपाक—कफकारक और वात पित्त को हरण करने वाला होता है। अम्लविपाक— पित्तकारक और वात तथा कफ सम्बन्धी रोगों का नाशक होता है और कटुविपाक—वातकारक एवं कफ तथा पित्त का नाशक होता है। यही विपाकसम्बन्धी रसों की विशेषता है ॥२४३-२४४॥ १. 'तुल्यमपी'ति पाठान्तरं चिन्त्यम्।