भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ प्रभावमाह- रसादिसाम्ये यत्कर्म विशिष्टं तत्प्रभावजम् । दन्ती रसाद्यैस्तुल्यापि१ चित्रकस्य विरेचनी ।। २४५ ।। मधूकस्य च मृद्वीका घृतं क्षीरस्य दीपनम् । प्रभावस्तु यथा धात्री लकुचस्य रसादिभिः ।। २४६ ।। समाऽपि कुरुते दोषत्रितयस्य विनाशनम् ।। २४७ ।। प्रभाव के लक्षण—रसादि से तुल्यता होने पर भी किसी-किसी पदार्थों में जो कर्मों की विशेषता अर्थात् कर्मों की भिन्नता दिखाई पड़ती है वह प्रभावज अर्थात् उन्हीं पदार्थों के प्रभाव से उत्पन्न समझना चाहिये । जैसे—चीता के रसादि समान रसवाला होने पर भी दन्ती विरेचन (दस्तावर) होती है किन्तु चीता नहीं होता है । तथा महुए के फूल के साथ मुनक्के के एवं दूध के साथ घृत के रसादि की तुल्यता होने पर भी मुनक्का और घृत अग्नि का दीपक होता है किन्तु महुआ का फूल तथा दूध दीपक नहीं होता । लकुच अर्थात् बड़हर के रसादि के साथ आँवले की तुल्यता होने पर भी वह त्रिदोष का नाशक होता है किन्तु बड़हर नहीं होता तथा इस प्रकार की जो कर्मों में भिन्नता होती है, वह द्रव्यों के प्रभाववश से ही होती है, ऐसा समझना चाहिये ।। २४५-२४७ ।। क्वचित्तकेवलं द्रव्यं कर्म कुर्यात्प्रभावतः । ज्वरं हन्ति शिरोबद्धा सहदेवीजटा यथा ।। २४८ ।। किसी-किसी स्थल में द्रव्य स्वयं ही कर्म करता है तथा किसी-किसी स्थल में प्रभाव में प्रभाव द्वारा कर्म करता है । जैसे—सहदेवी की जड़, शिर में बाँधने से ज्वर को दूर करती है ।। २४८ ।। तथा नानौषधियोगेषु फलं प्रति स्वभाव एव आश्रवणीयो न तु यत्र रसादिरूपहेतुविचारः कर्त्तव्यः । यत आह सुश्रुतः- अमीमांस्यान्यचिन्त्यानि१ प्रसिद्धानि स्वभावतः । आगमेनोपयोज्यानि भेषजानि विचक्षणैः ।। प्रत्यक्षलक्षणफलाः प्रसिद्धाश्च स्वभावतः । नौषधीहेतुभिर्विद्वानपरीक्षेत कदाचन ।। २४८ ।। जहाँ अनेक प्रकार की ओषधियों का योग होने से जो फल होता है, वहाँ पर उस फल के होने में उन ओषधियों के योग के स्वभाव को ही हेतु समझना चाहिये न कि उन ओषधियों के रसादि को हेतु समझना चाहिये । क्योंकि 'सुश्रुत' में भी कहा है कि—जितने सम्पूर्ण गुण ओषधियों के प्रसिद्ध हैं, वे सब स्वभावतः हैं अतः उनके प्रयोग के विषय में कोई मीमांसा (विचार) तथा चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है । विद्वान् को चाहिये कि जैसा शास्त्र में ओषधियों के योगों का उपदेश किया गया है उसी के अनुसार वे प्रयोग करें और उन्हें यह भी करना चाहिये कि ओषधियाँ स्वभावतः प्रसिद्ध होती हैं क्योंकि उनके लक्षण तथा फल प्रत्यक्ष हैं । अत एव ओषधियों के योगों में उनके रसादिकों को हेतु मान कर उनकी कभी वे परीक्षा न करें ।। २४८ ।। विरुद्धगुणसंयोगे भूयसाऽल्पं हि जीयते ।। रसं विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तान्यपोहति ।। २४९ ।। इति मिश्रप्रकरणे मिश्रवर्गः प्रथमः समाप्तः ।। १ ।। परस्पर विरुद्ध गुण युक्त ओषधियों का संयोग होने पर जो ओषधि प्रबल होती है, वह दुर्बल को दबा लेती है । जैसे—विपाक-रस को दबा लेता है और वीर्य-रस तथा विपाक इन दोनों को दबा लेता है एवं प्रभाव-रस विपाक तथा वीर्य इन तीनों को ही दबा लेता है ।। २४९ ।। इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायां षष्ठममिश्रप्रकरणम् समाप्तम् ।। ६ ।। १. 'अमी सामान्ये'ति पाठान्तरं प्रामादिकम् ।