भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ सप्तजातेर्हरीतक्या उत्पत्तिस्थानान्याह [१विन्ध्याद्रौ विजया हिमाचलभवा स्याच्चेतकी पूतना सिन्धौ स्यादथ रोहिणी निगदिता जाता प्रतिष्ठानके। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । चम्पायाममृताऽभया च जनिता देशे सुराष्ट्राह्वये जीवन्तीति हरीतकी निगदिता सप्त प्रभेदा बुधैः ।।१।।] हरीतकी के उत्पत्तिस्थान—विन्ध्य पर्वत पर विजया, हिमालय पर चेतकी, सिन्धु देश में पूतना, प्रत्येक स्थानों में रोहिणी, चम्पा देश में अमृता तथा अभया एवं सोरठ देश में जीवन्ती जाति की हरीतकी के उत्पन्न होने से उक्त प्रकार के सात भेद विद्वानों ने कहे हैं ।।१।। अथ तेषां पृथगलक्षणान्याह अलाबुवृत्ता विजया वृत्ता सा रोहिणी स्मृता। पूतनाऽस्थिमती सूक्ष्मा कथिता मांसलाऽमृता ।।९।। पञ्चरेखाऽभया प्रोक्ता जीवन्ती स्वर्णवर्णिनी। त्रिरेखा चेतकी ज्ञेया सप्तानामियमाकृतिः ।।१०।। सात प्रकार की हरीतकी के पृथक्-पृथक् लक्षण—'विजया' हरीतकी लौकी की भाँति गोल, 'रोहिणी' का आकार गोल, 'पूतना' की गुठली बड़ी तथा आकार सूक्ष्म, 'अमृता' हरीतकी मांसल (गूदेदार), 'अभया' पाँच रेखाओं से युक्त, 'जीवन्ती' सोने के समान रङ्ग वाली और 'केतकी' तीन रेखाओं से युक्त होती है। इस प्रकार सातों प्रकार की हरीतकी के ये आकार हैं। [९-१०] अथ हरीतकीप्रयोगानाह विजया सर्वरोगेषु रोहिणी व्रणरोहिणी। प्रलेपे पूतना योज्या शोधनार्थेऽमृता हिता ।।११।। अक्षिरोगेऽभया शस्ता जीवन्ती सर्वरोगहृत् । चूर्णार्थे चेतकी शस्ता यथायुक्तं प्रयोजयेत् ।।१२।। चेतकी द्विविधा प्रोक्ता श्वेता कृष्णा च वर्णतः । षडङ्गुलायता शुक्ला कृष्णा त्वेकाङ्गुला स्मृताः ।।१३।। काचिदास्वादमात्रेण काचिद्गन्धेन भेदयेत्। काचित्स्पर्शेन दृष्ट्याऽन्या चतुर्द्धा भेदयेच्छिवा ।।१४।। चेतकीपादपच्छायामुपसर्पन्ति ये नराः। भिद्यन्ते तत्क्षणादेव पशुपक्षिमृगादयः ।।१५।। चेतकी तु धृता हस्ते यावत्तिष्ठति देहिनः । तावद्भिद्येत वेगाैस्तु प्रभावात्रात्र संशयः ।।१६।। नृपाणां सुकुमाराणां कृशानां भेषजद्विषाम्। चेतकी परमा शस्ता हिता सुखविरेचनी ।।१७।। सप्तानामपि जातीनां प्रधाना विजया स्मृता। सुखप्रयोगा सुलभा सर्वरोगेषु शस्यते ।।१८।। हरीतकी के प्रयोग—'विजया' हरीतकी का प्रयोग सभी रोगों में होता है। 'रोहिणी' व्रण पूरण करनेवाली होती है। 'पूतना' का प्रलेप के लिये प्रयोग करना चाहिये। 'अमृता' शोधन कर्म के लिये हितकर है। आँख के रोगों में 'अभया' उत्तम होती है और 'जीवन्ती' सम्पूर्ण रोगों का हरण करने वाली होती है। एवं चूर्ण के लिये 'चेतकी' उत्तम होती है। अतः जिस जाति की हरीतकी का जहाँ जिन रोगों में प्रयोग करना कहा हुआ है, उसका वहाँ पर प्रयोग करना चाहिये। 'चेतकी' श्वेत और कृष्ण दो प्रकार की होती है। उनमें शुक्ल वर्ण वाली छः अङ्गुल की तथा कृष्ण वर्ण वाली एक अङ्गुल की लम्बी होती है। इनमें कोई हरीतकी खाने मात्र से, कोई सूँघने से, कोई स्पर्श करने से तथा कोई देखने मात्र से ही मल का भेदन करती हैं अर्थात् दस्त साफ होता है। इस प्रकार हरीतकी चार प्रकार से दस्त कराती है। जो मनुष्य चेतकी जाति की हरड़ के पेड़ की छाया के नीचे पहुँच जाते हैं, उनको उसी समय दस्त आने लगता है। यहाँ तक कि पशु,