भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः २०९ पक्षी, मृगादि की भी यही दशा हो जाती है और 'चेतकी' हरड़ को जब तक प्राणी अपने हाथ में धारण किये रहता है, तब तक उसके प्रभाव से उसे वेग से दस्त होता रहता है, इसमें सन्देह नहीं है। जो राजा हैं तथा सुकुमार या कृश हैं किंवा विरेचक औषध खाने से भागनेवाले हैं, उनके लिये 'चेतकी' हरड़ परम हितकारी एवं उत्तम होती है। क्योंकि वह सुखपूर्वक दस्त लाती है। पूर्वोक्त सात जातियों में 'विजया' जाति की जो हरीतकी होती है, वही औरों की अपेक्षा प्रधान है क्योंकि सुलभ होने से उसका प्रयोग सुखपूर्वक होता है तथा वह सभी रोगों में देने के लिये भी उत्तम होती है। [११-१८] अथ हरीतकीगुणानाह हरीतकी पञ्चरसाऽलवणा तुवरा परम्। रूक्षोष्णा दीपनी मेध्या स्वादुपाका रसायनी ।।१९।। चक्षुष्या लघुरायुष्या बृंहणी चानुलोमिनी। श्वासकासप्रमेहार्शः कुष्ठशोथोदरक्रिमीन् ।।२०।। वैस्वर्यग्रहणीरोगविबन्धविषमज्वरान् । गुल्माध्मानतृषार्छर्दिहिक्काकण्डूहृदामयान् ।।२१।। कामलां शूलमानाहं प्लीहानञ्च यकृत्तथा। अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रञ्च मूत्राघातञ्च नाशयेत् ।।२२।। हरीतकी के गुण-हरड़ में लवण रस से भिन्न पाँच (मधुर, अम्ल, कटु, कषाय, तिक्त) रस रहते हैं किन्तु औरों की अपेक्षा कषाय रस ही अधिक रहता है। हरीतकी रूक्ष, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, मेधा (धारणाशक्ति) के लिये हितकारी, मधुर विपाकवाली, रसायन (वृद्धावस्था तथा व्याधियों को दूर करनेवाली), नेत्रों के लिये हितकर, पचने में लघु (जल्दी पचने वाली), आयुवर्धक, बृंहण (शरीर में मांसादि की वृद्धि करने वाली) और अनुलोमन (मलादि को नीचे की ओर प्रेरित करने वाली) होती है। इसके सेवन से श्वास, कास, प्रमेह, बवासीर, कुष्ठ, शोथ, पेट के कृमि (अथवा उदर सम्बन्धी रोग और कृमि), स्वरभेद (आवाज की खराबी), ग्रहणी सम्बन्धी रोग तथा विबन्ध (मलमूत्रादि की विबद्धता अर्थात् रुक जाना), विषमज्वर, गुल्म, उदराध्मान, तृषा, वमन, हिचकी, खुजली, हृद्रोग, कामला, शूल, आनाह, प्लीहा, यकृत्, अश्मरी (पथरी), मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्राघात ये सब रोग दूर होते हैं। [१९-२२] अथ हरीतक्याः प्रभावनिबन्धनं दोषहन्तृत्वं न तु रसनिबन्धनमित्याह स्वादुतिक्तकषायत्वात्पित्तहृत्कफहृत्त सा। कटुतिक्तकषायत्वादम्लत्वाद्वातहृच्छिवा ।।२३।। पित्तकृत्कटुकाम्लत्वाद्वातकृन्न कथं शिवा ।।२४।। प्रभावाद्वोषहन्तृत्वं सिद्धं यत्तत्प्रकाश्यते। हेतुभिः शिष्यबोधार्थं नापूर्वं क्रियतेऽधुना ।।२५।। कर्मान्यत्वं गुणैः साम्यं दृष्टमाश्रयभेदतः। यतस्ततो नेति चिन्त्यं धात्रीलकुचयोर्यथा ।।२६।। हरीतकी का प्रभाव-हरड़ में मधुर, तिक्त और कषाय रस रहता है, अतएव यह पित्तनाशक और कटु तिक्त तथा कषाय रस होने से कफनाशक है तथा अम्ल रस होने से वायु का भी शमन करती है। अब यहाँ पर यह प्रश्न होता है कि जब हरड़ में कटु तथा अम्ल रस है, तब क्यों नहीं यह पित्त तथा वातकारक होती है ? इसका उत्तर यह है कि- यहाँ पर जो हरड़ तीनों दोषों को दूर करती है वह इसके प्रभाव से ही सिद्ध है किन्तु फिर भी जो ऊपर हेतुओं का निर्देश करते हुये 'दोषों का नाश करना' बताया गया वह शिष्यों को समझाने के लिये, क्योंकि यह (दोषों का नाश करना) कोई अपूर्व बात नहीं कही गई, बल्कि जो कही गई वह उसके प्रभाव से पहले से ही सिद्ध थी। तात्पर्य यह है कि वस्तुतः हरड़ जो दोषों का नाश करती है वह अपने प्रभाव से ही करती है। फिर जो पूर्व में यह कहा गया है कि- 'मधुरादि रस होने से पित्तनाशक, कटु तिक्तादि रस होने से कफनाशक एवं अम्ल रस होने से वातनाशक', वह केवल शिष्यों को समझाने के लिये अर्थात् 'इन-इन रसों को दूर करने की शक्ति रहती है', शिष्यों को यही बात समझाने के लिये हेतुओं का निर्देश करते हुये हरड़ की त्रिदोषनाशकता बताई गई और जब कि-समान गुणों से युक्त होते हुये भी आश्रय भेद से द्रव्यों के कर्म में भिन्नता देखी जाती है तब हरड़ में स्थित जो कटु तथा अम्ल रस हैं, वह क्यों नहीं पित्त तथा वात २७ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA