भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १६९ अर्थात् तरुण (नवीन) ही हो तो उस समय काढ़ा आदि देने के द्वारा चिकित्सा करना लाभदायक नहीं होता और जो चिकित्सा काल अर्थात् चिकित्सा का उपयुक्त समय प्राप्त होने पर नहीं की जाती अर्थात् पीछे (चिकित्सा का समय बीत जाने पर) की जाती है वह निष्फल होती है । जैसे कि किसी प्रकार से दाह के शान्त हो जाने पर पीछे शीतल लेपादि द्वारा चिकित्सा करना व्यर्थ होता है । उसी प्रकार रोग की अपेक्षा हीन चिकित्सा तथा अतिरिक्त (रोग की अपेक्षा अधिक) चिकित्सा भी साध्य रोगों में सिद्ध (लाभदायक) नहीं होती ॥२६॥ अथातिरिक्तां हीनां च क्रियां वर्जयन्नाह- विकारेऽल्पे महत्कर्म क्रिया लघ्वी गरीयसी । द्वयमेतदकौशल्यं कौशल्यं युक्तकर्मता ॥२७॥ क्रियायास्तु गुणालाभे क्रियामन्यां प्रयोजयेत् । पूर्वस्यां शान्तवेगायां न क्रियासङ्करो हितः ॥२८॥ अतिरिक्त तथा हीन चिकित्सा का निषेध—स्वल्प रोग में उग्र ओषधियों द्वारा बड़ी चिकित्सा करना तथा प्रबल रोग में मामूली ओषधियों द्वारा साधारण चिकित्सा करना दोनों ही चिकित्सक निपुण नहीं हैं इस बात के द्योतक होते हैं । अतएव चिकित्सक की निपुणता इसी में हैं कि वह रोग के अनुकूल साधारण या विशेष चिकित्सा करे । रोग की शान्ति के लिये जो चिकित्सा की जाय, उससे यदि लाभ न होता हो तो दूसरी चिकित्सा करनी चाहिये किन्तु वह भी उसी अवस्था में जब कि पूर्व की हुई चिकित्सा का वेग शान्त हो जाय, क्योंकि चिकित्साओं का मेल होना हितकारक नहीं होता ॥२७-२८॥ भिन्नरूपाभिस्तु क्रियाभिः सांकर्यमपि न दोषाय । यत आह- क्रियाभिस्तुल्यरूपार्भिर्न क्रियासङ्करो हितः । ताभिस्तु भिन्नरूपाभिः साङ्कर्यं नैव दुष्यतिं ।। परस्पर भिन्न स्वरूपवाली चिकित्साओं का एकत्र विधान—परस्पर समान स्वरूपवाली चिकित्साओं के द्वारा जो चिकित्सा का मेल होता है, वही हितकर नहीं होता किन्तु यदि वे ही भिन्न स्वरूप वाली होवें तो उनका मेल होना हितकारी ही होता है ॥२९॥ ❖ अत एवोक्तम्- लङ्घनं बालुकास्वेदो नस्यं निष्ठीवनं तथा । अवलेहोऽञ्जनं चापि प्राक् प्रयोज्यं त्रिदोषजे ॥४॥ अत एव कहा है कि—लङ्घन (उपवास कराना), बालुकास्वेद (बालू के द्वारा पसीना निकलवाना), नस्य (ओषधियों के रस का नस लेना), निष्ठीवन (ओषधियों के द्वारा मुख से लार गिरवाना), अवलेह (ओषधियों की चटनी बना कर चटाना) और अञ्जन (आँखों में ओषधियों का अञ्जन लगाना), इन सब क्रियाओं का त्रिदोषज (सान्निपातिक) ज्वर में सबसे पहले प्रयोग करना चाहिये ॥४॥२९॥ ❖ ज्वर इति शेषः ।।४।।२९।। यहाँ श्लोक में 'त्रिदोषजे' के आगे यद्यपि 'ज्वरे' ऐसा नहीं कहा गया है तथापि 'त्रिदोषज ज्वर में' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥४॥२९॥ न चैकान्तेन निर्दिष्टे शास्त्रे निविशते बुधः । स्वयमप्यत्र भिषजा तर्कणीयं चिकित्सता ॥३०॥ जो आयुर्वेद शास्त्र के विद्वान् चिकित्सक हैं वे केवल शास्त्र में कही हुई चिकित्साविधि के ऊपर निर्भर नहीं रहते हैं अतः वैद्य को चाहिये कि चिकित्सा करते समय स्वयं भी चिकित्सा के विषय में विचार करें ॥३०॥ यत आह- उत्पद्यते च साऽवस्था दोषकालबलं प्रति । यस्यां कार्यमकार्यं स्यात्कर्म कार्यं विवर्जितम् ॥३१॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA