भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे चिकित्सक को चाहिये कि वह पहले रोग का परिज्ञान करने में अर्थात् रोग की अवस्था कैसी है इसके समझने में आदि से लेकर अन्त तक प्रयत्न करे, तत्पश्चात् ओषधों का जैसा विधान हो उसके अनुकूल 'चिकित्सा' करे ॥२१॥ चिकित्सितमित्यत्र भावे क्तः ॥२१॥ 'चिकित्सितम्' इस प्रयोग में भाव में क्त प्रत्यय होने से इसका 'चिकित्सा' अर्थ होता है ॥२१॥ विकारनामाकुशलो न जिह्रीयात्कदाचन । न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः ॥२१॥ यदि कोई वैद्य ऐसा हो कि वह सभी विकार अर्थात् रोगों का नाम न बतला सके तो उसे कभी लजाना नहीं चाहिये क्योंकि सम्पूर्ण रोगों की स्थिति नाम के द्वारा ही नियत नहीं है ॥२२॥ ❖ न जिह्रीयान्न लज्जेत् । ध्रुवा=नियता ॥२२॥ 'न जिह्रीयात्' का 'लजाना नहीं चाहिये' तथा ध्रुवा' पद का 'नियत' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२२॥ नास्ति रोगो बिना दोषैर्यस्मात्तस्माच्चिकित्सकः । अनुक्तमपि दोषाणां लिङ्गैर्व्याधिमुपाचरेत् ॥२३॥ बिना दोषों के कोई रोग नहीं होता अतः चिकित्सक को चाहिये कि जिन रोगों के नामों का शास्त्रों में उल्लेख न हो तो भी दोषों के लक्षणों से ही उन रोगों की चिकित्सा करे ॥२३॥ ये न कुर्वन्त्यसाध्यानां चिकित्सां ते भिषग्वराः । अतो वैद्यैः श्रमः कार्यः साध्यासाध्यपरीक्षणे ॥२४॥ जो वैद्य असाध्य रोगों की चिकित्सा नहीं करते वे परम चतुर कहलाते हैं अतः रोग साध्य अथवा असाध्य है, इसकी परीक्षा करने में वैद्यों को अवश्य श्रम करना चाहिये ॥२४॥ (१रोगज्ञानोपाया अग्रे वक्ष्यन्ते ॥२४॥) रोगज्ञान का उपाय आगे (चिकित्साप्रकरण में) कहेंगे ॥२४॥ अथ चिकित्सापद्धतिमाह- शीते शीतप्रतीकारमुष्णे तूष्णनिवारणम् । कृत्वा कुर्यात्क्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत् ॥२५॥ चिकित्सा करने की पद्धति—शीत से उत्पन्न रोग में शीत का और गर्मी से उत्पन्न रोग में गर्मी का प्रतीकार कर जो उपयुक्त चिकित्सा हो उसे करना चाहिये । किन्तु चिकित्सा का समय उपस्थित होने पर उसे नहीं छोड़ना चाहिये ॥२५॥ अप्राप्तेवा क्रियाकाले प्राप्तेवा न क्रिया कृता । क्रियाहीनाऽतिरिक्ता च साध्येष्वापि न सिध्यति ।।२६।। चिकित्सा का समय होने के पूर्व ही चिकित्सा करने पर अथवा चिकित्सा का समय होने पर चिकित्सा न करके बाद में चिकित्सा करने पर किंवा हीन चिकित्सा अर्थात् प्रबल रोग में स्वल्प चिकित्सा अथवा अतिरिक्त चिकित्सा अर्थात् स्वल्प रोग में प्रबल चिकित्सा करने पर जो साध्य रोग हैं, उनमें भी लाभ नहीं होता अर्थात् रोग से आराम नहीं होता है ॥२६॥ ❖ अयमर्थः-काले=चिकित्साऽवसरे । अप्राप्ते=अनागते । या क्रिया=चिकित्सा । यथा ज्वरे जीर्णतामप्राप्ते तरुण एव कषायदानक्रिया न सिद्ध्यति । या च क्रिया चिकित्साऽवसरे प्राप्ते न कृता । अर्थात्पश्चात्कृता । यथा दाहे कथञ्चिच्छान्ते पश्चाच्छीतानुलेपनादि क्रिया तथा हीनाऽतिरिक्ता च क्रिया साध्येष्वापि न सिध्यति ।। २६ ।। यहाँ विशेष-विशेष पदों का यह अर्थ है कि—'काल' अर्थात् चिकित्सा का अवसर, अप्राप्त अर्थात् 'नहीं प्राप्त होने पर' जो 'क्रिया' (चिकित्सा) है, वह साध्य रोगों में भी नहीं काम देती, जैसे कि यदि ज्वर जीर्ण न हुआ हो १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।