भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १६५ अथ साध्यादिभेदेन त्रिविधान् रोगानाह- साध्या याप्या असाध्याश्च व्याधयस्त्रिविधाः स्मृताः । सुखसाध्यः कष्टसाध्यो द्विविधः साध्य उच्यते ॥५॥ साध्यादि भेद से तीन प्रकार के रोग—साध्य, याप्य और असाध्य भेद से रोग तीन प्रकार के होते हैं उनमें ‘साध्य’ भी दो प्रकार का होता है—सुखसाध्य और कष्टसाध्य ॥५॥ अथ याप्यलक्षणमाह- यापनीयं तु तं विद्यात्क्रिया धारयते हि यम् । क्रियायां तु निवृत्तायां सद्यो यश्च विनश्यति ।। प्राप्ता क्रिया धारयति सुखिनं याप्यमातुरम् । प्रपतिष्यदिवागारं स्तम्भो यत्नेन योजितः ।।७।। ‘याप्य’ के लक्षण—‘याप्य’ रोग उसे कहते हैं जिस रोग की चिकित्सा करने से रोगी स्वस्थ रहता हो, किन्तु चिकित्सा बन्द कर देने पर रोग बढ़ जाने से रोगी शीघ्र मर जाता हो । जैसे यत्न पूर्वक स्तम्भ खड़ा करने से गिरते हुए मकान खड़ा रहता है वैसे ही याप्य रोगों में उपयुक्त चिकित्सा करने से वह भी रोगी को मरने से बचा कर सुखपूर्वक रखता है ॥६-७॥ अथ साध्ययाप्ययोश्चिकित्साऽऽवश्य कत्वमित्याह- साध्या याप्यत्वमायान्ति याप्यश्चाध्यतां तथा । घ्नन्ति प्राणानसाध्यास्तु नराणामक्रियावताम् ।।८।। साध्य-याप्य रोगों से युक्त रोगी की आवश्यक किचित्सा—जिनकी चिकित्सा नहीं हो रही है ऐसे जो रोगी हैं, उनके जो साध्य रोग हैं वे वाप्य के रूप में हो जाते हैं और जो याप्य रोग हैं, वे असाध्य के रूप में परिणत हो कर प्राणों को नष्ट कर देते हैं अतः इन सबों की किचित्सा करना अत्यावश्यक है ॥८॥ अक्रियावतां=चिकित्सारहितानाम् ।।८।। ‘अक्रियावताम्’ का ‘चिकित्सा से रहित रोगी के’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥८॥ अथोपद्रवस्य लक्षणमाह- रोगारम्भकदोषस्य प्रकोप दुपजायते । योऽन्यो विकारः स बुधैरुपद्रव इहोदितः ।।९।। उपद्रव के लक्षण—कुपथ्यवश रोगों के उत्पन्न करने वाले दोषों के अत्यन्त कुपित होने से जो रोग के अतिरिक्त दूसरा विकार उत्पन्न हो जाता है, उसे ‘उपद्रव’ कहते हैं ॥९॥ अथारिष्टस्य लक्षणमाह- रोगिणो मरणं यस्मादवश्यम्भावि लक्ष्यते । तल्लक्षणमरिष्टं स्याद्रिष्टं चापि तदुच्यते ।।१०।। अरिष्ट के लक्षण—जिस लक्षण के प्रकट होने से ‘रोगी अवश्य मर जायगा’ ऐसा मालूम पड़े उसे ‘अरिष्ट’ तथा ‘रिष्ट’ भी कहते हैं ॥१०॥ अथ चिकित्साया लक्षणमाह- या क्रिया व्याधिहरणी सा चिकित्सा निगद्यते । दोषधातुमलानां या साम्यकृत्सैव रोगहृत् ।।११।। चिकित्सा के लक्षण—जिस क्रिया के द्वारा व्याधि का नाश हो अर्थात् जो क्रिया दोष, धातु तथा मल, इन सबों को सम भाव में रखती हुई रोगों को हरण करनेवाली हो, उसी को ‘चिकित्सा’ कहते हैं ॥११॥ ❖ क्रियाऽत्र कर्म । व्याधिर्हन्यतेऽनयेति व्याधिहरणी । करणाधिकरणयोश्चेति सूत्रेण करणार्थेल्युट् ।।११।।