भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 1167 में से

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१६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मिष्टमम्लं दधि स्निग्धं दिवास्वप्नं च दुर्जरम्। अवश्यायमपि प्राज्ञो वसन्ते परिवर्जयेत्।।३५४।। वसन्त ऋतु के नियम—वसन्त ऋतु में औषधों के द्वारा वमन तथा औषधों का नस लेना, मधु के साथ हरड़ का खाना, कसरत करना, उबटन लगाना, कफ नाशक औषधों का कुल्ला करना, लोहे की शलाका में खोंस कर अग्नि में सके हुये जङ्गली जीवों का मांस खाना, गेहूँ, अनेक प्रकार के चावल, मूँग, यव और साठी चावल खाना, चन्दन, केसर और अगर का लेप करना और रूक्ष, कटु रसयुक्त, उष्ण तथा हल्के पदार्थों का सेवन करना हितकर है और मीठा, खट्टा तथा स्निग्ध पदार्थ एवं दही का खाना और दिन में सोना तथा देर में पचने वाले पदार्थों का खाना और ओस में सोना अहितकर है अतः वसन्त ऋतु में इन सबों का परित्याग अवश्य कर देवे ।।३५३-३५४।। अथ ग्रीष्मर्तुनियमानाह- स्वादुस्निग्धहिमं लघु द्रवमयं द्रव्यं रसालां सितांसक्तुक्षीरमजाङ्गलानि सितया शालिं रसं मांसजम्। शीतांशुं शयनं दिवा मलयजं शीतं पयः पानकं सेवेतोष्णादिने त्यजेत्तु कटुकक्षाराम्लघर्मश्रमान् ।। ३५५ ।। ग्रीष्म ऋतु के नियम—ग्रीष्म ऋतु में मधुर रस युक्त, स्निग्ध, शीतल, पचने में हल्के द्रवरूपं (पतला) द्रव्यों का सेवन, सिखरन, चीनी तथा चीनी मिले हुए सत्तू, दूध, जङ्गली जीवों से भिन्न जीवों का मांस, शालि धान्य के चावल, मांसरस, चन्द्रसेवन (चाँदनी में सोना), दिन में सोना, चन्दन लगाना, शीतल जल और शर्वत पीना हितकर होता है और कटुक्षार (नमकीन) तथा अम्ल रस युक्त द्रव्यों का सेवन, घाम में रहना और परिश्रम करना अहितकर है अतः इन सब कामों को त्याग देना चाहिये ।।३५५।। अथ पूर्वोक्तर्तुचर्य्याऽऽचरणे फलमाह- ऋतुष्वेपु य एतैस्तु विधिभिर्वर्त्तते नरः। दोषानृतुकृतानैव लभते स कदाचन ।। ३५६ ।। इति श्रीलटकनतनय-श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे दिनचर्यादिप्रकरणं पञ्चमम् ।। ५ ।। ऋतुचर्याओं का आचरण करने से लाभ—जिन-जिन ऋतुओं में जो-जो विधियाँ कही हुई हैं, उन-उन ऋतुओं में उन-उन विधियों के अनुसार जो मनुष्य रहता है, उसे उन-उन ऋतुओं में होने वाले कोई भी दोष कभी नहीं प्राप्त होते हैं ।।३५६।। इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायां पञ्चमदिनचर्यादिप्रकरणम् समाप्तम् ।।५।।

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