भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

१६० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ वर्षत्तौ नियमानाह- वर्षासु प्रबलो वायुस्तस्मान्मिष्टादयस्त्रयः। रसाः सेव्या विशेषेण पवनस्योपशान्तये ।।३४४।। वर्षा ऋतु के नियम—वर्षाकाल में वायु प्रबल होती है अतः वायु की शान्ति के लिये विशेषरूप से मधुरादि तीनों रसों का सेवन करना चाहिये ।।३४४।। ❖ मिष्टादयस्त्रयः=मधुराम्ललवणाः ।।३४४।। 'मधुरादयस्त्रयः' अर्थात् मधुर, अम्ल और लवण इन तीन रसों से युक्त ।।३४४।। भवेद्वर्षासु वपुषः क्लिन्नत्वं यद्विशेषतः । यत्क्लेदशान्तये१ सेव्या अपि कट्वादयस्त्रयः ।।३४५।। वर्षाकाल में प्रायः करके शरीर क्लिन्न (आर्द्र) रहा करता है, उसकी शान्ति के लिये कटु आदि तीनों रसों का भी सेवन करना चाहिये ।।३४५।। कट्वादयस्त्रयः=कटुतिक्तकषायाः ।।३४५।। 'कट्वादयस्त्रयः' अर्थात् कटु, तिक्त तथा कसैला इन तीन रसों से युक्त ।।३४५।। स्वेदनं मर्दनं सेव्यं दध्युष्णाजाङ्गलामिषम् । शालयो२ यवगोधूमा जलं कौपं जलं च्युतम् ।।३४६।। न भजेत्पूर्वपवनं वृष्टिं घर्मं हिमं श्रमम् । नदीतीरं दिवास्वप्नं रूक्षं नित्यं च मैथुनम् ।।३४७।। वर्षाकाल में स्वेदन, मर्दन, गरम दही, जङ्गली जीवों का मांस, जौ, गेहूँ, शालि (अगहनि धान का चावल) और कूप तथा झरना का जलपान, पूर्वदिशा की वायु का सेवन, वर्षा में भीगना, घाम में घूमना, हिम (ओस) में सोना, परिश्रम, नदी के तट पर रहना, दिन में सोना, रूक्ष द्रव्यों का सेवन और नित्य मैथुन करना, इन सबको नहीं करना चाहिये ।।३४६-३४७।। अथ शरदृतौ नियमानाह- सर्पिः स्वादुकषायतिक्तकरसा यच्छीतलं यल्लघु क्षीरं स्वच्छसितैक्षवः पटुरसः स्वल्पं पलं जाङ्गलम् । गोधूमा यवमुद्गशालिसहिता नादेयमं शूदकं चन्द्रश्चन्दमिन्दुरादिरजनी३ माल्यं पटो निर्मलाः ।।३४८।। शरद् ऋतु के नियम—शरदऋतु में, घृत, मधुर, कसैला तथा तिक्त रस, शीतल तथा लघु पदार्थ, दूध, साफ शक्कर, गुड़, नमकीन पदार्थ, थोड़ी मात्रा में जङ्गली जीवों का मांस, गेहूँ, यव, मूंग, शालि (अग