भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें१७२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कदाचिद्रोगोद्रेकेऽपवादभयात् । वैद्यविदग्धो=वैद्यधूर्त्तः । शंकितो=वैद्यविश्वासरहितः । भिषजाम्- विधेयाः=वैद्यवचनाविधायिनः । भिषग्विधाः=वैद्यतुल्याः । एते न उपक्रम्याः=न चिकित्स्याः । तथा च सुश्रुतः- स न सिद्ध्यति वैद्यस्तु गृहे यस्य न पूज्यते ।।४१'-४२।। यहाँ 'चण्ड' से 'अत्यन्त क्रोध करने का जिसका स्वभाव हो;' 'साहसिकः' से 'बिना विचार किये कार्य करने वाला' । 'भीरुः' से 'डरपोक' । 'कृतघ्नः' से 'वैद्य के किये हुये उपकार को न मानने वाला' । 'व्यग्रः' से 'व्याकुल चित्त वाला' और 'विहीनः करणैश्च यः' से 'जो नेत्रादि इन्द्रियों की शक्ति से रहित हो' यह अर्थ समझना चाहिये । और 'वैरी' का नाम इसलिये लिया गया है, कि यदि उसकी चिकित्सा की जाय और बाद में कदाचित् उसका रोग बढ़ जाय तो वह अपवाद लगावेगा इस भय से वह अचिकित्स्य है । 'वैद्यविदग्धः' से 'वैद्यों के साथ धूर्त्तता करने वाला' । 'शङ्कितः' से 'वैद्य के ऊपर विश्वास नहीं रखते वाला' । 'भिषजामविधेयाः' से 'वैद्यों के वचन को न करने वाला' । 'भिषग्विधाः' से 'अपने को वैद्यों के समान मानने वाला' । 'एते न उपक्रम्याः' अर्थात् 'ये चिकित्सा करने के योग्य नहीं होते हैं। यह अर्थ समझना चाहिये । इसी विषय में 'सुश्रुत' कहते हैं कि—'वह रोगी आरोग्य लाभ नहीं कर सकता जिसके गृह में वैद्य का सम्मान नहीं होता है' ।।४१-४२।। अथाचिकित्स्यानां चिकित्सानिषेधमाह- एतानुपाचरन् वैद्यो बहून् दोषानवाप्नुयात् ।।४३।। अचिकित्स्य रोगियों की चिकित्सा का निषेध—पूर्वोक्त अचिकित्स्य रोगियों की यदि कोई वैद्य चिकित्सा करता है तो वह अनेक दोषों को प्राप्त करता है ।।४३।। अथ दूतस्य लक्षणमाह- यश्चिकित्सकमानेतुं याति दूतः स कथ्यते । स च यादृक् समुचितस्तादृगत्र निगद्यते ।।४४।। दूताः सुजातयोऽव्यङ्गाः पटवो निर्मलाम्बराः । सुखिनोऽश्ववृषारूढाः शुभ्रपुष्पफलैर्युताः ।।४५।। सजातयः सुचेष्टाश्च सजीवदिशि सङ्गताः । भिषजं समये प्राप्ता रोगिणः सुखहेतवे ।।४६।। दूत के लक्षण—जो चिकित्सक को ले आने के लिये जाता है उसे दूत कहते हैं, वह जैसा उचित होता है वैसा कहते हैं—जो दूत होकर वैद्य के पास जाय वह अच्छी जाति का हो एवं किसी अङ्ग से हीन न हो तथा चतुर, स्वच्छ वस्त्र पहने हुये, सुखी (प्रसन्न चित्त), घोड़ा या बैलगाड़ी पर चढ़ा हुआ सफेद पुष्प एवं फल से युक्त सजातिक, अच्छी चेष्टा से युक्त, वैद्य के पास जाकर सजीव अर्थात् नासिका के जिस भाग से श्वास चलता हो उसी भाग में बैठने वाला और वैद्य के मिलने का जो समय हो उसी में उसके घर पहुँचने वाला इस प्रकार के जो दूत होते हैं वे ही रोगी के सुख के हेतु (सुख पहुँचाने वाले) होते हैं ।।४४-४६।। सजातयः=रोगिसमानजातयः । यस्यां प्राणमरुद्धाति सा नाडी जीवसंज्ञिता ।।५।।४६।। यहाँ 'सजातयः' से 'रोगी के समान जातिवाले' और 'सजीवदिशि सङ्गताः' पद में स्थित 'जीव' पद से यह अर्थ समझना चाहिये कि 'जिस नासिका में प्राणवायु अर्थात् श्वास बहता हो वह नाड़ी जीवसंज्ञक कहलाती है' और इससे यह भी समझना चाहिये कि 'यदि दाहिना श्वास चलता हो तो दाहिनी ओर बायाँ श्वास चलता हो तो बायीं ओर वैद्य के पास जाकर बैठे' ।।५।।४६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA