भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
१७२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कदाचिद्रोगोद्रेकेऽपवादभयात् । वैद्यविदग्धो=वैद्यधूर्त्तः । शंकितो=वैद्यविश्वासरहितः । भिषजाम्- विधेयाः=वैद्यवचनाविधायिनः । भिषग्विधाः=वैद्यतुल्याः । एते न उपक्रम्याः=न चिकित्स्याः । तथा च सुश्रुतः- स न सिद्ध्यति वैद्यस्तु गृहे यस्य न पूज्यते ।।४१'-४२।। यहाँ 'चण्ड' से 'अत्यन्त क्रोध करने का जिसका स्वभाव हो;' 'साहसिकः' से 'बिना विचार किये कार्य करने वाला' । 'भीरुः' से 'डरपोक' । 'कृतघ्नः' से 'वैद्य के किये हुये उपकार को न मानने वाला' । 'व्यग्रः' से 'व्याकुल चित्त वाला' और 'विहीनः करणैश्च यः' से 'जो नेत्रादि इन्द्रियों की शक्ति से रहित हो' यह अर्थ समझना चाहिये । और 'वैरी' का नाम इसलिये लिया गया है, कि यदि उसकी चिकित्सा की जाय और बाद में कदाचित् उसका रोग बढ़ जाय तो वह अपवाद लगावेगा इस भय से वह अचिकित्स्य है । 'वैद्यविदग्धः' से 'वैद्यों के साथ धूर्त्तता करने वाला' । 'शङ्कितः' से 'वैद्य के ऊपर विश्वास नहीं रखते वाला' । 'भिषजामविधेयाः' से 'वैद्यों के वचन को न करने वाला' । 'भिषग्विधाः' से 'अपने को वैद्यों के समान मानने वाला' । 'एते न उपक्रम्याः' अर्थात् 'ये चिकित्सा करने के योग्य नहीं होते हैं। यह अर्थ समझना चाहिये । इसी विषय में 'सुश्रुत' कहते हैं कि—'वह रोगी आरोग्य लाभ नहीं कर सकता जिसके गृह में वैद्य का सम्मान नहीं होता है' ।।४१-४२।। अथाचिकित्स्यानां चिकित्सानिषेधमाह- एतानुपाचरन् वैद्यो बहून् दोषानवाप्नुयात् ।।४३।। अचिकित्स्य रोगियों की चिकित्सा का निषेध—पूर्वोक्त अचिकित्स्य रोगियों की यदि कोई वैद्य चिकित्सा करता है तो वह अनेक दोषों को प्राप्त करता है ।।४३।। अथ दूतस्य लक्षणमाह- यश्चिकित्सकमानेतुं याति दूतः स कथ्यते । स च यादृक् समुचितस्तादृगत्र निगद्यते ।।४४।। दूताः सुजातयोऽव्यङ्गाः पटवो निर्मलाम्बराः । सुखिनोऽश्ववृषारूढाः शुभ्रपुष्पफलैर्युताः ।।४५।। सजातयः सुचेष्टाश्च सजीवदिशि सङ्गताः । भिषजं समये प्राप्ता रोगिणः सुखहेतवे ।।४६।। दूत के लक्षण—जो चिकित्सक को ले आने के लिये जाता है उसे दूत कहते हैं, वह जैसा उचित होता है वैसा कहते हैं—जो दूत होकर वैद्य के पास जाय वह अच्छी जाति का हो एवं किसी अङ्ग से हीन न हो तथा चतुर, स्वच्छ वस्त्र पहने हुये, सुखी (प्रसन्न चित्त), घोड़ा या बैलगाड़ी पर चढ़ा हुआ सफेद पुष्प एवं फल से युक्त सजातिक, अच्छी चेष्टा से युक्त, वैद्य के पास जाकर सजीव अर्थात् नासिका के जिस भाग से श्वास चलता हो उसी भाग में बैठने वाला और वैद्य के मिलने का जो समय हो उसी में उसके घर पहुँचने वाला इस प्रकार के जो दूत होते हैं वे ही रोगी के सुख के हेतु (सुख पहुँचाने वाले) होते हैं ।।४४-४६।। सजातयः=रोगिसमानजातयः । यस्यां प्राणमरुद्धाति सा नाडी जीवसंज्ञिता ।।५।।४६।। यहाँ 'सजातयः' से 'रोगी के समान जातिवाले' और 'सजीवदिशि सङ्गताः' पद में स्थित 'जीव' पद से यह अर्थ समझना चाहिये कि 'जिस नासिका में प्राणवायु अर्थात् श्वास बहता हो वह नाड़ी जीवसंज्ञक कहलाती है' और इससे यह भी समझना चाहिये कि 'यदि दाहिना श्वास चलता हो तो दाहिनी ओर बायाँ श्वास चलता हो तो बायीं ओर वैद्य के पास जाकर बैठे' ।।५।।४६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
-shaped on the left, connector, vertical stem: that is 100% identical to 'स'! And then 'मग्निम्'! So the printed text in the book LITERALLY says: "प्रदीप्तसमग्निम् ॥४७॥" Wait, or is it: Wait, could it be "प्रदीप्तसद्मग्निम्"? No. Could it be: "प्रदीप्तं समग्निम्"? No, there is no anusvara on 'प्त'. It is printed as: "प्रदीप्तसमग्निम् ॥४७॥"! Wait, whether it was intended as "प्रदीप्तमग्निम्" (with an accidental extra 'स' by the typesetter) or "प्रदीप्तसमग्निम्", the user prompt specifically instructs: "Transcribe the image ... line by line into pure, clean Markdown in Devanagari." Wait, let's look at the instruction: "Transcribe the ... page line by line into pure, clean Markdown in Devanagari. Include all Sanskrit shlokas, yogas, pharmaceutical formulations, bhasma preparations, disease descriptions, Hindi translation, and footnotes. Prefix each line with line marker like , ." So our goal is to accurately transcribe what is printed on the page! Let's check every single line carefully.
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Page Header: अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १७३ Wait, is it "षष्ठम" or
॥६॥
Line 29: तेन कालेन संयुक्तः संहाराय नियुक्तः सोऽवश्यम्भावी । शेषाः शतं मृत्यवः, आगन्तवः=आगन्तु-
Line 30: रूपहेतुजन्मानः कार्यकारणयोरभेदोपचारात् ।
Line 31: इस प्रकार काल संयुक्त जो मृत्यु है वह सम्पूर्ण जगत् के संहार करने के लिये नियुक्त है अत एव वह अवश्य
Line 32: होने वाली मृत्यु कहलाती है। शेष जो १०० प्रकार की मृत्यु हैं ये 'आगन्तुक' कहलाती हैं अर्थात् 'आगन्तुक' रूप कारणों
Line 33 (Footnote): १. 'व्यथाया' इति पा. ।
Everything is accounted for accurately.१७४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ वैद्यस्य कर्माह- व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं वेदनायाश्च निग्रहः। एतद्वैद्यस्य वैद्यत्वं न वैद्यः प्रभुरायुषः ॥५३॥ वैद्य का कर्त्तव्य—रोग का यथार्थरूप से समझना तथा रोगी के कष्ट को दूर करना ये ही वस्तुतः वैद्य के मुख्य कर्म हैं, आयु का प्रभु तो वैद्य नहीं (भगवान् होता) है अर्थात् रोगी के मृत्यु को हटाना वैद्य का कर्म नहीं है ॥५३॥
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से उत्पन्न होने वाली होती हैं अत एव 'आगन्तुक' कहलाती हैं। यहाँ 'आगन्तुक' से उत्पन्न होकर भी जो 'आगन्तुक' ही कहलाती है उसका कारण यह है कि कार्य और कारण का दार्शनिकों ने अभेद माना है अतः लाक्षणिक प्रयोग समझना चाहिये ॥ ❖ आगन्तवो हेतवो यथा-विषभक्षणमजीर्णमत्यन्तभोजनं च, दुर्देशजलपानम्, तथाऽतिबलवैरि- व्याघ्रवनमहिषमत्तमातङ्गादिभिर्युद्धम्, दन्दशूकेन क्रीडनम्, अत्युच्चवृक्षाग्रारोहणम्, बाहुभ्यां महातरङ्गिणीतरणम्, एकाकिनो रात्रौ दुर्गे मार्गे गमनमित्यादि ।।५।। आगन्तुक हेतु—विष भक्षण, अजीर्ण और अत्यन्त भोजन, दुष्ट देशों का (जहाँ का पानी लगता हो ऐसे देशों का) जल पीना तथा अत्यन्त बलवान् वैरी, व्याघ्र, जङ्गली भैंसा और मतवाला हाथी आदि के साथ युद्ध करना, विषधर सर्पादिकों के साथ खेल करना, अत्यन्त ऊँचे वृक्षों के अग्र
१७.६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सार्थ युद्ध करना इत्यादि हैं इन सब कारणों से उत्पन्न होनेवाली जो सौ प्रकार की मृत्यु हैं उनसे और वैद्य तथा पुरोहित ये दोनों कैसे सौ प्रकार की मृत्युओं को हटाने में समर्थ हो सकते हैं? इस शङ्का की निवृत्ति करने के लिये कहते हैं- क्योंकि वे दोनों रसमन्त्र विशारद हैं अर्थात् वैद्य रसविशारद है और पुरोहित मन्त्रविशारद है उसमें प्रथम वैद्य दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या में कहे हुए आहार तथा विहार कराने से वात, पित्त, कफ इन धातुओं को तथा मल को समान भाव से रखकर रक्षा करे तदनन्तर वह रसविशारद अर्थात् रस का जानने वाला है अत एव रस जो मृत्युञ्जयादि हैं उनके द्वारा जो निषिद्ध आहार तथा बिहार के करने से दूषित हुए दोषों से उत्पन्न होने वाले मृत्यु के कारण स्वरूप विकार (रोग) हैं उनको दूर करे और मन्त्री अर्थात् पुरोहित सद्बुद्धि (अच्छी सलाह) देने के द्वारा मृत्यु के कारण जो निषिद्ध विहार बलवान् शत्रुओं के साथ लड़ना आदि है उनसे राजा को दूर रखे। इससे आगन्तुक मृत्यु निवारण करने के योग्य ही होती है न कि अवश्यम्भावी (नहीं निवारण करने के योग्य) होती है ॥८।५३॥ अथायुर्विचारमाह- भिषगादौ परीक्षेत रुग्णस्यायुः प्रयत्नतः। तत आयुषि विस्तीर्णे चिकित्सा सफला भवेत् ॥५४॥ रोगी के प्रथम आयु का विचार-वैद्य प्रथम यत्नपूर्वक रोगी के आयु की परीक्षा करे क्योंकि आयु रहने पर ही चिकित्सा सफल होती है ॥५४॥ अथ दीर्घायुषो लक्षणान्याह- सौम्या दृष्टिर्भवेद्यस्य श्रोत्रं वक्त्रं तथैव च। स्वादु गन्धं विजानाति स साध्यो नात्र संशयः ॥५५॥ पाणिपादौ च यस्योष्णौ दाहः स्वल्पतरो भवेत्। जिह्वा तु कोमला यस्य स रोगी न विनश्यति ॥५६॥ स्वेदहीनो ज्वरो यस्य श्वासो नासिकया चरेत्। कण्ठश्च कफहीनः स्यात्स रोगी जीवति ध्रुवम् ॥५७॥ यस्य निद्रा सुखेन स्याच्छरीरं द्युतिमद्भवेत्। इन्द्रियाणि प्रसन्नानि स रोगी नैव नश्यति ॥५८॥ दीर्घायु रोगी के लक्षण-जिस रोगी के आँख, कान तथा मुख सौम्य (विकृति भाव को न प्राप्त) हों तथा जो रस का स्वाद तथा गन्ध की भलाई-बुराई को भली भाँति जानता हो वह रोगी निःसंशय साध्य होता है अर्थात् चिकित्सा करने से निश्चय आरोग्य लाभ करता है। जिस रोगी के हाथ पैर गर्म हों, दाह बहुत थोड़ा होता हो, जिह्वा कोमल हो, स्वेद (पसीना) से रहित ज्वर हो, नासिका से श्वास चलता हो, गले में कफ न हो, सुखपूर्वक निद्रा आती हो, शरीर में कान्ति हो और इन्द्रियाँ प्रसन्न हों वह रोगी नहीं मरता है ॥५५-५८॥ अथ स्वल्पायुषो लक्षणान्याह- शरीरशीलयोर्यस्य प्रकृतेर्विकृतिर्भवेत्। तदरिष्टं समासेन व्यासतः शृणु निबोध मे ॥५९॥ शृणोति विविधाञ्छब्दान्विपरीताञ्छृणोति च। यो न शृणोति चाकस्मात्तं वदन्ति गतायुषम् ॥६०॥ स्वल्प आयुवाले रोगियों के लक्षण-जिस रोगी के स्वाभाविक शरीर तथा स्वभाव में अन्तर पड़ गया हो, वह उसके लिये अरिष्ट के लक्षण होता है, यह संक्षेप से समझना चाहिये। विस्तृत रूप से अरिष्ट का कारण यह है कि जो रोगी शब्द न होने पर भी अनेक प्रकार के शब्दों को बराबर सुनता हो वा विपरीत शब्दों को सुनता हो अथवा अकस्मात् नहीं सुनने लगता हो उसे गतायु कहते हैं ॥५९-६०॥ यस्तूष्णमिव गृह्णाति शीतमुष्णं च शीतवत्। उष्णागात्रोऽतिमात्रं यो भृशं शीतेन कम्पते ॥६१॥ जो शीतल वस्तु को उष्ण वस्तु की भाँति और उष्ण वस्तु को शीतल वस्तु की भाँति ग्रहण करता हो तथा जिसका शरीर वस्त्रादि के ओढ़ने से गर्म होते हुये भी शीत से अत्यन्त काँपता हो उसे भी गतायु कहते हैं ॥६१॥
❖ तमपि गतायुषं वदन्तीत्यन्वयः ।। ६१ ।। यहाँ 'उसे भी लोग गतायु कहते हैं' 'यह अन्वय ऊपर के ६० श्लोक से लाकर किया जाता है। प्रहारं नैव जानाति योऽङ्गच्छेदमथापि¹ वा। पांशुनेवावकीर्णानि यश्च गात्राणि मन्यते ।। ६२ ।। वर्णान्यता वा राज्यो वा यस्य गात्रे भवन्ति हि। स्नातानुलिप्तं यं चापि भजन्ते नीलमाक्षिकाः² ।। ६३ ।। विपरीतेन गृह्णाति रसान्यश्चोपयोजितान्। यो वा रसान्न संवेत्ति³ तं गतासुं प्रचक्षते ।। ६४ ।। जो प्रहार नहीं जानता अर्थात् मारने पर जिसे चोट नहीं मालूम पड़ती या अङ्गों के काटने पर भी जिसे कुछ नहीं मालूम पड़ता और जो अपने अङ्गों को धूलि से भरा हुआ समझता है। एवं जिसके शरीर का वर्णभिन्न प्रकार का या उसमें बहुत सी रेखायें हो जायें और स्नान और चन्दनादि का अनुलेपन कर चुकने पर भी जिसके ऊपर नीली मक्खियाँ आकर बैठने लगें और जो जिस रस का उपयोग करता हो उसे उसके विरुद्ध अर्थात् मधुर को अम्ल और अम्ल को मधुर समझे [L10
१७८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तो उसे गतायु कहते हैं और जो दर्पण, जल वा धूप में अपने प्रतिबिम्ब को न देखता हो अथवा अपने प्रतिबिम्ब या छाया को एक किसी अङ्ग से हीन या विकृति रूपवाली, या कुत्ता, कौवा, कङ्कपक्षी, गिद्ध, प्रेत, यक्ष और राक्षस की अथवा इनसे अन्य किसी प्राणी की छाया के समान देखे तो यदि वह रोगी हो तो उस की मृत्यु निकट होती है और स्वस्थ हो तो उसे शीघ्र रोग होने की संभावना रहती है ॥६७-७२॥ ह्रीश्रियौ नश्यतो यस्य तेन ओजः स्मृतिः प्रभा । अकस्माच्च भजन्ते यं स गतासुरसंशयम् ।।७३।। अकस्मात् जिसकी लज्जा, शोभा, तेज, ओज, स्मरणशक्ति और प्रतिभा ये सब नष्ट हो जायँ या अकस्मात् ये सब प्राप्त हो जावें तो उसे निःसन्देह गतायु समझना चाहिये ॥७३॥ ❖ प्रभा=प्रतिभा ।।७३।। यहाँ 'प्रभा' का 'प्रतिभा' अर्थ समझना चाहिये ।।७३।। यस्याधरोष्ठः पतितः क्षिप्तोश्चोर्ध्वं तथोत्तरः । उभौ वा जाम्बवाभासौ दुर्लभं तस्य जीवितम् ।।७४।। आरक्ता दशना यस्य श्यावा वा स्युः पतन्ति वा । खञ्जनप्रतिभा१ वापि तं गतायुषमादिशेत् ।।७५।। कृष्णा तथाऽनुलिप्ता च जिह्वा शून्या च यस्य वै । कर्कशा वा भवेद्यस्य सोऽचिराद्विजहात्यसून् ।।७६।। जिसका नीचेवाला ओष्ठ नीचे को लटक जाय और ऊपर का ओष्ठ ऊपर की ओर उठ जाय अथवा जामुन के रङ्ग का हो जाय तो उसका जीना दुर्लभ समझना चाहिये और जिसके सब दाँत लाल वर्ण तथा श्याव अर्थात् धूम्र वर्ण के हो जायँ या गिर जायँ या खंजन पक्षी के तुल्य वर्ण के हो जायँ तो उसे गतायु समझना चाहिये और जिसकी जिह्वा काली पड़ जाय या मल से लिपटी हुई तथा रस ग्रहण करने में सुख या कर्कश अर्थात् खुरदरी हो जाय तो वह बहुत शीघ्र प्राणों को छोड़ता है (मर जाता है) ।।७४-७६।। कुटिला स्फुटिता वाऽपि शुष्का वा यस्य नासिका । अवस्फूर्जति भग्ना वा स न जीवति मानवः ।।७७।। जिसकी नाक टेढ़ी, फटी सूखी वा झुकी सी हो या श्वास के वेग से जोर शब्द करती हो तो वह मनुष्य नहीं जीता है ॥७७॥ स्फूर्जति=श्वासवेगेनोच्चैः शब्दं करोतीत्यर्थः ।।७७।। 'स्फूर्जति' का 'श्वास के वेग से जोर शब्द करती हो' यह अर्थ समझना चाहिये ॥७७॥ संक्षिप्ते विषमे स्तब्धे रूक्षे सास्त्रे च लोचने । स्यातां परिश्रुते यस्य स गतायुर्नरो ध्रुवम् ।।७८।। जिसके दोनों नेत्र सङ्कुचित, विषम (छोटे बड़े), पथराये हुये, रूखे, आँसुओं से भरे अथवा आँसू गिरते हुये हों तो निश्चय उस मनुष्य को गतायु समझना चाहिये ॥७८॥ केशाः सीमन्तिनो यस्य संक्षिप्ते विनते भ्रुवौ । लुठन्ति चाक्षिपक्ष्माणि सोऽचिराद्याति मृत्यवे ।।७९।। जिसके बालों में कङ्घी से सँवारने के समान बीच में सीमन्त (माँग) बन जाय एवं दोनों भौंहें सिकुड़ी तथा झुकी हुई हो जायँ या आँखों के ऊपर वे बप्ल (बरौनी) झड़ जायँ तो वह शीघ्र मृत्यु को प्राप्त करता है ॥७९॥ लुठन्ति=पतन्ति ।।७९।। 'लुठन्ति' का 'गिर जायँ' यह अर्थ समझना चाहिये ॥७९॥ १. 'प्रतिमे'
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १७९ नाहरत्यन्नमास्यस्थं न धारयति यः शिरः। एकाग्रदृष्टिर्मूढात्मा सद्यः प्राणान्विमुञ्चति ।।८०।। उत्थाप्यमानो बहुशः संमोहं योऽधिगच्छति। बलवान्दुर्बलो वापि तं पक्वं भिषगादिशेत् ।।८१।। निद्रा निरन्तरं यस्य यो जागर्त्ति च सर्वदा। मुहोद्वा वक्तुकामश्च प्रत्याख्येयः स जानता ।।८२।। जो रोगी मुख में रखे हुए अन्न को नहीं निगल सके या शिर धारण न कर सके अर्थात् जिसका शिर सीधा करने पर भी लटक जाय या जिसकी दृष्टि एकाग्र अर्थात् एक ही लक्ष्य पर स्थिर हो जाय या जिसका मन भ्रान्त हो गया हो और जो बारंबार उठाने पर भी मोह को प्राप्त हो जाय ऐसा रोगी चाहे बलवान् हो अथवा दुर्बल हो किन्तु उसे वैद्य गण मरने के विषय में पक्व अर्थात् शीघ्र मरने वाला समझें, या जिसे निरन्तर नींद आती हो अथवा जो सदा जागता ही रहता हो या जो कुछ कहने की इच्छा करता हो किन्तु मोह को प्राप्त हो जाय अर्थात् जो कहना चाहे उसे भूल जाय ऐसे रोगी को, जो ज्ञानवान् वैद्य हों, उन्हें चाहिये कि चिकित्सा करने के सम्बन्ध में प्रत्याख्यान (
१८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे फल हैं ? उसका उत्तर यह है कि आयु के रहने पर जो चिकित्सा की जाती है उसका फल वेदना (रोगजनित पीड़ा) का दूर होना है क्योंकि कहा भी है कि—जिस रोगी की आयु दीर्घ है किन्तु चिकित्सा न की जाय तो वह बिना औषध के रोग अनित पीड़ा से युक्त होकर जीवित रह सकता है किन्तु यदि उसका औषध किया जाय तो वह रोगमुक्त होकर जीवित रहता है ॥९॥ ❖ किञ्च आयुषि सत्यपि रोगो चिकित्सां विना उत्थातुं न शक्नोति । यत आह चरकः- सति चायुषि नोपायं विनोत्थातुं क्षमो रुजी। दर्शितश्चात्र दृष्टान्तः पङ्कमग्नो यथा गजः ।।१०।। किञ्च आयु के रहने पर भी रोगी बिना चिकित्सा किये रोग से मुक्त होकर नहीं उठ सकता क्योंकि इसी विषय में चरक ने कहा भी है कि—आयु के रहने पर भी रोगी बिना चिकित्सा किये रोगमुक्त होकर नहीं उठ सकता। इस विषय में कीचड़ में फँसे हुये हाथी का दृष्टान्त है अर्थात् जैसे कीचड़ में फँसा हाथी बिना उपाय किये उद्धार नहीं पाता वैसे ही रोगी भी बिना चिकित्सा किये रोग से छुटकारा नहीं पाता है ॥१०॥ ❖ किञ्च चिकित्सां विना आयुष्मानप्यवसीदति यत आह स एव- सति चायुषि नष्टः स्यादादयैश्चाचिकित्सतः । यथा सत्यपि तैलादौ दीपो निर्वाति वात्यया ।।११।। बिना चिकित्सा के आयुष्मान् अर्थात् जिस की आयु अवशिष्ट है ऐसा भी रोगी अवसन्न अर्थात् मर जाता है क्योंकि इसी विषय में उन्हीं चरक ने कहा है कि—आयु रहने पर भी चिकित्सा न करने से रोगों के बढ़ जाने से रोगी नष्ट हो जाता है, जैसे कि—तैलादि के रहने पर भी हवा से दीपक बुझ जाता है ॥११॥ ❖ अत एवोक्तम्- साध्या याप्यत्वमायान्ति याप्या गच्छन्त्यसाध्यताम् । घ्नन्ति प्राणानसाध्यास्तु नराणामक्रियावताम् ।। १२ ।। इति ।। अतएव कहा है कि—जिसकी चिकित्सा नहीं होती उस रोगी के क्रमशः साध्य रोग ‘याप्य’ होकर असाध्य हो जाते हैं तथा असाध्य रोग प्राणों को नष्ट कर देते हैं ॥१२॥ ❖ चिकित्सा तु अनिश्चितायुषोऽपि कर्तव्या यत आह- तावत्प्रतिक्रिया कार्या यावच्छ्वसिति मानवः । कदाचिद्देवयोगेन दृष्टारिष्टोऽपि जीवति ।। १३ ।। अनिश्चित आयु वालों की भी चिकित्सा अवश्य करनी चाहिए क्योंकि कहा भी है कि रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये जब तक वह श्वास लेता रहे क्योंकि कभी कभी दैवयोग से ऐसा रोगी भी जीवित होते देखा गया है जिसके कि सभी अरिष्ट के लक्षण प्रकट हो गये थे। अतः चिकित्सा करना प्रत्येक अवस्था में उचित ही है ॥१३॥ ❖ इति तु यस्यासाध्यत्वं सन्दिग्धं तं प्रत्युक्तम् । येषु तु असाध्यता शास्त्रेण अनुभवेन विनिश्चता ते पुनर्न चिकित्स्याः । यत उक्तम्- सद्वैद्यास्ते न येऽसाध्यानारभन्ते चिकित्सितुम् ।। १४ ।। इति ८६-८७ ।। किन्तु उपर्युक्त वचन उन्हीं रोगियों के सम्बन्ध में समझना चाहिये जिन रोगियों की असाध्यता सन्दिग्धावस्था में हो और जिनकी असाध्यता शास्त्र तथा अनुभव से निश्चितावस्था में प्राप्त हो गई है अर्थात् जो निश्चयपूर्वक असाध्य हो गये १. ‘प्रतीच्छन्ती’ति पाठः ।
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८१ हैं ऐसे रोगी तो पुनः चिकित्सा करने के योग्य नहीं ही हैं। क्योंकि कहा भी है कि—जो सद्वैद्य होते हैं वे असाध्य रोगियों की चिकित्सा करना प्रारम्भ ही नहीं करते ॥१४॥८६-८७॥ अथ द्रव्यावश्यकतामाह- सर्वे द्रव्यमपेक्षन्ते रोगिप्रभृतयो यतः। विना वित्तं न भेषज्यं चिकित्साऽङ्गं ततो धनम् ॥८८॥ चिकित्सा में द्रव्य की आवश्यकता—रोगी, रोग आदि जितने हैं सभी द्रव्य (धन) की अपेक्षा करते हैं क्योंकि बिना द्रव्य के औषधि तैयार हो नहीं सकती। अतः द्रव्य भी चिकित्सा का अङ्ग माना गया है ॥८८॥ अथ परिचारकस्य लक्षणमाह- स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान्युक्तो व्याधितरक्षणे। वैद्यवाक्यकृदश्रान्तो युज्यते परिचारकः ॥८९॥ रोगी की परिचर्या करनेवाले (परिचारक) का लक्षण—रोगियों की परिचर्या करने के लिये वही परिचारक योग्य होता है, जो स्नेहयुक्त अर्थात् रोगी के ऊपर प्रसन्न रहने वाला तथा उसकी निन्दा नहीं करनेवाला, बलवान्, रोगी की रक्षा करने में तत्पर रहनेवाला, वैद्य के कथनानुसार कार्य करनेवाला और परिचर्या करने में नहीं थकने वाला हो ॥८९॥ ❖ स्निग्धः=प्रीतः, अजुगुप्सुः=अनिन्दकः ॥८९॥ यहाँ 'स्निग्ध' पद से 'रोगी के ऊपर प्रसन्न करने वाला' तथा 'अजुगुप्सु' पद से 'रोगी की निन्दा नहीं करने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये ॥८९॥ अथ भेषजस्य लक्षणमाह- वैद्यो व्याधिं हरेद्येन तद्द्रव्यं प्रोक्तमौषधम्। तद्यादृशमवश्यं स्याद्रोगघ्नं तादृशं ब्रुवे ॥९०॥ औषध के लक्षण—वैद्य जिस द्रव्य से व्याधि दूर करता है उसी को औषध कहते हैं। वह (औषध) जैसा होने से रोग को अवश्य दूर करने वाला होता है वैसा आगे कहते हैं ॥९०॥ अथौषधग्रहणपरिभाषामाह- प्रशस्तदेशे सञ्जातं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम्। अल्पमात्रं बहुगुणं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥९१॥ दोषघ्नमग्लानिकरमधिकं न विकारि यत्। समीक्ष्य काले दत्तं च भेषजं स्याद् गुणावहम् ॥९२॥ औषध ग्रहण करने की परिभाषा—जो ओषधि अच्छे देश (स्थान) में उत्पन्न और अच्छे दिन में उखाड़ी हुई हो और जो थोड़ी मात्रा में देने से भी फल देने वाली हो और बहुत गुण से युक्त हो, एवं जो स्वाभाविक-गन्ध, वर्ण और रस से युक्त हो तथा जो दोषों को दूर करने वाली, ग्लानि नहीं उत्पन्न करनेवाली और अधिक मात्रा हो जाने पर भी कोई विकार नहीं उत्पन्न करने वाली हो वही ओषधि यदि विचार करके समय उपस्थित होने पर दी जाय तो गुणकारक होती है ॥९१-९२॥ आग्नेया विन्ध्यशैलाद्याः सौम्यो हिमगिरिः स्मृतः। अतस्तदौषधानि स्युरनुरूपाणि हेतुभिः ॥९३॥ विन्ध्याचल आदि पर्वत 'आग्नेय' हैं और हिमालय पर्वत 'सौम्य' है। अतएव विन्ध्याचलादि पर्वतों पर उत्पन्न हुई ओषधियाँ भी अपने उत्पन्न होने के हेतुओं के अनुरूप ही आग्नेयादि गुण विशिष्ट होती हैं ॥९३॥ ❖ आग्नेयाः=अधिकाग्न्यंशाः, सौम्यः=अधिकसोमांशः। ओषधय एवौषधानि। अत्र स्वार्थे अण्। अनुरूपाणि=सदृशानि ॥९३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१८२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे इसका भाव यह है—विन्ध्यादि पर्वतों में अग्नि के अंश अधिक होने से वे 'आग्नेय' हैं और हिमालय में (सोमचन्द्रमा) का अधिक अंश होने से वह 'सौम्य' है। अतएव पूर्वोक्त इन स्थानों में उत्पन्न हुए औषध अपने उत्पन्न होने के हेतुओं के अनुरूप आग्नेयादि होते हैं अर्थात् आग्नेय संज्ञक विन्ध्याचल में उत्पन्न हुई ओषधियाँ 'आग्नेय' अर्थात् अधिक उष्णता से युक्त तथा सौम्यसंज्ञक हिमालय में उत्पन्न हुई ओषधियाँ 'सौम्य' अधिक शीतलता से युक्त होती हैं। यहाँ पर यह और समझना चाहिये कि ओषधियाँ ही औषध कहलाती हैं। क्योंकि-ओषधि शब्द से स्वार्थ में अण् प्रत्यय होने से 'यस्येति च' इस सूत्र से ओषधि के इकार का लोप होने से णित्वमान कर ओषधि के ओकार की आदि वृद्धि होने से औषध शब्द की सिद्धि होती है ॥९३॥ अन्येष्वपि प्ररोहन्ति वनेषूपवनेषु च। गृह्णीयात्तानि सुमनाः शुचिः प्रातः सुवासरे ।।९४।। आदित्यसम्मुखो मौनी नमस्कृत्य शिवं हृदि। साधारणधराद्रव्यं गृह्णीयादुत्तराश्रितम् ।।९५।। इसके अतिरिक्त अन्य स्थान वन और उपवनों में भी ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और पूर्वोक्त स्थानों में उत्पन्न होने वाली उन ओषधियों को प्रसन्न चित्त तथा पवित्र होकर शुभ दिनों में प्रातःकाल सूर्य की ओर मुख किये हुये मौन होकर तथा ध्यान द्वारा, हृदय स्थित शिवजी को नमस्कार कर ग्रहण करना चाहिये और साधारण पृथ्वी में उत्पन्न हुई ओषधियों को तो जहाँ पर स्वयं खड़ा हो वहाँ से उत्तर दिशा में उगी हुई हों उन्हीं को ग्रहण करना चाहिये ।।९४-९५।। ❖ साधारणधराद्रव्यं=सर्वभूमिभवं द्रव्यम्। उत्तराश्रितं=स्वस्मादुत्तरदिग्भवम् ।। यहाँ 'साधारणधराद्रव्यम्' पद का 'साधारण पृथ्वी में उत्पन्न हुई ओषधियों को' और 'उत्तराश्रितम्' पद का 'जहाँ पर स्वयं खड़ा हो वहाँ से जो उत्तर दिशा में उगी हुई हों उन्हीं को' यह अर्थ समझना चाहिये ।।९४-९५।। वल्मीककुत्सितानूपश्मशानोषरमार्गजाः । जन्तुवह्निहिमव्याप्ता नौषध्यः कार्यसाधिकाः ।।९६।। जो ओषधियाँ वल्मीक (विमौट), अशुद्ध स्थान, अनूप (प्रायः करके जल से युक्त) देश, श्मशान, ऊसर भूमि और मार्ग इन स्थानों में उत्पन्न हुई हों तथा जो जीवों से भुक्त या अग्नि अथवा बर्फ से झुलस गई हों ऐसी ओषधियाँ कार्य सिद्ध करने वाली नहीं होतीं अर्थात् इनसे रोग दूर नहीं होता है ।।९६।। शरद्यखिलकार्यार्थ ग्राह्यं सरसमौषधम् । विरेकवमनार्थं तु वसन्तान्ते समाहरेत् ।।९७।। प्रत्येक कार्यों के लिये रस युक्त ओषधियों का शरद ऋतु में और वमन तथा विरेचन के लिये वसन्त ऋतु के मध्य में ओषधियों का संग्रह करना चाहिये ।।९७।। ❖ वसन्तान्ते=वसन्तमध्ये। समाहरेत्=संगृह्णीयात् ।।९७।। यहाँ 'वसन्तमध्ये' का 'वसन्त ऋतु के मध्य में' तथा 'समाहरेत्' का 'संग्रह करना चाहिये' यह अर्थ समझना चाहिये ।।९७।। अतिस्थूलजटा याः स्युस्तासां ग्राह्यास्त्वचोध्रुवम् । गृह्णीयात्सूक्ष्ममूलानिसकलान्यपि बुद्धिमान् ।। बुद्धिमान् व्यक्ति जिन ओषधियों के मूल भाग अत्यन्त स्थूल हों निश्चय ही उनके छिल्कों का और जिनके मूल भाग सूक्ष्म (पतले) हों उनके सभी अङ्गों को ग्रहण करें ।।९८।। अन्यञ्च- महान्ति येषां मूलानि काष्ठगर्भाणि सर्वतः । तेषां तु वल्कलं ग्राह्यं ह्रस्वमूलानि सर्वशः ।।९९।। न्यग्रोधादेस्त्वचो ग्राह्याः सारः स्याद्वीजकादितः । ताली सादेश्च पत्राणि फलं स्यात् त्रिफलादितः ।।१००।।
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८३ क्वचिन्मूलं क्वचित्कन्दः क्वचित्पत्रं क्वचित्फलम् । क्वचित्पुष्पं क्वचित्सर्वं क्वचित्सारः क्वचित्त्वचः ।।१०१।। चित्रकं सूरणं निम्बो वासा च त्रिफला क्रमात् । धातकी कण्टकारी च खदिरः क्षीरपादपः ।।१०२।। क्वचिन्निम्बस्य गृह्णीयात्पत्राभावे त्वचामपि । बालं फलं तु बिल्वस्य पक्वमारग्वधस्य च ।।१०३।। अङ्गेऽनुक्ते जटा ग्राह्या भागेऽनुक्तेऽखिलं समम् । पात्रेऽनुक्ते मृदुः पात्रं कालेऽनुक्ते त्वहर्मुखम् ।।१०४।। और भी कहा है कि—जिन ओषधियों के मूल भाग बड़े (स्थूल) हों और उनके अन्दर लकड़ी हो तो उनके छिल्कों को और जिनके मूलभाग छोटे (पतले) हों उनके सभी भागों को ग्रहण करे तथा बड़ा आदि वृक्षों की छाल और विजयसार आदि वृक्षों का सार (भीतर की लकड़ी) तथा तालीसपत्रादि के पत्र एवं त्रिफला आदि के फल लेने चाहिये । इस प्रकार और भी किसी ओषधियों का मूल, किसी का कन्द, किसी का पत्र, किसी का फल, किसी का पुष्प, किसी का सभी भाग, किसी का सारभाग और किसी का छिल्का ही ग्रहण किया जाता है । जैसे—चित्त का मूल, सूरन का कन्द, नीम और अडूसे की पत्ती, त्रिफला (आँवरा, हर्रा और बहेड़ा) का फल, धाय का फूल, कटेरी (भटकटैया) का सर्वाङ्ग, खैर का सारभाग (ककड़ी) और दूध वाले वृक्षों की छाल ही ली जाती है । नीम का पत्र यदि समय पर न मिले तो उसका छिल्का ही लेवे और बेल का कच्चा फल तथा अमलतास का पक्का फल लेवे । जहाँ पर जिस ओषधि के किसी विशेष भाग का उल्लेख न हो वहाँ उसका मूल भाग ही लेना चाहिये और जहाँ ओषधियों का परिमाण (तौल) नहीं लिखा हो वहाँ उन सबों को समभाग में लेना चाहिये । जहाँ कोई विशेष पात्र (बर्तन) का उल्लेख न हो वहाँ मिट्टी का पात्र लेना चाहिये और जहाँ किसी विशेष काल का निर्देश न किया गया हो वहाँ प्रातःकाल का ही ग्रहण करना चाहिये ।।९९-१०४।। नवान्येव हि योज्यानि द्रव्याण्यखिलकर्मसु । विना विडङ्गकृष्णाभ्यां गुडधान्याज्यमाक्षिकैः ।।१०५।। सभी कार्यों में नवीन ही ओषधियाँ लेनी चाहिये किन्तु वायविडङ्ग, पीपर, गुड़, धान्य, घृत और शहद को पुराना ही लेना चाहिये ।।१०५।। ❖ धान्यमन्नम् ।।१०५।। यहाँ 'धान्य' पद से 'अन्न अर्थात् चावल' का ग्रहण करना चाहिये ।।१०५।। पुराणं तु प्रशस्तं स्यात्ताम्बूलं काञ्जिकं तथा । शुष्कं नवीनद्रव्यं तु योज्यं सकलकर्मसु ।।१०६।। आर्द्रांन्तु द्विगुणं युञ्ज्यादेष सर्वत्र निश्चयः । गुडूची कुटजो वासा कूष्माण्डश्च शतावरी ।।१०७।। अश्वगन्धा सहचरः शतपुष्पा प्रसारिणी । प्रयोक्तव्याः सदैवार्द्राद्विगुणं नैव कारयेत् ।।१०८।। ताम्बूल (पान) और कांजी पुराना ही अच्छा होता है। सभी कार्यों में नवीन द्रव्य सुखाकर लेना चाहिये । जो गीली ओषधियाँ हैं उन्हें अन्य ओषधियों की अपेक्षा निश्चयपूर्वक सर्वत्र दूनी ही लेनी चाहिये । किन्तु गुरुच, कुड़ा (कोरैया), अडूसा, कूष्माण्ड (पेठा), सतावर, अश्वगन्धा, कटसरैया, सौंफ और प्रसारिणी (गन्धप्रसारणी या पसरन) ये सभी ओषधियाँ यद्यपि सदा गीली ही लेने का विधान है तथापि दूनी नहीं लेनी चाहिये अर्थात् और ओषधियों के बराबर ही लेनी चाहिये ।।१०६-१०८।। ❖ सहचरः=कुरण्टकः, 'कटसरैया' इति लोके ।।१०६-१०८।। यहाँ 'सहचर' से 'कुरण्टक अर्थात् लोक में प्रसिद्ध कटसरैया' का ही ग्रहण करना चाहिये ।। अन्यञ्च वासानिम्बपटोलकेतकबलाकूष्माण्डकेन्दीवरीवर्षभूकुटजाश्च कन्दसहिता सा पूतिगन्धाऽमृता । ऐन्द्री नागबला कुरुण्टकपुरच्छत्राऽमृताः सर्वदा सार्द्रा एव तु न क्वचिद् द्विगुणिताः कार्येषु योज्या बुधैः१ ।।१०९।। १. 'वासा निम्बपटोलकेतकबलाकूष्माण्डकेन्दीवरी-वर्षभूकुटजाश्वगन्धसहितास्ताः पूतिगन्धाऽमृता। मांसी नागबला कुरण्टकपुरौ हिङ्ग्वाद्रैकक्षैक्षवम् गृह्णीयात् सरमान्यमूनि न पुनः कुर्याद् द्विभागानि चे'ति पाठन्तरम्। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे इसी सम्बन्ध में अन्य वचन—अडूसा, नीम, परवल, केवड़ा, बला (खिरेटी या वरियारा), पेठा, सतावर, वर्षाभू (पुनर्नवा), कुड़ा, कन्द (कमल का कन्द आदि), गन्धप्रसारणी, गिलोय, इन्द्रवारुणी (इन्द्रायन), गुलशकरी, कटसरैया, सौंफ और दूर्वा ये सब ओषधियाँ वैद्यों को सभी कार्यों में सदा गीली ही लेनी चाहिये तथा गीली होने से कभी दूनी मात्रा में नहीं किन्तु समभाग में ही लेनी चाहिये ।।१०९।। ❖ १'इन्दीवरी=शतावरी। पूतिगन्धा=गन्धप्रसारणी। ऐन्द्री=इन्द्रवारुणी। नागबला=गुलशकरी। कुरण्टकः=पीतपुष्पः (कटसरैया)। पुरो=गुग्गुलः ।।१०९।। यहाँ 'इन्दीवरी' से 'सतावर', 'पूतिगन्धा' से 'गन्धप्रसारणी', 'ऐन्द्री' से इन्द्रवारुणी (इन्द्रायन), 'नागबला' से 'गुलशकरी' 'कुरण्टक' से 'पीले फूल वाली 'कटसरैया' और 'पुर' से 'गुग्गुलु' का ग्रहण करना चाहिये ।।१०९।। घृतं तैलं च पानीयं कषायं व्यञ्जनादिकम्। पक्त्वा शीतीकृतं चोष्णं तत्सर्वं स्याद्विषोपमम् ।।११०।। घी, तैल, जल, क्वाथ (काढ़ा) और व्यञ्जन (भोज्यपदार्थ शाक) आदि ये सब द्रव्य अग्नि पर रखने से परिपक्व होकर शीतल होने पर पुनः आग पर रख कर यदि गरम किये जायँ तो विष की भाँति विकार युक्त हो जाते हैं अतः पुनः गरम नहीं करना चाहिये ।।११०।। अथ द्रव्याणां परीक्षामाह- सूक्ष्मास्थिर्मांसला पथ्या सर्वकर्माणि पूजिता। क्षिप्ताऽम्भसि निमज्जेद्या भल्लातक्यस्तथोत्तमाः ।।१११।। वराहमूर्द्धवत्कन्दो वाराहीकन्दसंज्ञकः। सौवर्चलं तु काचाभं सैन्धवं स्फटिक प्रभम् ।।११२।। सुवर्णच्छविकं ज्ञेयं स्वर्णमाक्षिकमुत्तमम्। २ओड्रपुष्पप्रतीकाशा मनोह्वा चोत्तमामृता ।।११३।। श्रेष्ठं शिलाजतु ज्ञेयं प्रक्षिप्तं न विशीर्यते। तोयपूर्णे कांस्यपात्रे प्रतानेन विवर्धते ।।११४।। कर्पूरस्तुवरः स्निग्ध एला सूक्ष्मफला वरा। श्वेतचन्दनमत्यन्तं सुगन्धि गुरुपूजितम् ।।११५।। रक्तचन्दनमत्यन्तं लोहितं प्रवरं मतम्। काकतुण्डनिभः स्निग्धो गुरुः श्रेष्ठो गुरुर्मतः ।।११६।। सुगन्धि लघु रूक्षं च सुरदारु वरं मतम्। सरलं स्निग्धमत्यर्थं सुगन्धि च गुणावहम् ।।११७।। अतिपीता प्रशस्ता तु ज्ञेया दारुनिशा बुधैः। जातीफलं गुरु स्निग्धं समं शुभ्रान्तरं वरम् ।।११८।। ओषधियों की परीक्षा—जिस हरड़ में गुठली छोटी और गूदे अधिक हों तथा जो जल में डालने पर डूब जाय वह भी सभी कार्यों में लेने के लिये उत्तम होता है इसी प्रकार पतली गुठली से युक्त अधिक गूदे वाला एवं जल में डालने पर डूब जाने वाला भिलावा भी अच्छा होता है। जो वाराहीकन्द सूअर के शिर के आकार का होता है वह उत्तम है। साँभरनोन काँच के सदृश होने से उत्तम होता है। सेंधानमक स्फटिक के समान होने से उत्तम है। सोना मक्खी सोने के समान कान्ति वाली होने से उत्तम होती है। मैनशिल जवाकुसुम के समान वर्ण वाला होने से उत्तम होता है। शिलाजीत वही उत्तम कहलाता है जो जल से पूर्ण काँसे के पात्र में डालने से गल न जाय किन्तु उससे सूत के सदृश निकल कर चारो ओर बढ़े। कपूर कसैला तथा स्निग्ध होने से उत्तम होता है। सफेद चन्दन अत्यन्त सुगन्धित तथा गुरु (भारी) होने से उत्तम होता है। लालचन्दन अत्यन्त लाल होने से उत्तम होता है। अगर आकार में कौवे की चोंच के समान, स्निग्ध तथा गुरु (भारी) होने से उत्तम होता है। देवदारु सुगन्ध युक्त, हल्का और रूखा होने से उत्तम होता है। सरल (चीर की लकड़ी) अत्यन्त स्निग्ध और सुगन्ध युक्त होने से गुणकारी होता है। दारुहल्दी अत्यन्त पीली होने से उत्तम समझी जाती है। जायफल गुरु (भारी), स्निग्ध, सम आकार वाली और भीतर से सफेद होने से उत्तम होता है ।।१११-११८।। १. 'इन्दी' इति पाठः क्वचिन्नोपलभ्यते। २. 'इन्द्रे'ति पाठः।
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८५ मृद्वीका सोत्तमा ज्ञेया या स्याद्गोस्तनसन्निभा । करमर्दफलाकारा मध्यमा सा प्रकीर्तिता ।।११८।। जो दाख आकार में गौ के स्तन के समान हो वह उत्तम और जो आकार में करौंदे के समान हो उसे गुण में मध्यम समझना चाहिये ।।११९।। ❖ गोस्तनसन्निभा 'मुनक्का' इति लोके । करमर्दफलाकारा 'करम्बा' इति लोके ।।११९।। जो दाख आकार में गौ के स्तन के समान होता है, उसे लोक 'मुनक्का' कहते हैं और जो आकार में करौंदे के फल के समान होती है, उसे लोक 'करम्बा' (किसमिस) कहते हैं ।।११९।। खण्डं तु विमलं श्रेष्ठं चन्द्रकान्तसमप्रभम् । गव्याज्यसदृशं रुच्यं गन्धं मधुवरं मतम् ।।१२०।। जो खांड निर्मल तथा चन्द्रकान्त मणि के समान सफेद पीलाई लिये हुये हो वह उत्तम होती है। जो मधु (शहद) रङ्ग में गाय के घी के समान, रुचिकारक और सुगन्धित हो वह उत्तम समझा जाता है ।।१२०।। अथ स्वभावतो हितानि द्रव्याण्याह- शालीनां लोहितः शालिः षष्टिकेषु च षष्टिकः । शूकधान्येष्वपि यवो गोधूमः प्रवरो मतः ।।१२१।। शिम्बीधान्ये वरो मुद्गो मसूरश्चाढकी तथा । रसेषु मधुरः श्रेष्ठो लवणेषु च सैन्धवः ।।१२२।। स्वभावतः हितकारक द्रव्य—शाली धानों में लाल शाली धान्य, षष्टिक (६० दिन में पकनेवाले) धान्यों में षष्टिक (साठी) धान्य, शूक (टूँडीदार) धान्यों में यव (जौ) तथा गेहूँ उत्तम होता है। शिम्बो (फलीवाले) धान्यों में मूँग, मसूर तथा अरहर उत्तम होता है। छः प्रकार के रसों में मधुर रस उत्तम होता है। और नमक में सेंधानमक उत्तम होता है ।।१२१-१२२।। दाडिमामलकं द्राक्षा खर्जूरं च परूषकम् । राजादनं मातुलुंगं फलवर्गेषु शस्यते ।।१२३।। फलों के वर्गों में—अनार, आँवला, दाख (अंगूर), खर्जूर (छुहारा), फालसा, खिरनी और बिजौरा निम्बू ये सब उत्तम होते हैं ।।१२३।। ❖ परूषकं 'फालसा' इति लोके । राजादनं 'खिरणी' इति लोके । मातुलुंगं 'बिजउरा' इति लोके ।।१२३।। यहाँ 'परूषक' से लोक में प्रसिद्ध 'फालसा' और 'राजादन' से लोकप्रसिद्ध 'खिरनी' तथा 'मातुलुङ्ग' से लोक में प्रसिद्ध 'बिजउरा नींबू' समझना चाहिये ।।१२३।। पत्रशाकेषु वास्तूकं जीवन्ती पोतिका वरा । पटोलं फलशाकेषु कन्दशाकेषु सूरणम् ।।१२४।। एणः कुरङ्गो हरिणो जाङ्गलेषु प्रशस्यते । पक्षिणां तित्तिरिलावो वरो मत्स्येषु रोहितः ।।१२५।। हरिणस्ताम्रवर्णः स्यादेणः कृष्णतया मतः । कुरङ्गस्ताम्र उद्दिष्टो हरिणाकृति को महान् ।।१२६।। जलेषु दिव्यं दुग्धेषु गव्यमाज्येषु गोभवम् । तैलेषु तिलजं तैलमैक्षवेषु सिता हिता ।।१२७।। पत्ते के शाकों में बथुआ, जीवन्ती और पोई ये सब उत्तम होते हैं। फल के शाकों में 'परवल' और कन्द के शाकों में 'सूरन' उत्तम होता है। जङ्गली जीवों के मांसों में एण, कुरङ्ग तथा हरिण का मांस उत्तम होता है। पक्षियों में तीतर तथा लवा का मांस उत्तम होता है। मछलियों में 'रोहू मछली' का मांस उत्तम होता है। एण, कुरङ्ग तथा हरिण का परस्पर भेद यह है कि—हरिण तांबे के समान वर्ण वाला होता है तथा एण कृष्ण वर्ण का होता है एवं कुरङ्ग भी यद्यपि हरिण के समान ताम्रवर्ण का ही होता है तथापि उसकी अपेक्षा बड़ा होता है। जलों में आकाश का जल, दूधों में गाय का दूध, घृतों में गाय का घी, तेलों में तिल का तेल, ईख से बने हुये गुड़ादि में शक्कर ये सब उत्तम (हितकर) होते हैं ।।१२४-१२७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
अथ स्वभावादहितानि द्रव्याण्याह- शिम्बीषु माषान्ग्रीष्मर्त्तौ लवणेष्बौषरं त्यजेत् । फलेषु लकुचं शाके सार्षपं न हितं मतम् ।।१२८।। स्वभावतः अहितकर द्रव्य—शिम्बीधान्यों में उरद और नमक में खारी (ऊसर पृथ्वी से उत्पन्न हुआ) नमक का ग्रीष्म ऋतु में सेवन करना छोड़ देना चाहिये, क्योंकि अहितकर होते हैं। फलों में बड़हर और शाकों में सरसों का शाक हितकर नहीं होता है ॥१२८॥ गोमांसं ग्राम्यमांसेषु न हितं महिषीवसा । मेषीपयः कुसुम्भस्य तैलं त्याज्यं च फाणितम् ।।१२९।। गाँव के जीवों के मांसों में गोमांस और वसा (चर्बी) में भैंस की वसा, दूधों में भेड़ी का दूध, तेलों में कुसुम का तेल और ईख के बने हुये पदार्थों में फाणित (राव) त्यागने के योग्य (अहितकर) होता है ।।१२९॥ ❖ इक्षुरसः परिपक्वो योऽर्धघनः फाणितम् । तद्वि 'छोयाराव' इति लोके ।।१२९।। यहाँ 'फाणित' से यह समझना चाहिये कि जो ईख का रस पकाकर आधा पतला आधा गाढ़ा के हालत में रहता है, जिसे लोक में 'छोया राब (राब)' कहते हैं ॥१२९॥
अथ संयोगविरुद्धानि द्रव्याण्याह- मत्स्यमानूपमांसं च दुग्धयुक्तं विवर्जयेत् । कपोतं सर्षपस्नेहभर्जितं परिवर्जयेत् ।।१३०।। मत्स्यानिक्षोर्विकारेण तथा क्षौद्रेण वर्जयेत् । सक्तून्मांसपयोयुक्तानुष्णोदधि विवर्जयेत् ।।१३१।। उष्णैर्नभोऽम्बुना क्षौद्रं पायसं कृसरान्वितम् । रम्भाफलं त्यजेत्तक्रदधिबिल्वफलान्वितम् ।।१३२।। दशाहामुषितं सर्पिः कांस्ये मधुघृतं समम् । कृतान्नं च कषायं च पुनरुष्णीकृतं त्यजेत् ।।१३३।। एकत्र बहुमांसानि विरुध्यन्ते परस्परम् । मधु सर्पिर्वसा तैलं पानीयं वा पयस्तथा ।।१३४।। संयोग होने से विरुद्ध गुणकारी द्रव्य—दूध के साथ मछली या अनूप देश के जीवों का मांस, सरसों के तेल में भुना हुआ कबूतर का मांस भोजन नहीं करना चाहिये एवं मछलियों को ईख के बने हुये गुड़ या शहद के साथ नहीं खाना चाहिये। इसी प्रकार मांस और दूध मिलाकर सत्तू, उष्ण द्रव्यों के साथ दही, द्रव्य तथा वर्षा के जल के साथ शहद, खिचड़ी के साथ शहद, खिचड़ी के साथ खीर और मट्ठा, दही या बेल का फल, इनमें से किसी के भी साथ केले का फल नहीं खाना चाहिये। दश दिन तक कांसे के पात्र में रखा हुआ घी या समभाग में मिला हुआ शहद तथा घृत ये दोनों संयोग विरुद्ध होने से त्याज्य है। पकाया हुआ अन्न या पकाया हुआ काढ़ा शीतल होने पर पुनः यदि उष्ण किया गया हो तो ये दोनों भी त्याज्य हैं। अनेक प्रकार के मांस एकत्र पकाने से परस्पर विरुद्ध हो जाते हैं तथा शहद, घी, चर्बी, तेल, जल और दूध भी एकत्र पकाने से परस्पर विरुद्ध हो जाते हैं अतः ये सब भोजन के लिये सदा त्याज्य हैं ॥१३०-१३४॥
अथ भेषजग्रहणसङ्केतमाह- लवणं सैन्धवं प्रोक्तं चन्दनं रक्तचन्दनम् । चूर्णलेहासवस्नेहः साध्या धवलचन्दनैः ।। कषायलेपयोः प्रायो युज्यते रक्तचन्दनम् ।।१३५।। अन्तः सम्मार्जने ज्ञेया ह्यजमोदा यवानिका । बहिः सम्मार्जने सैव विज्ञातव्याऽजमोदिका ।।१३६।। पथ्यः सर्पिः प्रयोगेषु गव्यमेव हि गृह्यते । शकृद्रसो मोमयको मूत्रं गोमूत्रमुच्यते ।।१३७।। ओषधियों के लेने का सङ्केत—केवल 'लवण' कहने से सेंधा नमक' और 'चन्दन' कहने से लाल चन्दन का सर्वत्र ग्रहण करना चाहिये। चूर्ण, अवलेह, आसव तथा तैल बनाने में 'सफेद चन्दन' ही लेना चाहिये। प्रायः करके काढ़ा
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८७ तथा लेप में 'रक्तचन्दन' का ही प्रयोग होता है। शरीर के भीतरी भाग की शुद्धि के लिये जहाँ अजमोदा लेना कहा गया हो वहाँ जवाइन लेनी चाहिये तथा बाहर की शुद्धि अर्थात् प्रलेपादि के लिए जहाँ अजमोद लेना कहा हो वहाँ 'वनजवाइन' लेना चाहिये। जहाँ केवल दूध या घी का निर्देश किया गया हो वहाँ गाय के ही दूध और घी का प्रयोग करना चाहिये। जहाँ विष्ठा का रस लेने को कहा हो, वहाँ गौ के गोबर का रस लेना चाहिये। जहाँ केवल 'मूत्र' का निर्देश हो वहाँ गौ का ही मूत्र लेना चाहिये ॥१३५-१३७॥ अथ प्रतिनिधिद्रव्याण्याह- चित्रकाभावतो दन्ती क्षारः शिखरिजोऽथवा। अभावे धन्वयासस्य प्रक्षेप्या तु दुरालभा ।।१३८।। प्रतिनिधि द्रव्यों का संकेत—चित्रक (चित्त) के अभाव में दन्ती या अपमार्ग (चिचिड़ा) का क्षार और धन्वयास (मरुभूमि की जवासा या धमासा) के अभाव में दुरालभा (जवासा) लेना चाहिये ।।१३८।। ❖ शिखरी=अपामार्गः ।।१३८।। यहाँ 'शिखरी' से 'अपामार्ग' अर्थात् 'चिचिड़ा' का ग्रहण करना चाहिये ।।१३८।। तगरस्याप्यभावे तु कुष्ठं दद्याद्भिषग्वरः। मूर्वाऽभावे त्वचो ग्राह्या जिङ्गिनीप्रभवा बुधैः ।।१३९।। जो तगर के अभाव में विद्वान् वैद्य कूठ और मूर्वा के अभाव में मञ्जीठ की छाल लेवें ।।१३९।। अहिंस्राया अभावे तु मान कन्दः प्रकीर्त्तितः । लक्ष्मणाया अभावे तु नीलकण्ठशिखा मता ।।१४०।। अहिंस्रा के अभाव में मानकन्द और लक्ष्मणा के अभाव में मयूरशिखा लेवें ।।१४०।। ❖ नीलकण्ठशिखा=मयूरशिखा ।।१४०।। यहाँ 'नीलकण्ठशिखा' से 'मयूरशिखा' का ग्रहण करना चाहिये ।।१४०।। बकुलाभावतो देयं कहारोत्पलपङ्कजम्। नीलोत्पलस्याभावे तु कुमुदं देयमिष्यते ।।१४१।। जातीपुष्पं न यत्रास्ति लवंगं तत्र दीयते। अर्कपर्णादिपयसो ह्यभावे तद्रसो मतः।।१४२।। पौष्कराभावतः कुष्ठं तथा लाङ्गल्यभावतः। स्यौणेयकस्याभावे तु भिषग्भिर्दीयते गदः ।।१४३।। चविकागजपिप्पल्यौ पिप्पलीमूलवत्स्मृतौ ।।१४४।। मौलसिरी के अभाव में कल्हार, नीलकमल या पद्म लेवे और नीलकमल के अभाव में कुमुद (कोई) का फूल (नीलोफर) लेवे। चमेली का फूल जहाँ न हो वहाँ उसके स्थान में लवङ्ग देना चाहिये। आक (मदार) के पत्ते आदि के दूध के अभाव में उसके पत्ते का रस लेना चाहिये। पोहकर मूल तथा कलिहारी के अभाव में कूठ और थुनेर के अभाव में कूठ लेना चाहिये। चव और गजपीपल ये दोनों पिपरामूल के समान माने गये हैं अतः दोनों के अभाव में इसे देना चाहिये ।।१४१-१४४।। अभावे सोमराज्यास्तु प्रपुन्नाडफलं मतम्। यदि न स्याद्दारुनिशा तदा देया निशा बुधैः ।।१४४।। बाकुची के अभाव में चकवड़ का फल और यदि दारुहलदी न हो तब उसके अभाव में बुद्धिमान् वैद्य को हल्दी ही लेना चाहिये ।।१४५।। ❖ सोमराजी=बाकुची। प्रपुन्नाडफलं=चक्रमर्दफलम्। दारुनिशा=दारुहरिद्रा। निशा=हरिद्रा ।।१४५।। यहाँ 'सोमराजी' से 'वाकुची' का और 'प्रपुन्नाड फल' से 'चकवड़ के फल का तथा दारुनिशा' से 'दारुहल्दी' का एवं 'निशा' से 'हल्दी' का बोध करना चाहिये ।।१४५।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१८८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे रसाञ्जनस्याभावे तु १दार्वाक्वथः प्रयुज्यते । सौराष्ट्रयभावतो देया स्फटिका तद्गुणा जनैः ।।१४६।। रसौत के अभाव में दारुहल्दी के क्वाथ का प्रयोग करना चाहिये और सौराष्ट्र देश की मिट्टी अर्थात् सोरठी माटी के अभाव में उसी के समान गुणवाली फिटकिरी लेना चाहिये ।।१४६।। ❖ सौराष्ट्री='सोरठी माटी' इति लोके । स्फटिका='फिट्किरी' इति लोके ।।१४६।। यहाँ 'सौराष्ट्री' से 'सोरठी माटी' नाम से लोकप्रसिद्ध द्रव्य का तथा 'स्फटिका' से 'फिट्किरी' का ग्रहण करना चाहिये ।।१४६।। तालीसपत्रकाभावे स्वर्णताली प्रशस्यते । भार्ङ्गयभावे तु तालीसं कण्टकारीजटाऽथवा ।।१४७।। तालीसपत्र के अभाव में स्वर्णताली और भार्ङ्गी के अभाव में तालीस पत्र अथवा कटेरी (भटकटैया) की जड़ देना चाहिये ।।१४७।। रुचकाभावतो दद्याल्लवणं पांशुपूर्वकम् । अभावे मधुयष्ट्यास्तु धातकीं च प्रयोजयेत् ।।१४८।। रुचक (कालानमक) के अभाव में खारीनमक (रेह का नमक) और मधुयष्टि (मुलहठी) के अभाव में धाय का फूल देना चाहिये ।।१४८।। ❖ रुचकं='चौहार' इति लोके । पांशुलवणं='खारी' अथवा 'रेह' इति लोके ।।१४८।। यहाँ 'रुचक' से 'चौहार' नाम से लोक में प्रसिद्ध वस्तु को और 'पांशुलवण' से 'खारी अथवा रेह' को समझना चाहिये ।।१४८।। अम्लवेतसकाभावे चुक्रं दातव्यमिष्यते । द्राक्षा यदि न लभ्येत प्रदेयं काश्मरीफलम् ।।१४९।। तयोरभावे कुसुमं २मधूकस्य मतं बुधैः । लवङ्गकुसुमं देयं नखस्याभावतः पुनः ।।१५०।। कस्तूर्यभावे कङ्कोलं क्षेपणीयं विदुर्बुधाः । कङ्कोलस्याप्यभावे तु जातीपुष्पं प्रदीयते ।।१५१।। सुगन्धिमुस्तकं देयं कर्पूराभावतो बुधैः । कर्पूराभावतो देयं ग्रन्थिपर्णं विशेषतः ।।१५२।। कुङ्कुमाभावतो दद्यात्कुसुम्भकुसुमं नवम् । श्रीखण्डचन्दनाभावे कर्पूरं देयमिष्यते ।।१५३।। अभावे त्वेतयोर्वैद्यः प्रक्षिपेद्रक्तचन्दनम् । रक्तचन्दनकाभावे नवोशीरं विदुर्बुधाः ।।१५४।। मुस्ता चातिविषाभावे शिवाऽभावे शिवा मता । अभावे नागपुष्पस्य पद्मकेशरमिष्यते ।।१५५।। अम्लवेत (अमलतास) के अभाव में चुक्र और 'दाख' के अभाव में गाम्भारी का फल तथा उन दोनों के अभाव में महुए का फूल देना चाहिये । नख नामक ओषधि के अभाव में लवङ्ग का फूल, कस्तूरी के अभाव में कङ्कोल और कङ्कोल के अभाव में चमेली का फूल देना चाहिये । कपूर के अभाव में सुगन्धमोथा या विशेष कर कपूर के अभाव में ग्रन्थिपर्ण (गठौना) देना चाहिये । इसी प्रकार केसर के अभाव में कुसुम का नवीन फल, सफेद चन्दन के अभाव में कर्पूर और इन दोनों (सफेद चन्दन और कर्पूर) के अभाव में लाल चन्दन, लाल चन्दन के अभाव में नवीन खस, अतीस के अभाव में मोथा, हरड़ के अभाव में आँवला और नागकेशर के अभाव में कमल का केशर देना चाहिये ।।१४९-१५५।। मेदाजीवककाकोलीऋद्धिद्वन्द्वेऽपि वाऽसति । वरीविदार्यश्वगन्धावाराहीश्च क्रमात् क्षिपेत् ।। मेदा और महामेदा के अभाव में शतावरी, जीवक और ऋषभक के अभाव में विदारीकन्द, काकोली और क्षीरकाकोली के अभाव में असगन्ध और ऋद्धि तथा वृद्धि के अभाव में बाराहीकन्द डालना चाहिये ।।१५६।। १. 'सम्यग् दार्वा'ति पाठः । २. 'बन्धूकस्ये'ति पाठः ।
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८९ ❖ वरी=शतावरी ।।१५६।। यहाँ 'वरी' से 'शतावरी' का ग्रहण करना चाहिये ।।१५६।। वाराह्याश्च तथाऽभावे चर्मकारालुको मतः । वाराहीकन्द संज्ञस्तु पश्चिमे गृष्टिसंज्ञकः ।।१५७।। वाराहीकन्द एवान्यश्चर्मकारालुको मतः । अनूपसम्भवे देशे वराह इव लोमवान् ।।१५८।। भल्लातकासहत्वे तु रक्तचन्दनमिष्यते । भल्लाताभावतश्चित्रं नलश्चेक्षोरभावतः ।।१५९।। सुवर्णाभावतः स्वर्णमाक्षिकं प्रक्षिपेद् बुधः । श्वेतं तु माक्षिकं ज्ञेयं बुधै रजतवद् ध्रुवम् ।।१६०।। माक्षिकस्याप्यभावे तु प्रदद्यात्स्वर्णगैरिकम् । सुवर्णमथ वा रौप्यं मृतं यत्र न लभ्यते ।।१६१।। तत्र कान्तेन कर्माणि भिषक्कुर्याद्विचक्षणः । कान्ताभावे तीक्ष्णलोहं योजयेद्वैद्यसत्तमः ।।१६२।। अभावे मौक्तिकस्यापि मुक्ताशुक्तिं प्रयोजयेत् । मधु पत्र न लभ्येत तत्र जीर्णगुडो मतः ।।१६३।। मत्स्यण्ड्य भावतो दद्युर्भिषजः सितशर्कराम् । असम्भवे सितायास्तु बुधैः खण्डं प्रयुज्यते ।।१६४।। क्षीराभावे रसो मौद्गो मांसूरो वा प्रदीयते । अत्र प्रोक्तानि वस्तूनि यानि तेषु च तेषु च ।।१६५।। योज्यमेकतराभावे परं वैद्येन जानता । रसवीर्यविपाकाद्यैः समं द्रव्यं विचिन्त्य च ।।१६६।। युञ्ज्यात्त द्विधमन्यच्च द्रव्याणां तु रसादिवित् । योगे यदप्रधानं स्यात्तत्य प्रतिनिधिर्मतः ।।१६७।। यत्तु प्रधानं तस्यापि सदृशं नैव गृह्यते¹ । व्याधेरयुक्तं यद्द्रव्यं गणोक्तमपि तत्त्यजेत् ।। अनुक्तमपि युक्तं यद्योजयेत्तद्रसादिवित् ।।१६८।। वाराहीकन्द के अभाव में 'चर्मकारालु' लेना चाहिये। वाराहीकन्द को पश्चिम देश में गृष्टि (गैंठी) कहते हैं। वाराहीकन्द का ही दूसरा भेद 'चर्मकारालु' है। यह अनूपदेश में उत्पन्न होता है तथा इसके ऊपर सूअर की भाँति रोम होते हैं। भिलावा यदि सह्य न होता हो तो उसके स्थान पर लाल चन्दन डालना चाहिये। भिलावा के अभाव में चीता और ईंख के अभाव में नरसल, सोना के अभाव में सोनामाखी डालना चाहिये। रूपामाखी का गुण चाँदी की तरह होता है अतः चाँदी के अभाव में रूपामाखी डालना चाहिये। माक्षिक (सोनामाखी तथा रूपामाखी) के अभाव में स्वर्णगैरिक (पीलागेरू) डालना चाहिये। यदि स्वर्ण या चाँदी का भस्म न मिले तो बुद्धिमान् वैद्य कान्तलौह (उसके भस्म) ले और कान्तलौह के अभाव में तीक्ष्णलौह का एवं मोती के अभाव में मोती के सीप का प्रयोग करना चाहिये। जहाँ मधु न मिले वहाँ पुराने गुड़ से काम चलाना चाहिये। मिश्री के अभाव में सफेद चीनी का और शक्कर के अभाव में खाँड़ का प्रयोग करना चाहिये। दूध के अभाव में मूँग अथवा मसूर का जूस देना चाहिये। यहाँ जितने प्रतिनिधि द्रव्य जहाँ-जहाँ कहे गये हैं वहाँ-वहाँ जानकार वैद्य को एक के अभाव में दूसरे प्रतिनिधि द्रव्य का प्रयोग अवश्य करना चाहिये। जैसे दन्ती के अभाव में चित्रक और चित्रक के अभाव में दन्ती छोड़ना चाहिये। द्रव्यों तथा रसादिकों के जानने वाले वैद्यों को चाहिये कि वह इन प्रतिनिधि द्रव्यों के अतिरिक्त अन्य भी जो द्रव्य रस, वीर्य तथा विपाक आदि से समान हों उन्हें विचार कर एक के अभाव में दूसरे का प्रयोग करें। किसी ओषधि के योग में जो अप्रधान औषध हों उनका प्रतिनिधि दूसरा औषध ले लेवें और जो प्रधान हों उसी के समान रसवीर्यादि वाली दूसरी औषध न लेवे अर्थात् प्रधान औषध का प्रतिनिधि दूसरा औषध न लेवे। जो द्रव्य व्याधि के लिये अयोग्य हो वह यदि उस रोग सम्बन्धी द्रव्यों की गणना में रहे तथापि उस द्रव्य को उस योग से निकाल देना चाहिये और जो योग में न कहा हो किन्तु योग्य हो तो उस द्रव्य को जो द्रव्यगत रसादि के वेत्ता वैद्य हों वे अवश्य प्रयोग करें ।।१५७-१६८।। अथ द्रव्यगतपञ्चपदार्थकर्माण्यह- द्रव्ये रसो गुणो वीर्य विपाकः शक्तिरेव च । पदार्थाः पञ्च तिष्ठन्ति स्वं स्वं कुर्वन्ति कर्म च ।।१६९।। १. 'विविधे'ति पाठा.।
१९० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे द्रव्यों के अन्तर्गत रहनेवाले पञ्च पदार्थों के कर्म-द्रव्यों में (१) रस, (२) गुण, (३) वीर्य, (४) विपाक तथा (५) शक्ति इस प्रकार से पाँच पदार्थ रहते हैं और अपने-अपने कर्मों को करते हैं ॥१६९॥ तत्र (रसा) वाग्भटः- रसाः स्वाद्वम्ललवणतिक्तोषणकषायकाः । षड्द्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्वं बलावहः ।।१७०।। उसमें प्रथम 'रस' के विषय में 'वाग्भट' का मत है कि-(१) मधुर, (२) खट्टा, (३) नमकीन, (४) तीता, (५) कड़वा और (६) कसैला इस प्रकार से छः रस योग्यतानुसार द्रव्यों में रहते हैं और ये पूर्व-पूर्व एक की अपेक्षा दूसरे बलकारक होते हैं अर्थात् कषाय की अपेक्षा कटु और कटु की अपेक्षा तिक्त, तिक्त की अपेक्षा मधुर रस अधिक बलकारक होता है ॥१७०॥ ❖ ऊषणः=कटुः ॥१७०॥ यहाँ 'ऊषण' पद से 'कटु' समझना चाहिये ॥१७०॥ तत्राद्या मारुतं घ्नन्ति त्रयस्तिक्तादयः कफम्। कषायतिक्तमधुराः पित्तमन्ये तु कुर्वते ।।१७१।। ये रसा वातशमना भवन्ति यदि तेषु वै। रौक्ष्यलाघवशैत्यानि न ते हन्युः समीरणम् ।।१७२।। ये रसाः पित्तशमना भवन्ति यदि तेषु वै। तीक्ष्णोष्णलघुताश्चैव नैते तत्कर्मकारिणः ।।१७३।। ये रसाः श्लेष्मशमना भवन्ति यदि तेषु वै। स्नेहगौरवशैत्यानि न ते हन्युः कफं तदा ।।१७४।। मधुरादि छः प्रकार के रसों में प्रथम जो मधुर, अम्ल तथा लवण ये तीन रस हैं वे सेवन करने से वायु को नष्ट करते हैं और शेष जो तिक्त, कटु और कषाय तीन रस हैं वे कफ को दूर करते हैं एवं कषाय, तिक्त और मधुर ये तीन रस पित्त को दूर करते हैं। जो-जो रस वातादि को नष्ट करते हैं उनसे भिन्न अवशिष्ट जो रस हैं, वे वातादि की वृद्धि करते हैं अर्थात् मधुर, अम्ल, लवण रस यदि वायु को नष्ट करते हैं तो अवशिष्ट तिक्त, कटु, कषाय, रस वायु की वृद्धि करते हैं एवं तिक्त, कटु, कषाय रस यदि कफ को नष्ट करते हैं तो अवशिष्ट मधुर, अम्ल, लवण रस कफ की वृद्धि करते हैं। इसी कषाय, तिक्त, मधुर रस यदि पित्त को नष्ट करते हैं तो अवशिष्ट अम्ल, लवण, कटु रस पित्त की वृद्धि करते हैं। जो रस वात को शमन करने वाले हैं उनमें यदि रूक्षता, लघुता तथा शीतलता ये गुण हों तो वे वायु को नाश करने में नहीं समर्थ होते हैं। जो रस पित्त के शमन करने वाले हैं उनमें यदि तीक्ष्णता, उष्णता तथा लघुता ये गुण हों तो वे पूर्वोक्त कर्म अर्थात् पित्तनाश करने में नहीं समर्थ होते हैं एवं जो रस कफ के शमन करने वाले हैं उनमें यदि स्नेह, गुरुता तथा शीतलता हो तो वे कफ के नाश करने में नहीं समर्थ होते हैं ॥१७-१७४॥ अथ मधुररसस्य गुणानाह- मधुरो हि रसः शीतो धातुस्तन्यबलप्रदः । अक्ष्यो वातपित्तघ्नः कुर्यात्स्थौल्यमलक्रिमीन् ।।१७५।। विषघ्नः पिच्छिलश्चापि स्निग्धः प्रीत्यायुषोर्हितः । बालवृद्धक्षतक्षीणवर्णकेशेन्द्रियौजसाम् ।।१७६।। प्रशस्तो बृंहणः कण्ठ्यो गुरुः सन्धानकृन्मतः ।।१७७।। मधुर रस के गुण-मधुर रस शीतवीर्य, धातुवर्धक, स्तनों में दुग्ध की वृद्धि करने वाला, बलकारक, आँखों के लिये हितकर, वात पित्त को नष्ट करने वाला, शरीर में स्थूलता, मल तथा कृमि को उत्पन्न करने वाला, विषनाशक, पिच्छिल, स्निग्ध, प्रीतिजनक और आयु के लिये हितकर अर्थात् आयुवर्धक है एवं बालक, वृद्ध, क्षत (घाव) होने से १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. 'रसेषु प्रवरश्चापी'ति पाठा.। तथा च पाठोऽयमन्ते क्वचिल्लभ्यते।
अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १९१ क्षीण हुये व्यक्तियों के लिये तथा वर्ण, केश, इन्द्रिय और ओज के लिये भी हितकर हैं तथा बृंहण (शरीर की वृद्धि करने वाला), कण्ठस्वर के लिये हितकर, गुरु और टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला होता है ।।१७५-१७७।। अथातियुक्तस्य मधुररसस्य गुणानाह- सोऽतियुक्तो ज्वरश्वासगलगण्डाबुर्दकृमीन्। स्थौल्याग्निमान्द्यमेहांश्च कुर्यान्मेदःकफामयान् ।।१७८।। मधुर रस के अत्यन्त सेवन से हानि—यदि मधुर रस का अत्यन्त सेवन किया जाय तो वह ज्वर, श्वास, गलगण्ड, अर्बुद, कृमि, स्थूलता, अग्नि की मन्दता, प्रमेह, मेद और कफ सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करता है ।।१७८।। अथाम्लस्य गुणानाह- रसोऽम्लः पाचनो रुच्यः पित्तश्लेष्मास्रदो लघुः । लेखितोष्णो बहिः शीतः क्लेदनः पवनापहः ।।१७९।। स्निग्धस्तीक्ष्णः सरः शुक्रविबन्धानाहदॄष्टिहा । हर्षणो रोमदन्तानामक्षिभ्रूविनिकोचनः ।।१८०।। अम्ल रस के गुण—अम्ल रस पाचक, रुचिकारक, पित्त, कफ और रुधिर को दूषित करने वाला, लघु, लेखन अर्थात् जमे हुये कफादि को हटानेवाला, उष्ण, बहिःशीत (स्पर्श में शीतल), क्लेद उत्पन्न करने वाला, वायुनाशक, स्निग्ध, तीक्ष्णवीर्य तथा दस्तावर है और वीर्य, विबन्ध (मलादि की विबद्धता), आनाह और दृष्टि को नष्ट करने वाला, रोम तथा दाँतों को हर्षित करने वाला अर्थात् रोमाञ्च तथा दाँत खट्टा करने वाला और नेत्र तथा भौहों को संकुचित करने वाला होता है ।।१७९-१८०।। ❖ लेखितः=लेखनः। बहिःशीतः=स्पर्शे शीतः । विनिकोचनः=सङ्कोचनः ।।१७९-१८०।। यहाँ 'लेखित' से 'लेखत' । 'बहिःशीत' से 'स्पर्श में शीतल' तथा 'विनिकोचन' से 'सङ्कुचित करने वाला' । यह अर्थ समझना चाहिये ।।१७९-१८०।। अथातियुक्तस्याम्लस्य गुणानाह- सोऽतियुक्तो भ्रमं कुर्यात्तृड्दाहतिमिरज्वरान् । कण्डूपाण्डुत्ववीसर्पशोथस्फोटकुष्ठकृत् ।।१८१।। अम्ल रस के अत्यन्त सेवन से हानि—अम्ल रस अत्यन्त सेवन करने से भ्रम, प्यास, दाह, तिमिर (नेत्रसम्बन्धी रोग), ज्वर, खुजली, पाण्डुता, वीसर्प, शोथ (सूजन), विस्फोट और कुष्ठ (कोढ़) रोग उत्पन्न होता है ।।१८१।। अथ लवणस्य गुणानाह- लवणः शोधनो रुच्यः पाचनः कफपित्तदः । पुंस्त्ववातहरः कायशैथिल्यमृदुताकरः ।। बलघ्न१ आस्यजलदः कपोलगलदाहकृत् ।।१८२।। लवण रस के गुण—लवण रस शोधन, वमन तथा विरेचन के द्वारा शरीर को शुद्ध करनेवाला, रुचिकारक, पाचन, कफ तथा पित्त का उत्पादक, पुरुषत्व (रतिशक्ति) तथा वात को नष्ट करने वाला, शरीर में शिथिलता तथा मृदुता को उत्पन्न करने वाला, बलनाशक, मुख में जल बढ़ाने वाला, कपोल तथा गले में दाह करने वाला होता है ।।१८२।। अथातियुक्तस्य लवणस्य गुणानाह- सोऽतियुक्तोऽक्षिपाकास्रपित्तकोठक्षतादिकृत् । वलीपलितखालित्यकुष्ठवीसर्पतृट्प्रदः ।।१८३।। लवण रस के अत्यन्त सेवन से हानि—लवण रस का अत्यन्त सेवन नेत्रपाक, रक्तपित्त, कोठ और क्षत आदि रोगों को करनेवाला, बली (शरीर में सिलवट पड़ जाना), पलित, खालित्य, कोढ़, वीसर्प तथा प्यास को उत्पन्न करनेवाला होता है ।।१८३।। १. ‘चक्षुर्नासास्ये' ति पाठा. ।