भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 222, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १७१ तत्र रोगिणो लक्षणमाह- रोगो यस्यास्ति रोगी स सचिकित्स्यस्तु यादृशः । यादृशश्चाचिकित्स्योऽपि वक्ष्यमाणो निशम्यताम् ।।३८।। रोगी के लक्षण—जिसे रोग हो वह रोगी कहलाता है। वह रोगी जिस प्रकार चिकित्सा करने के योग्य अथवा अयोग्य होता है उसके लक्षण आगे कह रहे हैं ।।३८।। तत्र चिकित्स्यस्य लक्षणमाह- निजप्रकृतिवर्णाभ्यां युक्तःसत्त्वेन चक्षुषा । चिकित्स्यो भिषजां रोगी वैद्यभक्तो जितेन्द्रियः ।।३९।। चिकित्स्य रोगी के लक्षण—वैद्यों के लिये वही रोगी चिकित्सा करने योग्य है जिसकी प्रकृति तथा शरीर का रङ्ग बदला न हो एवं सत्त्व से युक्त तथा देखने की शक्ति जिसकी बनी हो तथा वैद्य में भक्ति रखनेवाला और जितेन्द्रिय हो ।।३९।। ❖ सत्त्वं=व्यसनाभ्युदयक्रियादिष्वविह्वलत्ताकरं, तेन युक्तः । चक्षुषा=चक्षुरुपलक्षितेन, ततोऽन्येनापीन्द्रियेण । चिकित्स्यः=रोगान्मोक्षयितव्यः ।।३९।। सत्त्व से युक्त अर्थात् विपत्ति तथा अभ्युदय (तरक्की) होने पर विह्वल न होना 'सत्त्व' कहलाता है उससे युक्त तथा 'चक्षुरिन्द्रिय' यह उपलक्षण मात्र है अतः चक्षुरिन्द्रिय के साथ-साथ जिसकी और भी इन्द्रियाँ नाक, कान आदि अपने-अपने विषयों के ग्रहण करने योग्य बनी हों एवं 'चिकित्स्य' पद से 'रोग से मुक्त करने योग्य अर्थात् चिकित्सा करने के योग्य' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३९।। अन्यच्च- आयुष्मान्सत्त्ववान्साध्यो द्रव्यवान्मित्रवानपि । चिकित्स्यो भिषजां रोगी वैद्यवाक्यकृदास्तिकः ।।४०।। और भी कहा है कि वैद्य को उसी रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये—जिसकी आयु शेष हो अर्थात् जो आयुष्मान् हो और सत्त्ववान्, साध्य रोग से युक्त, द्रव्यवान्, मित्रवान् (हितैषी), वैद्य के कथनानुसार कार्य करनेवाला और आस्तिक हो ।।४०।। ❖ आयुर्वेदोऽस्तीति मतिर्यस्य स आस्तिकः ।।४०।। यहाँ 'आस्तिक' से 'आयुर्वेद शास्त्र है ऐसी मति जिसकी हो, वह आस्तिक कहलाता है' ।।४०।। अथाचिकित्स्यस्य लक्षणमाह- चण्डः साहसिको भीरुः कृतघ्नो व्यग्र एव च । शोकाकुलो मुमूर्षुश्च विहीनःकरणैश्च यः ।।४१।। वैरी वैद्यविदग्धश्च श्रद्धाहीनश्च शङ्कितः । भिषजामविधेयः स्युर्नोपक्रम्या भिषग्विधाः ।।४२।। अचिकित्स्य रोगी के लक्षण—अत्यन्त क्रोधी, बिना विचार किये कार्य करने वाला, भीरु, कृतघ्न, व्यग्र, शोक से आकुल, मृत्यु की इच्छा रखने वाला, इन्द्रियों से विहीन, वैरी, वैद्यों के साथ धूर्तता करनेवाला तथा वैद्यों के वचनों पर न चलनेवाला एवं अपने को वैद्यों के समान माननेवाला रोगी चिकित्सा करने के योग्य नहीं होता है ।।४१-४२।। ❖ चण्डोऽत्यन्तक्रोधशीलः । साहसिकः=अविचार्यकारी । भीरुर्भयशीलः । कृतघ्नो=वैद्यकृतोपकार- लोपकः । व्यग्रः=व्याकुलः । विहीनः करणैश्च यः=१नेत्रादीन्द्रियशक्तिरहितः ।। वैरी न चिकित्स्यः १. 'निजेन्द्रिये'ति पाठः ।