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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

१६४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ दोषजान् व्याधीनाह- ❖ दोषजाः-मिथ्याऽऽहारविहारप्रकुपितवातपित्तकफजाः। ननु मिथ्याहारविहाराणामपि प्राक्तनसुकृतेन नैरूज्यं दृश्यत एव। ततो दोषजेष्वपि प्राक्तनं दुष्कर्मैव कारणम्, तत्कथं दोषजा इति ? उच्यते-दोषजेष्वपि वस्तुत आदिकारणं दुष्कर्म वर्तत एव, किन्तु तत्र मिथ्याऽऽहार-विहारदूषिता दोषा हेतवो दृश्यन्त इति दोषजा इत्युच्यन्त इति समाधिः। 'दोषज' व्याधि- 'दोषज' व्याधि वे कहलाती हैं जो मिथ्या (अवैध) आहार-विहार करने से कुपित हुये वात, पित्त तथा कफ से उत्पन्न होती है। यहाँ यदि ऐसा कहा जाय कि जब मिथ्या आहार-विहार करने वाले लोगों को भी प्राक्तन पुण्य के बल से रोग रहित देखते हैं, अतः दोषों से उत्पन्न होने वाले रोगों का भी प्राक्तन पाप ही प्रधान कारण है, तब व्याधियाँ कैसे 'दोषज' होती हैं ? इसका उत्तर यह है कि- यद्यपि दोषज व्याधियों में भी प्राक्तन पाप ही प्रधान कारण होता है, किन्तु तो भी यहाँ पर मिथ्या आहार-विहार से दूषित दोष भी कारणरूप से अवश्य दिखाई पड़ते हैं अतः पूर्वोक्त .व्याधियाँ दोषज कहलाती हैं। अथ कर्मदोषोद्भवान् व्याधीनाह- स्वल्पदोषा गरीयांसस्ते ज्ञेयाः कर्मदोषजाः ॥२॥ कर्म तथा दोष दोनों से उत्पन्न व्याधि- 'जो व्याधियाँ स्वल्प दूषित वातादि दोषों से उत्पन्न होने पर भी अधिक बढ़ जायें, उन्हें 'कर्मदोषज' समझना चाहिये ॥२॥ ❖ अत्र कारणं दुष्कर्म प्रबलं यतो दोषल्पत्वेऽपि व्याधेर्गरीयस्त्वं तत्कर्मक्षयादेव क्षीणं भवति। दोषाः स्वल्पा अपि निदानत्वेनोक्ता दृश्यन्त एवेति दोषाणां कारणतां मन्यत इति कर्मदोषोद्भवाः ॥३॥ पूर्वोक्त 'कर्मदोषज' व्याधियों में प्राक्तन दुष्कर्म ही प्रबल कारण होते हैं क्योंकि दोषों की दुष्टता में कमी होने पर भी व्याधियों की भयङ्करता बनी रहती है और भोग के द्वारा कर्मक्षय होने से ही क्षीण होती है और दोषों की स्वल्पता होने पर भी वे उत्पन्न होने में निदान (कारण) रूप से दिखलाई पड़ते हैं। अतः वे (दोष) भी कारण माने जाते हैं। इस भाँति से ये रोग 'कर्मदोषज' कहलाते हैं ॥३॥ अथ रोगक्षयहेतूनाह- कर्मक्षयात्कर्मकृता दोषजाः स्वस्वभेषजैः। कर्मदोषोद्भवा यान्ति कर्मदोषक्षयात् क्षयम् ॥४॥ कर्मजादि रोगों के क्षीण होने के कारण-भोग के द्वारा प्राक्तन दुष्कर्मों का क्षय होने से 'कर्मज' व्याधियों का, अपनी-अपनी ओषधियों के अर्थात् जिस दोष की जो ओषधियाँ हैं, उनके सेवन करने से 'दोषज' व्याधियों का एवं भोगों के द्वारा प्राक्तन अशुभ कर्मों तथा ओषधियों के द्वारा दोषों के क्षय होने से 'कर्मदोषज' व्याधियों का क्षय होता है ॥४॥ ❖ दोषजाः स्वस्वभेषजैरिति। दोषजेषु आदिकारणं दुष्कर्म तद्भेषजार्थं द्रव्यक्षयादिजनितदुःखभोगेन कटुतिक्तकषायाद्यहृद्यभक्षणादिजनितदुःखभागेन च क्षयं याति। शेषा दुष्टा हेतवो दोषास्ते स्वस्वभेषजैः क्षयं यान्तीत्यर्थः ॥४॥ 'दोषजाः स्वस्वभेषजैः' इसका तात्पर्य यह है कि-दोषज व्याधियों में भी प्रधान कारण तो प्राक्तन दुष्कर्म ही है अतः वह (दुष्कर्म) औषध तैयार करने में जो धन का क्षय होने से दुःख होता है उसी का भोग करने के द्वारा एवं कटु- तिक्त तथा कषायादि रसों से युक्त होने से अप्रिय औषधों के भक्षण आदि से उत्पन्न हुये दुःख का भोग करने के द्वारा नष्ट होता है और इसके अतिरिक्त जो अवशिष्ट कारण वातादि दुष्ट दोष हैं, वे अपने-अपने औषधों के सेवन के द्वारा क्षीण होते हैं ॥४॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १६५ अथ साध्यादिभेदेन त्रिविधान् रोगानाह- साध्या याप्या असाध्याश्च व्याधयस्त्रिविधाः स्मृताः । सुखसाध्यः कष्टसाध्यो द्विविधः साध्य उच्यते ॥५॥ साध्यादि भेद से तीन प्रकार के रोग—साध्य, याप्य और असाध्य भेद से रोग तीन प्रकार के होते हैं उनमें ‘साध्य’ भी दो प्रकार का होता है—सुखसाध्य और कष्टसाध्य ॥५॥ अथ याप्यलक्षणमाह- यापनीयं तु तं विद्यात्क्रिया धारयते हि यम् । क्रियायां तु निवृत्तायां सद्यो यश्च विनश्यति ।। प्राप्ता क्रिया धारयति सुखिनं याप्यमातुरम् । प्रपतिष्यदिवागारं स्तम्भो यत्नेन योजितः ।।७।। ‘याप्य’ के लक्षण—‘याप्य’ रोग उसे कहते हैं जिस रोग की चिकित्सा करने से रोगी स्वस्थ रहता हो, किन्तु चिकित्सा बन्द कर देने पर रोग बढ़ जाने से रोगी शीघ्र मर जाता हो । जैसे यत्न पूर्वक स्तम्भ खड़ा करने से गिरते हुए मकान खड़ा रहता है वैसे ही याप्य रोगों में उपयुक्त चिकित्सा करने से वह भी रोगी को मरने से बचा कर सुखपूर्वक रखता है ॥६-७॥ अथ साध्ययाप्ययोश्चिकित्साऽऽवश्य कत्वमित्याह- साध्या याप्यत्वमायान्ति याप्यश्चाध्यतां तथा । घ्नन्ति प्राणानसाध्यास्तु नराणामक्रियावताम् ।।८।। साध्य-याप्य रोगों से युक्त रोगी की आवश्यक किचित्सा—जिनकी चिकित्सा नहीं हो रही है ऐसे जो रोगी हैं, उनके जो साध्य रोग हैं वे वाप्य के रूप में हो जाते हैं और जो याप्य रोग हैं, वे असाध्य के रूप में परिणत हो कर प्राणों को नष्ट कर देते हैं अतः इन सबों की किचित्सा करना अत्यावश्यक है ॥८॥ अक्रियावतां=चिकित्सारहितानाम् ।।८।। ‘अक्रियावताम्’ का ‘चिकित्सा से रहित रोगी के’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥८॥ अथोपद्रवस्य लक्षणमाह- रोगारम्भकदोषस्य प्रकोप दुपजायते । योऽन्यो विकारः स बुधैरुपद्रव इहोदितः ।।९।। उपद्रव के लक्षण—कुपथ्यवश रोगों के उत्पन्न करने वाले दोषों के अत्यन्त कुपित होने से जो रोग के अतिरिक्त दूसरा विकार उत्पन्न हो जाता है, उसे ‘उपद्रव’ कहते हैं ॥९॥ अथारिष्टस्य लक्षणमाह- रोगिणो मरणं यस्मादवश्यम्भावि लक्ष्यते । तल्लक्षणमरिष्टं स्याद्रिष्टं चापि तदुच्यते ।।१०।। अरिष्ट के लक्षण—जिस लक्षण के प्रकट होने से ‘रोगी अवश्य मर जायगा’ ऐसा मालूम पड़े उसे ‘अरिष्ट’ तथा ‘रिष्ट’ भी कहते हैं ॥१०॥ अथ चिकित्साया लक्षणमाह- या क्रिया व्याधिहरणी सा चिकित्सा निगद्यते । दोषधातुमलानां या साम्यकृत्सैव रोगहृत् ।।११।। चिकित्सा के लक्षण—जिस क्रिया के द्वारा व्याधि का नाश हो अर्थात् जो क्रिया दोष, धातु तथा मल, इन सबों को सम भाव में रखती हुई रोगों को हरण करनेवाली हो, उसी को ‘चिकित्सा’ कहते हैं ॥११॥ ❖ क्रियाऽत्र कर्म । व्याधिर्हन्यतेऽनयेति व्याधिहरणी । करणाधिकरणयोश्चेति सूत्रेण करणार्थेल्युट् ।।११।।

१६८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे चिकित्सक को चाहिये कि वह पहले रोग का परिज्ञान करने में अर्थात् रोग की अवस्था कैसी है इसके समझने में आदि से लेकर अन्त तक प्रयत्न करे, तत्पश्चात् ओषधों का जैसा विधान हो उसके अनुकूल 'चिकित्सा' करे ॥२१॥ चिकित्सितमित्यत्र भावे क्तः ॥२१॥ 'चिकित्सितम्' इस प्रयोग में भाव में क्त प्रत्यय होने से इसका 'चिकित्सा' अर्थ होता है ॥२१॥ विकारनामाकुशलो न जिह्रीयात्कदाचन । न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः ॥२१॥ यदि कोई वैद्य ऐसा हो कि वह सभी विकार अर्थात् रोगों का नाम न बतला सके तो उसे कभी लजाना नहीं चाहिये क्योंकि सम्पूर्ण रोगों की स्थिति नाम के द्वारा ही नियत नहीं है ॥२२॥ ❖ न जिह्रीयान्न लज्जेत् । ध्रुवा=नियता ॥२२॥ 'न जिह्रीयात्' का 'लजाना नहीं चाहिये' तथा ध्रुवा' पद का 'नियत' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२२॥ नास्ति रोगो बिना दोषैर्यस्मात्तस्माच्चिकित्सकः । अनुक्तमपि दोषाणां लिङ्गैर्व्याधिमुपाचरेत् ॥२३॥ बिना दोषों के कोई रोग नहीं होता अतः चिकित्सक को चाहिये कि जिन रोगों के नामों का शास्त्रों में उल्लेख न हो तो भी दोषों के लक्षणों से ही उन रोगों की चिकित्सा करे ॥२३॥ ये न कुर्वन्त्यसाध्यानां चिकित्सां ते भिषग्वराः । अतो वैद्यैः श्रमः कार्यः साध्यासाध्यपरीक्षणे ॥२४॥ जो वैद्य असाध्य रोगों की चिकित्सा नहीं करते वे परम चतुर कहलाते हैं अतः रोग साध्य अथवा असाध्य है, इसकी परीक्षा करने में वैद्यों को अवश्य श्रम करना चाहिये ॥२४॥ (१रोगज्ञानोपाया अग्रे वक्ष्यन्ते ॥२४॥) रोगज्ञान का उपाय आगे (चिकित्साप्रकरण में) कहेंगे ॥२४॥ अथ चिकित्सापद्धतिमाह- शीते शीतप्रतीकारमुष्णे तूष्णनिवारणम् । कृत्वा कुर्यात्क्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत् ॥२५॥ चिकित्सा करने की पद्धति—शीत से उत्पन्न रोग में शीत का और गर्मी से उत्पन्न रोग में गर्मी का प्रतीकार कर जो उपयुक्त चिकित्सा हो उसे करना चाहिये । किन्तु चिकित्सा का समय उपस्थित होने पर उसे नहीं छोड़ना चाहिये ॥२५॥ अप्राप्तेवा क्रियाकाले प्राप्तेवा न क्रिया कृता । क्रियाहीनाऽतिरिक्ता च साध्येष्वापि न सिध्यति ।।२६।। चिकित्सा का समय होने के पूर्व ही चिकित्सा करने पर अथवा चिकित्सा का समय होने पर चिकित्सा न करके बाद में चिकित्सा करने पर किंवा हीन चिकित्सा अर्थात् प्रबल रोग में स्वल्प चिकित्सा अथवा अतिरिक्त चिकित्सा अर्थात् स्वल्प रोग में प्रबल चिकित्सा करने पर जो साध्य रोग हैं, उनमें भी लाभ नहीं होता अर्थात् रोग से आराम नहीं होता है ॥२६॥ ❖ अयमर्थः-काले=चिकित्साऽवसरे । अप्राप्ते=अनागते । या क्रिया=चिकित्सा । यथा ज्वरे जीर्णतामप्राप्ते तरुण एव कषायदानक्रिया न सिद्ध्यति । या च क्रिया चिकित्साऽवसरे प्राप्ते न कृता । अर्थात्पश्चात्कृता । यथा दाहे कथञ्चिच्छान्ते पश्चाच्छीतानुलेपनादि क्रिया तथा हीनाऽतिरिक्ता च क्रिया साध्येष्वापि न सिध्यति ।। २६ ।। यहाँ विशेष-विशेष पदों का यह अर्थ है कि—'काल' अर्थात् चिकित्सा का अवसर, अप्राप्त अर्थात् 'नहीं प्राप्त होने पर' जो 'क्रिया' (चिकित्सा) है, वह साध्य रोगों में भी नहीं काम देती, जैसे कि यदि ज्वर जीर्ण न हुआ हो १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १६९ अर्थात् तरुण (नवीन) ही हो तो उस समय काढ़ा आदि देने के द्वारा चिकित्सा करना लाभदायक नहीं होता और जो चिकित्सा काल अर्थात् चिकित्सा का उपयुक्त समय प्राप्त होने पर नहीं की जाती अर्थात् पीछे (चिकित्सा का समय बीत जाने पर) की जाती है वह निष्फल होती है । जैसे कि किसी प्रकार से दाह के शान्त हो जाने पर पीछे शीतल लेपादि द्वारा चिकित्सा करना व्यर्थ होता है । उसी प्रकार रोग की अपेक्षा हीन चिकित्सा तथा अतिरिक्त (रोग की अपेक्षा अधिक) चिकित्सा भी साध्य रोगों में सिद्ध (लाभदायक) नहीं होती ॥२६॥ अथातिरिक्तां हीनां च क्रियां वर्जयन्नाह- विकारेऽल्पे महत्कर्म क्रिया लघ्वी गरीयसी । द्वयमेतदकौशल्यं कौशल्यं युक्तकर्मता ॥२७॥ क्रियायास्तु गुणालाभे क्रियामन्यां प्रयोजयेत् । पूर्वस्यां शान्तवेगायां न क्रियासङ्करो हितः ॥२८॥ अतिरिक्त तथा हीन चिकित्सा का निषेध—स्वल्प रोग में उग्र ओषधियों द्वारा बड़ी चिकित्सा करना तथा प्रबल रोग में मामूली ओषधियों द्वारा साधारण चिकित्सा करना दोनों ही चिकित्सक निपुण नहीं हैं इस बात के द्योतक होते हैं । अतएव चिकित्सक की निपुणता इसी में हैं कि वह रोग के अनुकूल साधारण या विशेष चिकित्सा करे । रोग की शान्ति के लिये जो चिकित्सा की जाय, उससे यदि लाभ न होता हो तो दूसरी चिकित्सा करनी चाहिये किन्तु वह भी उसी अवस्था में जब कि पूर्व की हुई चिकित्सा का वेग शान्त हो जाय, क्योंकि चिकित्साओं का मेल होना हितकारक नहीं होता ॥२७-२८॥ भिन्नरूपाभिस्तु क्रियाभिः सांकर्यमपि न दोषाय । यत आह- क्रियाभिस्तुल्यरूपार्भिर्न क्रियासङ्करो हितः । ताभिस्तु भिन्नरूपाभिः साङ्कर्यं नैव दुष्यतिं ।। परस्पर भिन्न स्वरूपवाली चिकित्साओं का एकत्र विधान—परस्पर समान स्वरूपवाली चिकित्साओं के द्वारा जो चिकित्सा का मेल होता है, वही हितकर नहीं होता किन्तु यदि वे ही भिन्न स्वरूप वाली होवें तो उनका मेल होना हितकारी ही होता है ॥२९॥ ❖ अत एवोक्तम्- लङ्घनं बालुकास्वेदो नस्यं निष्ठीवनं तथा । अवलेहोऽञ्जनं चापि प्राक् प्रयोज्यं त्रिदोषजे ॥४॥ अत एव कहा है कि—लङ्घन (उपवास कराना), बालुकास्वेद (बालू के द्वारा पसीना निकलवाना), नस्य (ओषधियों के रस का नस लेना), निष्ठीवन (ओषधियों के द्वारा मुख से लार गिरवाना), अवलेह (ओषधियों की चटनी बना कर चटाना) और अञ्जन (आँखों में ओषधियों का अञ्जन लगाना), इन सब क्रियाओं का त्रिदोषज (सान्निपातिक) ज्वर में सबसे पहले प्रयोग करना चाहिये ॥४॥२९॥ ❖ ज्वर इति शेषः ।।४।।२९।। यहाँ श्लोक में 'त्रिदोषजे' के आगे यद्यपि 'ज्वरे' ऐसा नहीं कहा गया है तथापि 'त्रिदोषज ज्वर में' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥४॥२९॥ न चैकान्तेन निर्दिष्टे शास्त्रे निविशते बुधः । स्वयमप्यत्र भिषजा तर्कणीयं चिकित्सता ॥३०॥ जो आयुर्वेद शास्त्र के विद्वान् चिकित्सक हैं वे केवल शास्त्र में कही हुई चिकित्साविधि के ऊपर निर्भर नहीं रहते हैं अतः वैद्य को चाहिये कि चिकित्सा करते समय स्वयं भी चिकित्सा के विषय में विचार करें ॥३०॥ यत आह- उत्पद्यते च साऽवस्था दोषकालबलं प्रति । यस्यां कार्यमकार्यं स्यात्कर्म कार्यं विवर्जितम् ॥३१॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

१७० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे क्योंकि दोष, काल तथा बल के अनुसार कभी-कभी ऐसी भी अवस्था उपस्थित हो जाती है कि उस समय शास्त्र में कही हुई विधियाँ नहीं वर्ती जातीं किन्तु वर्जित विधि से ही काम ली जाती है ॥ विवर्जितं कर्म कर्तव्यं भवतीत्यर्थः ।।३१।। ‘विवर्जितं कर्म कर्तव्यं भवति’ अर्थात् वर्जित की हुई ‘विधियाँ’ की जाती हैं’ ।।३१।। अथ चिकित्सायाः फलमाह- क्वचिदर्थः क्वचिन्मैत्री क्वचिद्धर्मः क्वचिद्यशः । कर्माभ्यासः क्वचिच्चेति चिकित्सा नास्ति निष्फला ।।३२।। आयुर्वेदोदितां युक्तिं कुर्वाणाश्च हिताय¹ ये । पुण्यायुर्वृद्धिसंयुक्ता नीरोगाश्च भवन्ति ते ।।३३।। चिकित्सा करने से फल—चिकित्सा करने से कहीं धन, कहीं मित्रता, कहीं धर्म, कहीं यश और कहीं चिकित्सा करने के अभ्यास का ही लाभ होता है। अत एव चिकित्सा कभी निष्फल नहीं होती। जो चिकित्सक केवल रोगों की हित कामना से ही आयुर्वेदशास्त्र में कही हुई युक्तियों से चिकित्सा करते हैं उनके पुण्य तथा आयु की वृद्धि होती है और वे नीरोग भी होते हैं ।।३२/३३।। अथ धनिभ्योऽर्थग्रहणं वैद्यानां समुचितमित्याह- नैव कुर्वीत लोभेन चिकित्सापुण्यविक्रयम् । ईश्वराणां वसुमतां लिप्सेतार्थं तु वृत्तये ।।३४।। धनियों से धन लेकर चिकित्सा का विधान—लोभ से धन लेकर चिकित्सा करने से उत्पन्न हुये महान् पुण्य का विक्रय न करे, किन्तु यदि जीवन निर्वाह के लिये धन लेना पड़े तो धनवान् तथा सामर्थ्यशाली से धन ग्रहण करने की इच्छा करे किन्तु गरीबों से धन न लेवे ।।३४।। अथ निःशुल्ककारितचिकित्साफलमाह- चिकित्सितं शरीरं यो न निष्क्रीणाति दुर्मतिः । स यत्करोति सुकृतं सर्वं तद्भिषगश्नुते ।।३५।। निःशुल्क चिकित्सा कराने में दोष—जो मूढ़ रोगी आरोग्य लाभ करने के पश्चात् चिकित्सक को धनादि नहीं देता वह जो कुछ पुण्य करता है, सब वैद्य को मिल जाता है । (अतः वैद्य को शक्त्यनुसार अवश्य कुछ देकर चिकित्सा करानी चाहिये) ।।३५।। अथ वैद्यवृत्तिः सर्वत्र सुसिद्धेत्याह- न देशो मनुजैर्हीनो न मनुष्या निरामयाः । ततः सर्वत्र वैद्यानां सुसिद्धा एव वृत्तयः ।।३६।। वैद्य की चिकित्सा वृद्धि का प्रसार—कोई देश मनुष्यों से हीन नहीं है और कोई मनुष्य रोग से हीन नहीं है अतः सर्वत्र वैद्यों की वृत्ति (आजीविका) सर्वथा सिद्ध (बनी बनाई) है ।।३६।। अथ चिकित्साया अङ्गान्याह- रोगी दूतो भिषग्दीर्घमायुर्द्रव्यं सुसेवकः । सदौषधं चिकित्साया इत्यङ्गानि बुधा जगुः ।।३७।। चिकित्सा के अङ्ग—(१) रोगी, (२) दूत, (३) वैद्य, (४) दीर्घ आयु, (५) द्रव्य, (६) सुन्दर सेवक और (७) उत्तम औषध इन सबों को चिकित्सा का अङ्ग कहा है अर्थात् बिना इनके चिकित्सा नहीं हो सकती ।।३७।।


१. 'विहिताश्चै'ति पाठा. ।

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १७१ तत्र रोगिणो लक्षणमाह- रोगो यस्यास्ति रोगी स सचिकित्स्यस्तु यादृशः । यादृशश्चाचिकित्स्योऽपि वक्ष्यमाणो निशम्यताम् ।।३८।। रोगी के लक्षण—जिसे रोग हो वह रोगी कहलाता है। वह रोगी जिस प्रकार चिकित्सा करने के योग्य अथवा अयोग्य होता है उसके लक्षण आगे कह रहे हैं ।।३८।। तत्र चिकित्स्यस्य लक्षणमाह- निजप्रकृतिवर्णाभ्यां युक्तःसत्त्वेन चक्षुषा । चिकित्स्यो भिषजां रोगी वैद्यभक्तो जितेन्द्रियः ।।३९।। चिकित्स्य रोगी के लक्षण—वैद्यों के लिये वही रोगी चिकित्सा करने योग्य है जिसकी प्रकृति तथा शरीर का रङ्ग बदला न हो एवं सत्त्व से युक्त तथा देखने की शक्ति जिसकी बनी हो तथा वैद्य में भक्ति रखनेवाला और जितेन्द्रिय हो ।।३९।। ❖ सत्त्वं=व्यसनाभ्युदयक्रियादिष्वविह्वलत्ताकरं, तेन युक्तः । चक्षुषा=चक्षुरुपलक्षितेन, ततोऽन्येनापीन्द्रियेण । चिकित्स्यः=रोगान्मोक्षयितव्यः ।।३९।। सत्त्व से युक्त अर्थात् विपत्ति तथा अभ्युदय (तरक्की) होने पर विह्वल न होना 'सत्त्व' कहलाता है उससे युक्त तथा 'चक्षुरिन्द्रिय' यह उपलक्षण मात्र है अतः चक्षुरिन्द्रिय के साथ-साथ जिसकी और भी इन्द्रियाँ नाक, कान आदि अपने-अपने विषयों के ग्रहण करने योग्य बनी हों एवं 'चिकित्स्य' पद से 'रोग से मुक्त करने योग्य अर्थात् चिकित्सा करने के योग्य' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३९।। अन्यच्च- आयुष्मान्सत्त्ववान्साध्यो द्रव्यवान्मित्रवानपि । चिकित्स्यो भिषजां रोगी वैद्यवाक्यकृदास्तिकः ।।४०।। और भी कहा है कि वैद्य को उसी रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये—जिसकी आयु शेष हो अर्थात् जो आयुष्मान् हो और सत्त्ववान्, साध्य रोग से युक्त, द्रव्यवान्, मित्रवान् (हितैषी), वैद्य के कथनानुसार कार्य करनेवाला और आस्तिक हो ।।४०।। ❖ आयुर्वेदोऽस्तीति मतिर्यस्य स आस्तिकः ।।४०।। यहाँ 'आस्तिक' से 'आयुर्वेद शास्त्र है ऐसी मति जिसकी हो, वह आस्तिक कहलाता है' ।।४०।। अथाचिकित्स्यस्य लक्षणमाह- चण्डः साहसिको भीरुः कृतघ्नो व्यग्र एव च । शोकाकुलो मुमूर्षुश्च विहीनःकरणैश्च यः ।।४१।। वैरी वैद्यविदग्धश्च श्रद्धाहीनश्च शङ्कितः । भिषजामविधेयः स्युर्नोपक्रम्या भिषग्विधाः ।।४२।। अचिकित्स्य रोगी के लक्षण—अत्यन्त क्रोधी, बिना विचार किये कार्य करने वाला, भीरु, कृतघ्न, व्यग्र, शोक से आकुल, मृत्यु की इच्छा रखने वाला, इन्द्रियों से विहीन, वैरी, वैद्यों के साथ धूर्तता करनेवाला तथा वैद्यों के वचनों पर न चलनेवाला एवं अपने को वैद्यों के समान माननेवाला रोगी चिकित्सा करने के योग्य नहीं होता है ।।४१-४२।। ❖ चण्डोऽत्यन्तक्रोधशीलः । साहसिकः=अविचार्यकारी । भीरुर्भयशीलः । कृतघ्नो=वैद्यकृतोपकार- लोपकः । व्यग्रः=व्याकुलः । विहीनः करणैश्च यः=१नेत्रादीन्द्रियशक्तिरहितः ।। वैरी न चिकित्स्यः १. 'निजेन्द्रिये'ति पाठः ।

१७२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कदाचिद्रोगोद्रेकेऽपवादभयात् । वैद्यविदग्धो=वैद्यधूर्त्तः । शंकितो=वैद्यविश्वासरहितः । भिषजाम्- विधेयाः=वैद्यवचनाविधायिनः । भिषग्विधाः=वैद्यतुल्याः । एते न उपक्रम्याः=न चिकित्स्याः । तथा च सुश्रुतः- स न सिद्ध्यति वैद्यस्तु गृहे यस्य न पूज्यते ।।४१'-४२।। यहाँ 'चण्ड' से 'अत्यन्त क्रोध करने का जिसका स्वभाव हो;' 'साहसिकः' से 'बिना विचार किये कार्य करने वाला' । 'भीरुः' से 'डरपोक' । 'कृतघ्नः' से 'वैद्य के किये हुये उपकार को न मानने वाला' । 'व्यग्रः' से 'व्याकुल चित्त वाला' और 'विहीनः करणैश्च यः' से 'जो नेत्रादि इन्द्रियों की शक्ति से रहित हो' यह अर्थ समझना चाहिये । और 'वैरी' का नाम इसलिये लिया गया है, कि यदि उसकी चिकित्सा की जाय और बाद में कदाचित् उसका रोग बढ़ जाय तो वह अपवाद लगावेगा इस भय से वह अचिकित्स्य है । 'वैद्यविदग्धः' से 'वैद्यों के साथ धूर्त्तता करने वाला' । 'शङ्कितः' से 'वैद्य के ऊपर विश्वास नहीं रखते वाला' । 'भिषजामविधेयाः' से 'वैद्यों के वचन को न करने वाला' । 'भिषग्विधाः' से 'अपने को वैद्यों के समान मानने वाला' । 'एते न उपक्रम्याः' अर्थात् 'ये चिकित्सा करने के योग्य नहीं होते हैं। यह अर्थ समझना चाहिये । इसी विषय में 'सुश्रुत' कहते हैं कि—'वह रोगी आरोग्य लाभ नहीं कर सकता जिसके गृह में वैद्य का सम्मान नहीं होता है' ।।४१-४२।। अथाचिकित्स्यानां चिकित्सानिषेधमाह- एतानुपाचरन् वैद्यो बहून् दोषानवाप्नुयात् ।।४३।। अचिकित्स्य रोगियों की चिकित्सा का निषेध—पूर्वोक्त अचिकित्स्य रोगियों की यदि कोई वैद्य चिकित्सा करता है तो वह अनेक दोषों को प्राप्त करता है ।।४३।। अथ दूतस्य लक्षणमाह- यश्चिकित्सकमानेतुं याति दूतः स कथ्यते । स च यादृक् समुचितस्तादृगत्र निगद्यते ।।४४।। दूताः सुजातयोऽव्यङ्गाः पटवो निर्मलाम्बराः । सुखिनोऽश्ववृषारूढाः शुभ्रपुष्पफलैर्युताः ।।४५।। सजातयः सुचेष्टाश्च सजीवदिशि सङ्गताः । भिषजं समये प्राप्ता रोगिणः सुखहेतवे ।।४६।। दूत के लक्षण—जो चिकित्सक को ले आने के लिये जाता है उसे दूत कहते हैं, वह जैसा उचित होता है वैसा कहते हैं—जो दूत होकर वैद्य के पास जाय वह अच्छी जाति का हो एवं किसी अङ्ग से हीन न हो तथा चतुर, स्वच्छ वस्त्र पहने हुये, सुखी (प्रसन्न चित्त), घोड़ा या बैलगाड़ी पर चढ़ा हुआ सफेद पुष्प एवं फल से युक्त सजातिक, अच्छी चेष्टा से युक्त, वैद्य के पास जाकर सजीव अर्थात् नासिका के जिस भाग से श्वास चलता हो उसी भाग में बैठने वाला और वैद्य के मिलने का जो समय हो उसी में उसके घर पहुँचने वाला इस प्रकार के जो दूत होते हैं वे ही रोगी के सुख के हेतु (सुख पहुँचाने वाले) होते हैं ।।४४-४६।। सजातयः=रोगिसमानजातयः । यस्यां प्राणमरुद्धाति सा नाडी जीवसंज्ञिता ।।५।।४६।। यहाँ 'सजातयः' से 'रोगी के समान जातिवाले' और 'सजीवदिशि सङ्गताः' पद में स्थित 'जीव' पद से यह अर्थ समझना चाहिये कि 'जिस नासिका में प्राणवायु अर्थात् श्वास बहता हो वह नाड़ी जीवसंज्ञक कहलाती है' और इससे यह भी समझना चाहिये कि 'यदि दाहिना श्वास चलता हो तो दाहिनी ओर बायाँ श्वास चलता हो तो बायीं ओर वैद्य के पास जाकर बैठे' ।।५।।४६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

-shaped on the left, connector, vertical stem: that is 100% identical to 'स'! And then 'मग्निम्'! So the printed text in the book LITERALLY says: "प्रदीप्तसमग्निम् ॥४७॥" Wait, or is it: Wait, could it be "प्रदीप्तसद्मग्निम्"? No. Could it be: "प्रदीप्तं समग्निम्"? No, there is no anusvara on 'प्त'. It is printed as: "प्रदीप्तसमग्निम् ॥४७॥"! Wait, whether it was intended as "प्रदीप्तमग्निम्" (with an accidental extra 'स' by the typesetter) or "प्रदीप्तसमग्निम्", the user prompt specifically instructs: "Transcribe the image ... line by line into pure, clean Markdown in Devanagari." Wait, let's look at the instruction: "Transcribe the ... page line by line into pure, clean Markdown in Devanagari. Include all Sanskrit shlokas, yogas, pharmaceutical formulations, bhasma preparations, disease descriptions, Hindi translation, and footnotes. Prefix each line with line marker like , ." So our goal is to accurately transcribe what is printed on the page! Let's check every single line carefully.

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Page Header: अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १७३ Wait, is it "षष्ठम" or

॥६॥

Line 29: तेन कालेन संयुक्तः संहाराय नियुक्तः सोऽवश्यम्भावी । शेषाः शतं मृत्यवः, आगन्तवः=आगन्तु-

Line 30: रूपहेतुजन्मानः कार्यकारणयोरभेदोपचारात् ।

Line 31: इस प्रकार काल संयुक्त जो मृत्यु है वह सम्पूर्ण जगत् के संहार करने के लिये नियुक्त है अत एव वह अवश्य

Line 32: होने वाली मृत्यु कहलाती है। शेष जो १०० प्रकार की मृत्यु हैं ये 'आगन्तुक' कहलाती हैं अर्थात् 'आगन्तुक' रूप कारणों

Line 33 (Footnote): १. 'व्यथाया' इति पा. ।

Everything is accounted for accurately.१७४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ वैद्यस्य कर्माह- व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं वेदनायाश्च निग्रहः। एतद्वैद्यस्य वैद्यत्वं न वैद्यः प्रभुरायुषः ॥५३॥ वैद्य का कर्त्तव्य—रोग का यथार्थरूप से समझना तथा रोगी के कष्ट को दूर करना ये ही वस्तुतः वैद्य के मुख्य कर्म हैं, आयु का प्रभु तो वैद्य नहीं (भगवान् होता) है अर्थात् रोगी के मृत्यु को हटाना वैद्य का कर्म नहीं है ॥५३॥

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से उत्पन्न होने वाली होती हैं अत एव 'आगन्तुक' कहलाती हैं। यहाँ 'आगन्तुक' से उत्पन्न होकर भी जो 'आगन्तुक' ही कहलाती है उसका कारण यह है कि कार्य और कारण का दार्शनिकों ने अभेद माना है अतः लाक्षणिक प्रयोग समझना चाहिये ॥ ❖ आगन्तवो हेतवो यथा-विषभक्षणमजीर्णमत्यन्तभोजनं च, दुर्देशजलपानम्, तथाऽतिबलवैरि- व्याघ्रवनमहिषमत्तमातङ्गादिभिर्युद्धम्, दन्दशूकेन क्रीडनम्, अत्युच्चवृक्षाग्रारोहणम्, बाहुभ्यां महातरङ्गिणीतरणम्, एकाकिनो रात्रौ दुर्गे मार्गे गमनमित्यादि ।।५।। आगन्तुक हेतु—विष भक्षण, अजीर्ण और अत्यन्त भोजन, दुष्ट देशों का (जहाँ का पानी लगता हो ऐसे देशों का) जल पीना तथा अत्यन्त बलवान् वैरी, व्याघ्र, जङ्गली भैंसा और मतवाला हाथी आदि के साथ युद्ध करना, विषधर सर्पादिकों के साथ खेल करना, अत्यन्त ऊँचे वृक्षों के अग्र

१७.६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सार्थ युद्ध करना इत्यादि हैं इन सब कारणों से उत्पन्न होनेवाली जो सौ प्रकार की मृत्यु हैं उनसे और वैद्य तथा पुरोहित ये दोनों कैसे सौ प्रकार की मृत्युओं को हटाने में समर्थ हो सकते हैं? इस शङ्का की निवृत्ति करने के लिये कहते हैं- क्योंकि वे दोनों रसमन्त्र विशारद हैं अर्थात् वैद्य रसविशारद है और पुरोहित मन्त्रविशारद है उसमें प्रथम वैद्य दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या में कहे हुए आहार तथा विहार कराने से वात, पित्त, कफ इन धातुओं को तथा मल को समान भाव से रखकर रक्षा करे तदनन्तर वह रसविशारद अर्थात् रस का जानने वाला है अत एव रस जो मृत्युञ्जयादि हैं उनके द्वारा जो निषिद्ध आहार तथा बिहार के करने से दूषित हुए दोषों से उत्पन्न होने वाले मृत्यु के कारण स्वरूप विकार (रोग) हैं उनको दूर करे और मन्त्री अर्थात् पुरोहित सद्बुद्धि (अच्छी सलाह) देने के द्वारा मृत्यु के कारण जो निषिद्ध विहार बलवान् शत्रुओं के साथ लड़ना आदि है उनसे राजा को दूर रखे। इससे आगन्तुक मृत्यु निवारण करने के योग्य ही होती है न कि अवश्यम्भावी (नहीं निवारण करने के योग्य) होती है ॥८।५३॥ अथायुर्विचारमाह- भिषगादौ परीक्षेत रुग्णस्यायुः प्रयत्नतः। तत आयुषि विस्तीर्णे चिकित्सा सफला भवेत् ॥५४॥ रोगी के प्रथम आयु का विचार-वैद्य प्रथम यत्नपूर्वक रोगी के आयु की परीक्षा करे क्योंकि आयु रहने पर ही चिकित्सा सफल होती है ॥५४॥ अथ दीर्घायुषो लक्षणान्याह- सौम्या दृष्टिर्भवेद्यस्य श्रोत्रं वक्त्रं तथैव च। स्वादु गन्धं विजानाति स साध्यो नात्र संशयः ॥५५॥ पाणिपादौ च यस्योष्णौ दाहः स्वल्पतरो भवेत्। जिह्वा तु कोमला यस्य स रोगी न विनश्यति ॥५६॥ स्वेदहीनो ज्वरो यस्य श्वासो नासिकया चरेत्। कण्ठश्च कफहीनः स्यात्स रोगी जीवति ध्रुवम् ॥५७॥ यस्य निद्रा सुखेन स्याच्छरीरं द्युतिमद्भवेत्। इन्द्रियाणि प्रसन्नानि स रोगी नैव नश्यति ॥५८॥ दीर्घायु रोगी के लक्षण-जिस रोगी के आँख, कान तथा मुख सौम्य (विकृति भाव को न प्राप्त) हों तथा जो रस का स्वाद तथा गन्ध की भलाई-बुराई को भली भाँति जानता हो वह रोगी निःसंशय साध्य होता है अर्थात् चिकित्सा करने से निश्चय आरोग्य लाभ करता है। जिस रोगी के हाथ पैर गर्म हों, दाह बहुत थोड़ा होता हो, जिह्वा कोमल हो, स्वेद (पसीना) से रहित ज्वर हो, नासिका से श्वास चलता हो, गले में कफ न हो, सुखपूर्वक निद्रा आती हो, शरीर में कान्ति हो और इन्द्रियाँ प्रसन्न हों वह रोगी नहीं मरता है ॥५५-५८॥ अथ स्वल्पायुषो लक्षणान्याह- शरीरशीलयोर्यस्य प्रकृतेर्विकृतिर्भवेत्। तदरिष्टं समासेन व्यासतः शृणु निबोध मे ॥५९॥ शृणोति विविधाञ्छब्दान्विपरीताञ्छृणोति च। यो न शृणोति चाकस्मात्तं वदन्ति गतायुषम् ॥६०॥ स्वल्प आयुवाले रोगियों के लक्षण-जिस रोगी के स्वाभाविक शरीर तथा स्वभाव में अन्तर पड़ गया हो, वह उसके लिये अरिष्ट के लक्षण होता है, यह संक्षेप से समझना चाहिये। विस्तृत रूप से अरिष्ट का कारण यह है कि जो रोगी शब्द न होने पर भी अनेक प्रकार के शब्दों को बराबर सुनता हो वा विपरीत शब्दों को सुनता हो अथवा अकस्मात् नहीं सुनने लगता हो उसे गतायु कहते हैं ॥५९-६०॥ यस्तूष्णमिव गृह्णाति शीतमुष्णं च शीतवत्। उष्णागात्रोऽतिमात्रं यो भृशं शीतेन कम्पते ॥६१॥ जो शीतल वस्तु को उष्ण वस्तु की भाँति और उष्ण वस्तु को शीतल वस्तु की भाँति ग्रहण करता हो तथा जिसका शरीर वस्त्रादि के ओढ़ने से गर्म होते हुये भी शीत से अत्यन्त काँपता हो उसे भी गतायु कहते हैं ॥६१॥

❖ तमपि गतायुषं वदन्तीत्यन्वयः ।। ६१ ।। यहाँ 'उसे भी लोग गतायु कहते हैं' 'यह अन्वय ऊपर के ६० श्लोक से लाकर किया जाता है। प्रहारं नैव जानाति योऽङ्गच्छेदमथापि¹ वा। पांशुनेवावकीर्णानि यश्च गात्राणि मन्यते ।। ६२ ।। वर्णान्यता वा राज्यो वा यस्य गात्रे भवन्ति हि। स्नातानुलिप्तं यं चापि भजन्ते नीलमाक्षिकाः² ।। ६३ ।। विपरीतेन गृह्णाति रसान्यश्चोपयोजितान्। यो वा रसान्न संवेत्ति³ तं गतासुं प्रचक्षते ।। ६४ ।। जो प्रहार नहीं जानता अर्थात् मारने पर जिसे चोट नहीं मालूम पड़ती या अङ्गों के काटने पर भी जिसे कुछ नहीं मालूम पड़ता और जो अपने अङ्गों को धूलि से भरा हुआ समझता है। एवं जिसके शरीर का वर्णभिन्न प्रकार का या उसमें बहुत सी रेखायें हो जायें और स्नान और चन्दनादि का अनुलेपन कर चुकने पर भी जिसके ऊपर नीली मक्खियाँ आकर बैठने लगें और जो जिस रस का उपयोग करता हो उसे उसके विरुद्ध अर्थात् मधुर को अम्ल और अम्ल को मधुर समझे [L10

१७८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तो उसे गतायु कहते हैं और जो दर्पण, जल वा धूप में अपने प्रतिबिम्ब को न देखता हो अथवा अपने प्रतिबिम्ब या छाया को एक किसी अङ्ग से हीन या विकृति रूपवाली, या कुत्ता, कौवा, कङ्कपक्षी, गिद्ध, प्रेत, यक्ष और राक्षस की अथवा इनसे अन्य किसी प्राणी की छाया के समान देखे तो यदि वह रोगी हो तो उस की मृत्यु निकट होती है और स्वस्थ हो तो उसे शीघ्र रोग होने की संभावना रहती है ॥६७-७२॥ ह्रीश्रियौ नश्यतो यस्य तेन ओजः स्मृतिः प्रभा । अकस्माच्च भजन्ते यं स गतासुरसंशयम् ।।७३।। अकस्मात् जिसकी लज्जा, शोभा, तेज, ओज, स्मरणशक्ति और प्रतिभा ये सब नष्ट हो जायँ या अकस्मात् ये सब प्राप्त हो जावें तो उसे निःसन्देह गतायु समझना चाहिये ॥७३॥ ❖ प्रभा=प्रतिभा ।।७३।। यहाँ 'प्रभा' का 'प्रतिभा' अर्थ समझना चाहिये ।।७३।। यस्याधरोष्ठः पतितः क्षिप्तोश्चोर्ध्वं तथोत्तरः । उभौ वा जाम्बवाभासौ दुर्लभं तस्य जीवितम् ।।७४।। आरक्ता दशना यस्य श्यावा वा स्युः पतन्ति वा । खञ्जनप्रतिभा१ वापि तं गतायुषमादिशेत् ।।७५।। कृष्णा तथाऽनुलिप्ता च जिह्वा शून्या च यस्य वै । कर्कशा वा भवेद्यस्य सोऽचिराद्विजहात्यसून् ।।७६।। जिसका नीचेवाला ओष्ठ नीचे को लटक जाय और ऊपर का ओष्ठ ऊपर की ओर उठ जाय अथवा जामुन के रङ्ग का हो जाय तो उसका जीना दुर्लभ समझना चाहिये और जिसके सब दाँत लाल वर्ण तथा श्याव अर्थात् धूम्र वर्ण के हो जायँ या गिर जायँ या खंजन पक्षी के तुल्य वर्ण के हो जायँ तो उसे गतायु समझना चाहिये और जिसकी जिह्वा काली पड़ जाय या मल से लिपटी हुई तथा रस ग्रहण करने में सुख या कर्कश अर्थात् खुरदरी हो जाय तो वह बहुत शीघ्र प्राणों को छोड़ता है (मर जाता है) ।।७४-७६।। कुटिला स्फुटिता वाऽपि शुष्का वा यस्य नासिका । अवस्फूर्जति भग्ना वा स न जीवति मानवः ।।७७।। जिसकी नाक टेढ़ी, फटी सूखी वा झुकी सी हो या श्वास के वेग से जोर शब्द करती हो तो वह मनुष्य नहीं जीता है ॥७७॥ स्फूर्जति=श्वासवेगेनोच्चैः शब्दं करोतीत्यर्थः ।।७७।। 'स्फूर्जति' का 'श्वास के वेग से जोर शब्द करती हो' यह अर्थ समझना चाहिये ॥७७॥ संक्षिप्ते विषमे स्तब्धे रूक्षे सास्त्रे च लोचने । स्यातां परिश्रुते यस्य स गतायुर्नरो ध्रुवम् ।।७८।। जिसके दोनों नेत्र सङ्कुचित, विषम (छोटे बड़े), पथराये हुये, रूखे, आँसुओं से भरे अथवा आँसू गिरते हुये हों तो निश्चय उस मनुष्य को गतायु समझना चाहिये ॥७८॥ केशाः सीमन्तिनो यस्य संक्षिप्ते विनते भ्रुवौ । लुठन्ति चाक्षिपक्ष्माणि सोऽचिराद्याति मृत्यवे ।।७९।। जिसके बालों में कङ्घी से सँवारने के समान बीच में सीमन्त (माँग) बन जाय एवं दोनों भौंहें सिकुड़ी तथा झुकी हुई हो जायँ या आँखों के ऊपर वे बप्ल (बरौनी) झड़ जायँ तो वह शीघ्र मृत्यु को प्राप्त करता है ॥७९॥ लुठन्ति=पतन्ति ।।७९।। 'लुठन्ति' का 'गिर जायँ' यह अर्थ समझना चाहिये ॥७९॥ १. 'प्रतिमे'

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १७९ नाहरत्यन्नमास्यस्थं न धारयति यः शिरः। एकाग्रदृष्टिर्मूढात्मा सद्यः प्राणान्विमुञ्चति ।।८०।। उत्थाप्यमानो बहुशः संमोहं योऽधिगच्छति। बलवान्दुर्बलो वापि तं पक्वं भिषगादिशेत् ।।८१।। निद्रा निरन्तरं यस्य यो जागर्त्ति च सर्वदा। मुहोद्वा वक्तुकामश्च प्रत्याख्येयः स जानता ।।८२।। जो रोगी मुख में रखे हुए अन्न को नहीं निगल सके या शिर धारण न कर सके अर्थात् जिसका शिर सीधा करने पर भी लटक जाय या जिसकी दृष्टि एकाग्र अर्थात् एक ही लक्ष्य पर स्थिर हो जाय या जिसका मन भ्रान्त हो गया हो और जो बारंबार उठाने पर भी मोह को प्राप्त हो जाय ऐसा रोगी चाहे बलवान् हो अथवा दुर्बल हो किन्तु उसे वैद्य गण मरने के विषय में पक्व अर्थात् शीघ्र मरने वाला समझें, या जिसे निरन्तर नींद आती हो अथवा जो सदा जागता ही रहता हो या जो कुछ कहने की इच्छा करता हो किन्तु मोह को प्राप्त हो जाय अर्थात् जो कहना चाहे उसे भूल जाय ऐसे रोगी को, जो ज्ञानवान् वैद्य हों, उन्हें चाहिये कि चिकित्सा करने के सम्बन्ध में प्रत्याख्यान (

१८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे फल हैं ? उसका उत्तर यह है कि आयु के रहने पर जो चिकित्सा की जाती है उसका फल वेदना (रोगजनित पीड़ा) का दूर होना है क्योंकि कहा भी है कि—जिस रोगी की आयु दीर्घ है किन्तु चिकित्सा न की जाय तो वह बिना औषध के रोग अनित पीड़ा से युक्त होकर जीवित रह सकता है किन्तु यदि उसका औषध किया जाय तो वह रोगमुक्त होकर जीवित रहता है ॥९॥ ❖ किञ्च आयुषि सत्यपि रोगो चिकित्सां विना उत्थातुं न शक्नोति । यत आह चरकः- सति चायुषि नोपायं विनोत्थातुं क्षमो रुजी। दर्शितश्चात्र दृष्टान्तः पङ्कमग्नो यथा गजः ।।१०।। किञ्च आयु के रहने पर भी रोगी बिना चिकित्सा किये रोग से मुक्त होकर नहीं उठ सकता क्योंकि इसी विषय में चरक ने कहा भी है कि—आयु के रहने पर भी रोगी बिना चिकित्सा किये रोगमुक्त होकर नहीं उठ सकता। इस विषय में कीचड़ में फँसे हुये हाथी का दृष्टान्त है अर्थात् जैसे कीचड़ में फँसा हाथी बिना उपाय किये उद्धार नहीं पाता वैसे ही रोगी भी बिना चिकित्सा किये रोग से छुटकारा नहीं पाता है ॥१०॥ ❖ किञ्च चिकित्सां विना आयुष्मानप्यवसीदति यत आह स एव- सति चायुषि नष्टः स्यादादयैश्चाचिकित्सतः । यथा सत्यपि तैलादौ दीपो निर्वाति वात्यया ।।११।। बिना चिकित्सा के आयुष्मान् अर्थात् जिस की आयु अवशिष्ट है ऐसा भी रोगी अवसन्न अर्थात् मर जाता है क्योंकि इसी विषय में उन्हीं चरक ने कहा है कि—आयु रहने पर भी चिकित्सा न करने से रोगों के बढ़ जाने से रोगी नष्ट हो जाता है, जैसे कि—तैलादि के रहने पर भी हवा से दीपक बुझ जाता है ॥११॥ ❖ अत एवोक्तम्- साध्या याप्यत्वमायान्ति याप्या गच्छन्त्यसाध्यताम् । घ्नन्ति प्राणानसाध्यास्तु नराणामक्रियावताम् ।। १२ ।। इति ।। अतएव कहा है कि—जिसकी चिकित्सा नहीं होती उस रोगी के क्रमशः साध्य रोग ‘याप्य’ होकर असाध्य हो जाते हैं तथा असाध्य रोग प्राणों को नष्ट कर देते हैं ॥१२॥ ❖ चिकित्सा तु अनिश्चितायुषोऽपि कर्तव्या यत आह- तावत्प्रतिक्रिया कार्या यावच्छ्वसिति मानवः । कदाचिद्देवयोगेन दृष्टारिष्टोऽपि जीवति ।। १३ ।। अनिश्चित आयु वालों की भी चिकित्सा अवश्य करनी चाहिए क्योंकि कहा भी है कि रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये जब तक वह श्वास लेता रहे क्योंकि कभी कभी दैवयोग से ऐसा रोगी भी जीवित होते देखा गया है जिसके कि सभी अरिष्ट के लक्षण प्रकट हो गये थे। अतः चिकित्सा करना प्रत्येक अवस्था में उचित ही है ॥१३॥ ❖ इति तु यस्यासाध्यत्वं सन्दिग्धं तं प्रत्युक्तम् । येषु तु असाध्यता शास्त्रेण अनुभवेन विनिश्चता ते पुनर्न चिकित्स्याः । यत उक्तम्- सद्वैद्यास्ते न येऽसाध्यानारभन्ते चिकित्सितुम् ।। १४ ।। इति ८६-८७ ।। किन्तु उपर्युक्त वचन उन्हीं रोगियों के सम्बन्ध में समझना चाहिये जिन रोगियों की असाध्यता सन्दिग्धावस्था में हो और जिनकी असाध्यता शास्त्र तथा अनुभव से निश्चितावस्था में प्राप्त हो गई है अर्थात् जो निश्चयपूर्वक असाध्य हो गये १. ‘प्रतीच्छन्ती’ति पाठः ।

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८१ हैं ऐसे रोगी तो पुनः चिकित्सा करने के योग्य नहीं ही हैं। क्योंकि कहा भी है कि—जो सद्वैद्य होते हैं वे असाध्य रोगियों की चिकित्सा करना प्रारम्भ ही नहीं करते ॥१४॥८६-८७॥ अथ द्रव्यावश्यकतामाह- सर्वे द्रव्यमपेक्षन्ते रोगिप्रभृतयो यतः। विना वित्तं न भेषज्यं चिकित्साऽङ्गं ततो धनम् ॥८८॥ चिकित्सा में द्रव्य की आवश्यकता—रोगी, रोग आदि जितने हैं सभी द्रव्य (धन) की अपेक्षा करते हैं क्योंकि बिना द्रव्य के औषधि तैयार हो नहीं सकती। अतः द्रव्य भी चिकित्सा का अङ्ग माना गया है ॥८८॥ अथ परिचारकस्य लक्षणमाह- स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान्युक्तो व्याधितरक्षणे। वैद्यवाक्यकृदश्रान्तो युज्यते परिचारकः ॥८९॥ रोगी की परिचर्या करनेवाले (परिचारक) का लक्षण—रोगियों की परिचर्या करने के लिये वही परिचारक योग्य होता है, जो स्नेहयुक्त अर्थात् रोगी के ऊपर प्रसन्न रहने वाला तथा उसकी निन्दा नहीं करनेवाला, बलवान्, रोगी की रक्षा करने में तत्पर रहनेवाला, वैद्य के कथनानुसार कार्य करनेवाला और परिचर्या करने में नहीं थकने वाला हो ॥८९॥ ❖ स्निग्धः=प्रीतः, अजुगुप्सुः=अनिन्दकः ॥८९॥ यहाँ 'स्निग्ध' पद से 'रोगी के ऊपर प्रसन्न करने वाला' तथा 'अजुगुप्सु' पद से 'रोगी की निन्दा नहीं करने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये ॥८९॥ अथ भेषजस्य लक्षणमाह- वैद्यो व्याधिं हरेद्येन तद्द्रव्यं प्रोक्तमौषधम्। तद्यादृशमवश्यं स्याद्रोगघ्नं तादृशं ब्रुवे ॥९०॥ औषध के लक्षण—वैद्य जिस द्रव्य से व्याधि दूर करता है उसी को औषध कहते हैं। वह (औषध) जैसा होने से रोग को अवश्य दूर करने वाला होता है वैसा आगे कहते हैं ॥९०॥ अथौषधग्रहणपरिभाषामाह- प्रशस्तदेशे सञ्जातं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम्। अल्पमात्रं बहुगुणं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥९१॥ दोषघ्नमग्लानिकरमधिकं न विकारि यत्। समीक्ष्य काले दत्तं च भेषजं स्याद् गुणावहम् ॥९२॥ औषध ग्रहण करने की परिभाषा—जो ओषधि अच्छे देश (स्थान) में उत्पन्न और अच्छे दिन में उखाड़ी हुई हो और जो थोड़ी मात्रा में देने से भी फल देने वाली हो और बहुत गुण से युक्त हो, एवं जो स्वाभाविक-गन्ध, वर्ण और रस से युक्त हो तथा जो दोषों को दूर करने वाली, ग्लानि नहीं उत्पन्न करनेवाली और अधिक मात्रा हो जाने पर भी कोई विकार नहीं उत्पन्न करने वाली हो वही ओषधि यदि विचार करके समय उपस्थित होने पर दी जाय तो गुणकारक होती है ॥९१-९२॥ आग्नेया विन्ध्यशैलाद्याः सौम्यो हिमगिरिः स्मृतः। अतस्तदौषधानि स्युरनुरूपाणि हेतुभिः ॥९३॥ विन्ध्याचल आदि पर्वत 'आग्नेय' हैं और हिमालय पर्वत 'सौम्य' है। अतएव विन्ध्याचलादि पर्वतों पर उत्पन्न हुई ओषधियाँ भी अपने उत्पन्न होने के हेतुओं के अनुरूप ही आग्नेयादि गुण विशिष्ट होती हैं ॥९३॥ ❖ आग्नेयाः=अधिकाग्न्यंशाः, सौम्यः=अधिकसोमांशः। ओषधय एवौषधानि। अत्र स्वार्थे अण्। अनुरूपाणि=सदृशानि ॥९३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१८२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे इसका भाव यह है—विन्ध्यादि पर्वतों में अग्नि के अंश अधिक होने से वे 'आग्नेय' हैं और हिमालय में (सोमचन्द्रमा) का अधिक अंश होने से वह 'सौम्य' है। अतएव पूर्वोक्त इन स्थानों में उत्पन्न हुए औषध अपने उत्पन्न होने के हेतुओं के अनुरूप आग्नेयादि होते हैं अर्थात् आग्नेय संज्ञक विन्ध्याचल में उत्पन्न हुई ओषधियाँ 'आग्नेय' अर्थात् अधिक उष्णता से युक्त तथा सौम्यसंज्ञक हिमालय में उत्पन्न हुई ओषधियाँ 'सौम्य' अधिक शीतलता से युक्त होती हैं। यहाँ पर यह और समझना चाहिये कि ओषधियाँ ही औषध कहलाती हैं। क्योंकि-ओषधि शब्द से स्वार्थ में अण् प्रत्यय होने से 'यस्येति च' इस सूत्र से ओषधि के इकार का लोप होने से णित्वमान कर ओषधि के ओकार की आदि वृद्धि होने से औषध शब्द की सिद्धि होती है ॥९३॥ अन्येष्वपि प्ररोहन्ति वनेषूपवनेषु च। गृह्णीयात्तानि सुमनाः शुचिः प्रातः सुवासरे ।।९४।। आदित्यसम्मुखो मौनी नमस्कृत्य शिवं हृदि। साधारणधराद्रव्यं गृह्णीयादुत्तराश्रितम् ।।९५।। इसके अतिरिक्त अन्य स्थान वन और उपवनों में भी ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और पूर्वोक्त स्थानों में उत्पन्न होने वाली उन ओषधियों को प्रसन्न चित्त तथा पवित्र होकर शुभ दिनों में प्रातःकाल सूर्य की ओर मुख किये हुये मौन होकर तथा ध्यान द्वारा, हृदय स्थित शिवजी को नमस्कार कर ग्रहण करना चाहिये और साधारण पृथ्वी में उत्पन्न हुई ओषधियों को तो जहाँ पर स्वयं खड़ा हो वहाँ से उत्तर दिशा में उगी हुई हों उन्हीं को ग्रहण करना चाहिये ।।९४-९५।। ❖ साधारणधराद्रव्यं=सर्वभूमिभवं द्रव्यम्। उत्तराश्रितं=स्वस्मादुत्तरदिग्भवम् ।। यहाँ 'साधारणधराद्रव्यम्' पद का 'साधारण पृथ्वी में उत्पन्न हुई ओषधियों को' और 'उत्तराश्रितम्' पद का 'जहाँ पर स्वयं खड़ा हो वहाँ से जो उत्तर दिशा में उगी हुई हों उन्हीं को' यह अर्थ समझना चाहिये ।।९४-९५।। वल्मीककुत्सितानूपश्मशानोषरमार्गजाः । जन्तुवह्निहिमव्याप्ता नौषध्यः कार्यसाधिकाः ।।९६।। जो ओषधियाँ वल्मीक (विमौट), अशुद्ध स्थान, अनूप (प्रायः करके जल से युक्त) देश, श्मशान, ऊसर भूमि और मार्ग इन स्थानों में उत्पन्न हुई हों तथा जो जीवों से भुक्त या अग्नि अथवा बर्फ से झुलस गई हों ऐसी ओषधियाँ कार्य सिद्ध करने वाली नहीं होतीं अर्थात् इनसे रोग दूर नहीं होता है ।।९६।। शरद्यखिलकार्यार्थ ग्राह्यं सरसमौषधम् । विरेकवमनार्थं तु वसन्तान्ते समाहरेत् ।।९७।। प्रत्येक कार्यों के लिये रस युक्त ओषधियों का शरद ऋतु में और वमन तथा विरेचन के लिये वसन्त ऋतु के मध्य में ओषधियों का संग्रह करना चाहिये ।।९७।। ❖ वसन्तान्ते=वसन्तमध्ये। समाहरेत्=संगृह्णीयात् ।।९७।। यहाँ 'वसन्तमध्ये' का 'वसन्त ऋतु के मध्य में' तथा 'समाहरेत्' का 'संग्रह करना चाहिये' यह अर्थ समझना चाहिये ।।९७।। अतिस्थूलजटा याः स्युस्तासां ग्राह्यास्त्वचोध्रुवम् । गृह्णीयात्सूक्ष्ममूलानिसकलान्यपि बुद्धिमान् ।। बुद्धिमान् व्यक्ति जिन ओषधियों के मूल भाग अत्यन्त स्थूल हों निश्चय ही उनके छिल्कों का और जिनके मूल भाग सूक्ष्म (पतले) हों उनके सभी अङ्गों को ग्रहण करें ।।९८।। अन्यञ्च- महान्ति येषां मूलानि काष्ठगर्भाणि सर्वतः । तेषां तु वल्कलं ग्राह्यं ह्रस्वमूलानि सर्वशः ।।९९।। न्यग्रोधादेस्त्वचो ग्राह्याः सारः स्याद्वीजकादितः । ताली सादेश्च पत्राणि फलं स्यात् त्रिफलादितः ।।१००।।

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८३ क्वचिन्मूलं क्वचित्कन्दः क्वचित्पत्रं क्वचित्फलम् । क्वचित्पुष्पं क्वचित्सर्वं क्वचित्सारः क्वचित्त्वचः ।।१०१।। चित्रकं सूरणं निम्बो वासा च त्रिफला क्रमात् । धातकी कण्टकारी च खदिरः क्षीरपादपः ।।१०२।। क्वचिन्निम्बस्य गृह्णीयात्पत्राभावे त्वचामपि । बालं फलं तु बिल्वस्य पक्वमारग्वधस्य च ।।१०३।। अङ्गेऽनुक्ते जटा ग्राह्या भागेऽनुक्तेऽखिलं समम् । पात्रेऽनुक्ते मृदुः पात्रं कालेऽनुक्ते त्वहर्मुखम् ।।१०४।। और भी कहा है कि—जिन ओषधियों के मूल भाग बड़े (स्थूल) हों और उनके अन्दर लकड़ी हो तो उनके छिल्कों को और जिनके मूलभाग छोटे (पतले) हों उनके सभी भागों को ग्रहण करे तथा बड़ा आदि वृक्षों की छाल और विजयसार आदि वृक्षों का सार (भीतर की लकड़ी) तथा तालीसपत्रादि के पत्र एवं त्रिफला आदि के फल लेने चाहिये । इस प्रकार और भी किसी ओषधियों का मूल, किसी का कन्द, किसी का पत्र, किसी का फल, किसी का पुष्प, किसी का सभी भाग, किसी का सारभाग और किसी का छिल्का ही ग्रहण किया जाता है । जैसे—चित्त का मूल, सूरन का कन्द, नीम और अडूसे की पत्ती, त्रिफला (आँवरा, हर्रा और बहेड़ा) का फल, धाय का फूल, कटेरी (भटकटैया) का सर्वाङ्ग, खैर का सारभाग (ककड़ी) और दूध वाले वृक्षों की छाल ही ली जाती है । नीम का पत्र यदि समय पर न मिले तो उसका छिल्का ही लेवे और बेल का कच्चा फल तथा अमलतास का पक्का फल लेवे । जहाँ पर जिस ओषधि के किसी विशेष भाग का उल्लेख न हो वहाँ उसका मूल भाग ही लेना चाहिये और जहाँ ओषधियों का परिमाण (तौल) नहीं लिखा हो वहाँ उन सबों को समभाग में लेना चाहिये । जहाँ कोई विशेष पात्र (बर्तन) का उल्लेख न हो वहाँ मिट्टी का पात्र लेना चाहिये और जहाँ किसी विशेष काल का निर्देश न किया गया हो वहाँ प्रातःकाल का ही ग्रहण करना चाहिये ।।९९-१०४।। नवान्येव हि योज्यानि द्रव्याण्यखिलकर्मसु । विना विडङ्गकृष्णाभ्यां गुडधान्याज्यमाक्षिकैः ।।१०५।। सभी कार्यों में नवीन ही ओषधियाँ लेनी चाहिये किन्तु वायविडङ्ग, पीपर, गुड़, धान्य, घृत और शहद को पुराना ही लेना चाहिये ।।१०५।। ❖ धान्यमन्नम् ।।१०५।। यहाँ 'धान्य' पद से 'अन्न अर्थात् चावल' का ग्रहण करना चाहिये ।।१०५।। पुराणं तु प्रशस्तं स्यात्ताम्बूलं काञ्जिकं तथा । शुष्कं नवीनद्रव्यं तु योज्यं सकलकर्मसु ।।१०६।। आर्द्रांन्तु द्विगुणं युञ्ज्यादेष सर्वत्र निश्चयः । गुडूची कुटजो वासा कूष्माण्डश्च शतावरी ।।१०७।। अश्वगन्धा सहचरः शतपुष्पा प्रसारिणी । प्रयोक्तव्याः सदैवार्द्राद्विगुणं नैव कारयेत् ।।१०८।। ताम्बूल (पान) और कांजी पुराना ही अच्छा होता है। सभी कार्यों में नवीन द्रव्य सुखाकर लेना चाहिये । जो गीली ओषधियाँ हैं उन्हें अन्य ओषधियों की अपेक्षा निश्चयपूर्वक सर्वत्र दूनी ही लेनी चाहिये । किन्तु गुरुच, कुड़ा (कोरैया), अडूसा, कूष्माण्ड (पेठा), सतावर, अश्वगन्धा, कटसरैया, सौंफ और प्रसारिणी (गन्धप्रसारणी या पसरन) ये सभी ओषधियाँ यद्यपि सदा गीली ही लेने का विधान है तथापि दूनी नहीं लेनी चाहिये अर्थात् और ओषधियों के बराबर ही लेनी चाहिये ।।१०६-१०८।। ❖ सहचरः=कुरण्टकः, 'कटसरैया' इति लोके ।।१०६-१०८।। यहाँ 'सहचर' से 'कुरण्टक अर्थात् लोक में प्रसिद्ध कटसरैया' का ही ग्रहण करना चाहिये ।। अन्यञ्च वासानिम्बपटोलकेतकबलाकूष्माण्डकेन्दीवरीवर्षभूकुटजाश्च कन्दसहिता सा पूतिगन्धाऽमृता । ऐन्द्री नागबला कुरुण्टकपुरच्छत्राऽमृताः सर्वदा सार्द्रा एव तु न क्वचिद् द्विगुणिताः कार्येषु योज्या बुधैः१ ।।१०९।। १. 'वासा निम्बपटोलकेतकबलाकूष्माण्डकेन्दीवरी-वर्षभूकुटजाश्वगन्धसहितास्ताः पूतिगन्धाऽमृता। मांसी नागबला कुरण्टकपुरौ हिङ्ग्वाद्रैकक्षैक्षवम् गृह्णीयात् सरमान्यमूनि न पुनः कुर्याद् द्विभागानि चे'ति पाठन्तरम्। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे इसी सम्बन्ध में अन्य वचन—अडूसा, नीम, परवल, केवड़ा, बला (खिरेटी या वरियारा), पेठा, सतावर, वर्षाभू (पुनर्नवा), कुड़ा, कन्द (कमल का कन्द आदि), गन्धप्रसारणी, गिलोय, इन्द्रवारुणी (इन्द्रायन), गुलशकरी, कटसरैया, सौंफ और दूर्वा ये सब ओषधियाँ वैद्यों को सभी कार्यों में सदा गीली ही लेनी चाहिये तथा गीली होने से कभी दूनी मात्रा में नहीं किन्तु समभाग में ही लेनी चाहिये ।।१०९।। ❖ १'इन्दीवरी=शतावरी। पूतिगन्धा=गन्धप्रसारणी। ऐन्द्री=इन्द्रवारुणी। नागबला=गुलशकरी। कुरण्टकः=पीतपुष्पः (कटसरैया)। पुरो=गुग्गुलः ।।१०९।। यहाँ 'इन्दीवरी' से 'सतावर', 'पूतिगन्धा' से 'गन्धप्रसारणी', 'ऐन्द्री' से इन्द्रवारुणी (इन्द्रायन), 'नागबला' से 'गुलशकरी' 'कुरण्टक' से 'पीले फूल वाली 'कटसरैया' और 'पुर' से 'गुग्गुलु' का ग्रहण करना चाहिये ।।१०९।। घृतं तैलं च पानीयं कषायं व्यञ्जनादिकम्। पक्त्वा शीतीकृतं चोष्णं तत्सर्वं स्याद्विषोपमम् ।।११०।। घी, तैल, जल, क्वाथ (काढ़ा) और व्यञ्जन (भोज्यपदार्थ शाक) आदि ये सब द्रव्य अग्नि पर रखने से परिपक्व होकर शीतल होने पर पुनः आग पर रख कर यदि गरम किये जायँ तो विष की भाँति विकार युक्त हो जाते हैं अतः पुनः गरम नहीं करना चाहिये ।।११०।। अथ द्रव्याणां परीक्षामाह- सूक्ष्मास्थिर्मांसला पथ्या सर्वकर्माणि पूजिता। क्षिप्ताऽम्भसि निमज्जेद्या भल्लातक्यस्तथोत्तमाः ।।१११।। वराहमूर्द्धवत्कन्दो वाराहीकन्दसंज्ञकः। सौवर्चलं तु काचाभं सैन्धवं स्फटिक प्रभम् ।।११२।। सुवर्णच्छविकं ज्ञेयं स्वर्णमाक्षिकमुत्तमम्। २ओड्रपुष्पप्रतीकाशा मनोह्वा चोत्तमामृता ।।११३।। श्रेष्ठं शिलाजतु ज्ञेयं प्रक्षिप्तं न विशीर्यते। तोयपूर्णे कांस्यपात्रे प्रतानेन विवर्धते ।।११४।। कर्पूरस्तुवरः स्निग्ध एला सूक्ष्मफला वरा। श्वेतचन्दनमत्यन्तं सुगन्धि गुरुपूजितम् ।।११५।। रक्तचन्दनमत्यन्तं लोहितं प्रवरं मतम्। काकतुण्डनिभः स्निग्धो गुरुः श्रेष्ठो गुरुर्मतः ।।११६।। सुगन्धि लघु रूक्षं च सुरदारु वरं मतम्। सरलं स्निग्धमत्यर्थं सुगन्धि च गुणावहम् ।।११७।। अतिपीता प्रशस्ता तु ज्ञेया दारुनिशा बुधैः। जातीफलं गुरु स्निग्धं समं शुभ्रान्तरं वरम् ।।११८।। ओषधियों की परीक्षा—जिस हरड़ में गुठली छोटी और गूदे अधिक हों तथा जो जल में डालने पर डूब जाय वह भी सभी कार्यों में लेने के लिये उत्तम होता है इसी प्रकार पतली गुठली से युक्त अधिक गूदे वाला एवं जल में डालने पर डूब जाने वाला भिलावा भी अच्छा होता है। जो वाराहीकन्द सूअर के शिर के आकार का होता है वह उत्तम है। साँभरनोन काँच के सदृश होने से उत्तम होता है। सेंधानमक स्फटिक के समान होने से उत्तम है। सोना मक्खी सोने के समान कान्ति वाली होने से उत्तम होती है। मैनशिल जवाकुसुम के समान वर्ण वाला होने से उत्तम होता है। शिलाजीत वही उत्तम कहलाता है जो जल से पूर्ण काँसे के पात्र में डालने से गल न जाय किन्तु उससे सूत के सदृश निकल कर चारो ओर बढ़े। कपूर कसैला तथा स्निग्ध होने से उत्तम होता है। सफेद चन्दन अत्यन्त सुगन्धित तथा गुरु (भारी) होने से उत्तम होता है। लालचन्दन अत्यन्त लाल होने से उत्तम होता है। अगर आकार में कौवे की चोंच के समान, स्निग्ध तथा गुरु (भारी) होने से उत्तम होता है। देवदारु सुगन्ध युक्त, हल्का और रूखा होने से उत्तम होता है। सरल (चीर की लकड़ी) अत्यन्त स्निग्ध और सुगन्ध युक्त होने से गुणकारी होता है। दारुहल्दी अत्यन्त पीली होने से उत्तम समझी जाती है। जायफल गुरु (भारी), स्निग्ध, सम आकार वाली और भीतर से सफेद होने से उत्तम होता है ।।१११-११८।। १. 'इन्दी' इति पाठः क्वचिन्नोपलभ्यते। २. 'इन्द्रे'ति पाठः।

अथ षष्ठम मिश्रप्रकरणम् १८५ मृद्वीका सोत्तमा ज्ञेया या स्याद्गोस्तनसन्निभा । करमर्दफलाकारा मध्यमा सा प्रकीर्तिता ।।११८।। जो दाख आकार में गौ के स्तन के समान हो वह उत्तम और जो आकार में करौंदे के समान हो उसे गुण में मध्यम समझना चाहिये ।।११९।। ❖ गोस्तनसन्निभा 'मुनक्का' इति लोके । करमर्दफलाकारा 'करम्बा' इति लोके ।।११९।। जो दाख आकार में गौ के स्तन के समान होता है, उसे लोक 'मुनक्का' कहते हैं और जो आकार में करौंदे के फल के समान होती है, उसे लोक 'करम्बा' (किसमिस) कहते हैं ।।११९।। खण्डं तु विमलं श्रेष्ठं चन्द्रकान्तसमप्रभम् । गव्याज्यसदृशं रुच्यं गन्धं मधुवरं मतम् ।।१२०।। जो खांड निर्मल तथा चन्द्रकान्त मणि के समान सफेद पीलाई लिये हुये हो वह उत्तम होती है। जो मधु (शहद) रङ्ग में गाय के घी के समान, रुचिकारक और सुगन्धित हो वह उत्तम समझा जाता है ।।१२०।। अथ स्वभावतो हितानि द्रव्याण्याह- शालीनां लोहितः शालिः षष्टिकेषु च षष्टिकः । शूकधान्येष्वपि यवो गोधूमः प्रवरो मतः ।।१२१।। शिम्बीधान्ये वरो मुद्गो मसूरश्चाढकी तथा । रसेषु मधुरः श्रेष्ठो लवणेषु च सैन्धवः ।।१२२।। स्वभावतः हितकारक द्रव्य—शाली धानों में लाल शाली धान्य, षष्टिक (६० दिन में पकनेवाले) धान्यों में षष्टिक (साठी) धान्य, शूक (टूँडीदार) धान्यों में यव (जौ) तथा गेहूँ उत्तम होता है। शिम्बो (फलीवाले) धान्यों में मूँग, मसूर तथा अरहर उत्तम होता है। छः प्रकार के रसों में मधुर रस उत्तम होता है। और नमक में सेंधानमक उत्तम होता है ।।१२१-१२२।। दाडिमामलकं द्राक्षा खर्जूरं च परूषकम् । राजादनं मातुलुंगं फलवर्गेषु शस्यते ।।१२३।। फलों के वर्गों में—अनार, आँवला, दाख (अंगूर), खर्जूर (छुहारा), फालसा, खिरनी और बिजौरा निम्बू ये सब उत्तम होते हैं ।।१२३।। ❖ परूषकं 'फालसा' इति लोके । राजादनं 'खिरणी' इति लोके । मातुलुंगं 'बिजउरा' इति लोके ।।१२३।। यहाँ 'परूषक' से लोक में प्रसिद्ध 'फालसा' और 'राजादन' से लोकप्रसिद्ध 'खिरनी' तथा 'मातुलुङ्ग' से लोक में प्रसिद्ध 'बिजउरा नींबू' समझना चाहिये ।।१२३।। पत्रशाकेषु वास्तूकं जीवन्ती पोतिका वरा । पटोलं फलशाकेषु कन्दशाकेषु सूरणम् ।।१२४।। एणः कुरङ्गो हरिणो जाङ्गलेषु प्रशस्यते । पक्षिणां तित्तिरिलावो वरो मत्स्येषु रोहितः ।।१२५।। हरिणस्ताम्रवर्णः स्यादेणः कृष्णतया मतः । कुरङ्गस्ताम्र उद्दिष्टो हरिणाकृति को महान् ।।१२६।। जलेषु दिव्यं दुग्धेषु गव्यमाज्येषु गोभवम् । तैलेषु तिलजं तैलमैक्षवेषु सिता हिता ।।१२७।। पत्ते के शाकों में बथुआ, जीवन्ती और पोई ये सब उत्तम होते हैं। फल के शाकों में 'परवल' और कन्द के शाकों में 'सूरन' उत्तम होता है। जङ्गली जीवों के मांसों में एण, कुरङ्ग तथा हरिण का मांस उत्तम होता है। पक्षियों में तीतर तथा लवा का मांस उत्तम होता है। मछलियों में 'रोहू मछली' का मांस उत्तम होता है। एण, कुरङ्ग तथा हरिण का परस्पर भेद यह है कि—हरिण तांबे के समान वर्ण वाला होता है तथा एण कृष्ण वर्ण का होता है एवं कुरङ्ग भी यद्यपि हरिण के समान ताम्रवर्ण का ही होता है तथापि उसकी अपेक्षा बड़ा होता है। जलों में आकाश का जल, दूधों में गाय का दूध, घृतों में गाय का घी, तेलों में तिल का तेल, ईख से बने हुये गुड़ादि में शक्कर ये सब उत्तम (हितकर) होते हैं ।।१२४-१२७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA