भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 1167 में से

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४३ जो ईर्ष्या, भय और क्रोध से युक्त तथा लोभी है एवं रोग तथा दीनता से पीड़ित और द्वेष से युक्त रहते हैं उनका भी भोजन किया हुआ अन्न भली-भाँति परिपक्व नहीं होता, अतः अजीर्ण न हो इसके लिये सर्वथा उपर्युक्त कर्मों का त्याग करना चाहिये ।।२२८।। अथाध्यशनलक्षणमाह- अजीर्णे भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते ।।२२९।। अध्यशन के लक्षण—अजीर्ण होने पर भी जो भोजन किया जाता है, उसे अध्यशन कहते हैं ।। प्राग्भुक्ते चानले मन्दे द्विरह्नि न समाहरेत् ।।२३०।। तन्निवारयन्नाह- अध्यशन करने का निषेध—पहले का भोजन नहीं पचा हो तथा अग्नि मन्द हो तो दिन में दो बार भोजन नहीं करना चाहिये ।।२३०।। ❖ अस्यायर्थः-प्रातर्भुक्ते अजीर्णे सति अहन्येव पुनर्न भुञ्जीतेत्यर्थः । रात्रौ पुनस्तथाऽपि सति भुञ्जीतैव । अत आह सुश्रुत एव— 'प्रातराशे त्वजीर्णे तु सायमाशो न दुष्यति' इति ।।२३०।। इसका भावार्थ यह है कि—प्रातःकाल (९-१० बजे) का भोजन यदि जीर्ण (पचा) न हो तो पुनः दिन में ही केवल दुबारा नहीं खाना चाहिये, किन्तु रात्रि में तो अजीर्ण रहने पर भी भोजन करना ही चाहिये । इसी विषय में 'सुश्रुत' भी कहते हैं कि—'प्रातःकाल का भोजन अजीर्ण होने पर भी सायङ्काल भोजन करने पर दोष उत्पन्न नहीं करता हैं' ।।२३०।। पूर्व भुक्ते विदग्धेऽन्ने भुञ्जानो हन्ति पावकम् ।।२३१।। पूर्व का भोजन किया हुआ अन्न यदि विदग्ध (अर्धपरिपक्व) हो गया हो तो उस समय भोजन करने से अग्नि मन्द हो जाती है ।।२३१।। अस्य त्वयमर्थः-पूर्व भुक्ते रात्रिभुक्ते अन्ने विदग्धे किञ्चित् पक्वे किञ्चिदपक्वे प्रातर्भुञ्जानः पावकं हन्तीत्यर्थः ।।२३१।। वस्तुतः इसका अर्थ यह है कि—पूर्व में भोजन किया हुआ अर्थात् रात्रि में भोजन किया हुआ अन्न विदग्ध अर्थात् कुछ पक्व और कुछ न पक्व हुआ हो तो उस समय भोजन करने से अग्नि नष्ट हो जाती है ।।२३१।। अत आह—सायमाशो त्वजीर्णे तु प्रातर्भुक्तं विषोपमम् ।।२३२।। इति ।। इसीलिये कहा भी है कि—यदि सायङ्काल का भोजन परिपक्व न हुआ हो तो प्रातःकाल भोजन करना विष तुल्य होता है ।।२३२।। अथ सायमाशाजीर्णे भोजनोपायमाह- भवेद्यदि प्रातरजीर्णशङ्का तदाऽभयां नागरसैन्धवाभ्याम् । विचूर्णितां शीतलजलेन भुक्त्वा भुञ्जीत चान्नं मितमन्नकाले ।।२३३।। प्रातःकाल अजीर्ण मालूम पड़ने पर भोजन का उपाय—प्रातःकाल यदि अजीर्ण की आशङ्का हो तो हरें, सोंठ और सेंधानमक का चूर्ण बनाकर शीतल जल के साथ खाकर, भोजन का समय उपस्थित होने पर उस दिन थोड़ी मात्रा में भोजन करना चाहिये ।।२३३।।

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