भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१४२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ उदरे इति शेषः ।।२२३।। 'भलीभाँति उदर में ठहरता है' ऐसा अर्थ जोडना (समझना) चाहिये ।।२२३।। अथान्नस्योदरेऽस्थितिहेतूनाह- शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धो जुगुप्सितः । भुक्तमप्रयतं चान्नमतिहास्यं च वामयेत् ।। खाये हुए अन्न का उदर में न ठहरने के हेतु—घृणित शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध एवं अपवित्र अन्न तथा अत्यन्त हँसना ये सब वमन हो जाने के कारण हैं ।।२२४।। ❖ अप्रयतमपवित्रम् ।।२२४।। 'अप्रयतम्' का 'अपवित्र' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२२४।। अथान्यदपि वर्जनीयमाह- शयनं चाशनं चाति न भजेन्न द्रवाधिकम् । नाग्न्यातपौ न प्लवनं न यानं नापि वाहनम् ।।२२५।। भोजन के बाद परित्याग करने के योग्य अन्यान्य कर्म—भोजन के बाद अधिक देरतक सोना, बैठना तथा अधिक द्रव (पतला) पदार्थ और अग्नि तथा आतप (घाम) का सेवन, एवं जल में तैरना, मार्ग में चलना और घोड़े आदि की सवारी करना छोड़ देवे ।।२२५।। ❖ प्लवनं=बाहुभ्यां जलप्रतरणम्, यानं=मार्गे चलनम्, वाहनमश्वादि ।।२२५।। 'प्लवन' से 'बाहुओं से जल में तैरना' तथा 'यान' से 'मार्ग में चलना' और 'वाहन' से 'घोड़े आदि की सवारी करना' अर्थ समझना चाहिये ।।२२५।। व्यायामं च व्यवायं च धावनं यानमेव च । युद्ध गीतं च पाठं च मुहूर्त्तं भुक्तवांस्त्यजेत् ।।२२६।। भोजनोपरान्त व्यायाम (कसरत), स्त्रीसम्भोग, दौड़ना, बैलगाड़ी आदि सवारी पर चढ़ना, युद्ध, गाना, पढ़ना तथा ऊपर कहे हुए कर्मों को एक मुहूर्त्त (लगभग पौन घण्टे) तक अवश्य त्याग देवे ।।२२६।। अथाजीर्णस्य हेतूनाह- अत्यम्बुपानाद्विषमाशनाच्च सन्धारणात् स्वप्नविपर्ययाच्च । कालेऽपि सात्म्यं लघु चापि भुक्तमन्नं पाकं भजते नरस्य ।।२२७।। अजीर्ण होने के कारण—ज्यादा जल पीने से, विषम (थोड़ा, बहुत या अबेर, सबेर,) भोजन करने से, मलमूत्रादि के वेग रोकने से, सोने का विपर्यय अर्थात् दिन में सोने तथा रात्रि में जागने से अथवा जिसको जिस समय सोना या जागना अभ्यस्त:हो उस समय न सोने तथा न जागने से लघु तथा ठीक समय पर भोजन किया हुआ भी अन्न नहीं पचता है ।।२२७।। ❖ १सन्धारणात्=अधोवातमलमूत्रादीनाम् ।।२२७।। 'सन्धारणात्' का 'मलमूत्रादि के वेग रोकने से' यह अर्थ करना चाहिये ।।२२७।। ईर्ष्याभयक्रोधसमन्वितेन लुब्धेन रुग्दैन्यनिपीड़ितेन ।। विद्वेषयुक्तेन च सेव्यमानमन्नं न सम्यक्परिपाकमेति ।।२२८।। १. सर्वत्राग्रिमश्लोकादनन्तरं कोष्ठस्थ पाठोऽयं पठितः, तत्तु, प्रमाद एवेति।