भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १४१ दिन में सोने का निषेध—दिन में नहीं सोना चाहिये क्योंकि दिवास्वाप (दिन में सोना) कफकारक होता है। अतएव ग्रीष्म ऋतु को छोड़ अन्य सभी ऋतुओं में दिन में सोना निषिद्ध है ॥२१६॥ अथ दिवास्वापयोग्यजनानाह- उचितो हि दिवास्वप्नो नित्यं येषां शरीरिणाम् । वातादयः प्रकुप्यन्ति तेषामस्वपतां दिवा ॥२१७॥ व्यायामप्रमदाऽध्ववाहनरतान् क्लान्तानतीसारिणः शूलश्वासवतस्तृषापरिगतान् हिक्कामरुत्पीडितान् ।। क्षीणान् क्षीणकफाञ्छिशून्मदहतान्वृद्धानसाजीर्णिनो- रात्रौ जागरितान्नराग्निरशनान्कामं दिवा स्वापयेत् ।।२१८।। दिन में सोने योग्य जन—जिन को दिन में सोने का अभ्यास हो वे यदि दिन में न सोवें तो उनके वातादि दोष कुपित हो जाते हैं अत एव ऐसे लोगों के लिये दिन में सोना निषिद्ध नहीं है। तथा कसरत करने वाले, रात्रि में स्त्रीसंभोग करने वाले, रास्ता चलने वाले, घोड़ा आदि वाहनों पर चढ़ने वाले तथा थके हुये, अतीसार, शूल और श्वास रोगों से युक्त एवं प्यासे, हिचकी तथा वायु के रोग से पीड़ित, कृश, क्षीण कफ वाले, बच्चे, मदहत (अत्यन्त शराबी-नशेबाज), वृद्ध तथा अजीर्ण रोग से युक्त एवं रात्रि में जगे हुये तथा उपवास किये हुये हों, उन सबों को इच्छानुसार दिन में सोना चाहिये ॥२१७-२१८॥ दिवा वा यदि वा रात्रौ निद्रा सात्मीकृता तु यैः । न तेषां स्वपतां दोषो जाग्रतां चोपजायते ।।२१९।। दिन तथा रात्रि में जिन्होंने सोना अपने प्रकृति के अनुकूल कर लिया है, वे यदि उस समय सोवें या जागें तो उन लोगों को कोई दोष (हानि) नहीं होता है ॥२१९॥ ❖ स्वपतां-दिवा इति यावत् । जाग्रतां=रात्राविति शेषः ।।२१९।। 'स्वपताम्' अर्थात् दिन के समय सोवे और 'जाग्रताम्' अर्थात् रात्रि के समय जागे' ।।२१९।। अथ भोजनानन्तरं शयनफलमाह- भोजनानन्तरं निद्रा वातं हरति पित्तहृत् । कफं करोति वपुषः पुष्टिं सौख्यं तनोति हि ।।२२०।। भोजन के बाद सोने के गुण—भोजन के बाद का शयन वात-पित्त का हरण करने वाला, कफकारक तथा शरीर की पुष्टि और सुख की वृद्धि करने वाला होता है ॥२२०॥ अथ शयनमर्दनादीनां फलान्याह- शयनं पित्तनाशाय वातनाशाय मर्दनम्। वमनं कफनाशाय ज्वरनाशाय लङ्घनम् ।।२२१।। आसीनं घूर्णितं यत्तु नाभिष्यन्दि न रूक्षणम् ।।२२२।। शयन, मर्दन आदि का गुण-सोने से पित्त का, शरीर मलवाने से वायु का, वमन करने से कफ का और उपवास करने से ज्वर का नाश होता है और बैठना तथा घूमना न अभिष्यन्दी (कफकारक) है और न रूक्ष ही है ॥२२१-२२२॥ अथापरानप्युदरेऽन्नस्य संस्थापनहेतूनाह- शब्दान् स्पर्शांश्च रूपाणि रसानान्धान्मनःप्रियान् । भुक्तवानपि सेवेते तेनान्नं साधु तिष्ठति ।।२२३।। उदर में अन्न के ठहरने के कारण—भोजन करने के बाद मन को प्रिय लगने वाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध का सेवन करने से खाया हुआ अन्न भलीभाँति (पेट में) ठहरता है ॥२२३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA