भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१४० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ स्वादुः=भक्ष्यद्रव्येषु बाहुल्येन मधुररसजनकः ।।२०७।। 'स्वादुः' से 'भक्षण योग्य पदार्थों में प्रायः मधुर रस (मिठास) उत्पन्न करनेवाली' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥२०७॥ अथ दक्षिणपश्चिमपवनयोर्गुणदोषानाह- दक्षिणः पवनः स्वादुः पित्तरक्तहरो लघुः । वीर्येण शीतलो बल्यश्चक्षुष्यो न तु वातलः ।। पश्चिमः पवनस्तीक्ष्णः शोषको बलहल्लघुः । मेदःपित्तकफध्वंसी प्रभञ्जनविवर्धनः ।।२०९।। दक्षिणी तथा पश्चिमी वायु सेवन के गुण-दोष—दक्षिणी वायु स्वादु, पित्तरक्त नाशक, लघु, शीत, वीर्य, बलकारक तथा नेत्रों के लिये हितकर है किन्तु वातवर्धक नहीं है और पश्चिमी वायु तीक्ष्ण, शोष उत्पन्न करने वाली, बलहरण करने वाली, लघु, मेद, पित्त तथा कफ को नष्ट करने वाली तथा वातवर्धक है ॥२०८-२०९॥ अथोत्तरवायोर्गुणदोषानाह- उत्तरा मारुतः शीतः स्निग्धो दोषप्रकोपकृत् । क्लेदनः प्रकृतिस्थानां बलदो मधुरो मृदुः ।।२१०।। उत्तरी वायु के गुण-दोष—उत्तरी वायु शीतल, स्निग्ध, दोषों को कुपित करने वाली, क्लेदजनक (आर्द्रता उत्पन्न करने वाली), प्रकृतिस्थ (स्वस्थ) पुरुषों को बल देनेवाली, मधुर तथा मृदु होती है ॥२१०॥ दोषप्रकोपकृद्=आतुराणाम् ।।२१०।। 'दोषप्रकोपकृद्' अर्थात् 'रोगी पुरुषों के दोषों को कुपित करने वाली' ॥२१०॥ अथाग्नेयादिवायूनां गुणानाह- आग्नेयो दाहकृद्रूक्षो नैर्ऋतो न विदाहकृत् । वायव्यस्तु भवेत्तिक्त ऐशानः कटुकः स्मृतः ।।२११।। बिष्वग्वायुरनायुष्यः प्राणिनां बहुरोगकृत् । अतस्तं नैव सेवेत सेवितः स्यान्न शर्मणे ।।२१२।। आग्नेय, नैर्ऋत्य, वायव्य, ईशान तथा चौतरफा बहनेवाली वायु के गुण—आग्नेय (अग्निकोण की) वायु दाहजनक तथा रूक्ष होती है। नैर्ऋत (निर्ऋत्य कोण की) वायु दाहकारक नहीं होती है। वायव्य (वायव्य कोण की) वायु तिक्त होती है। ऐशान (ईशान कोण की) वांयु कटु होती है। चारों दिशाओं की मिली हुई वायु आयु नाशक और प्राणियों के लिये बहुत रोग उत्पन्न करने वाली होती है उसके सेवन से कल्याण नहीं होता अतः उसका सेवन नहीं करना चाहिये ॥२११-२१२॥ अथ व्यञ्जनतालवृन्तादिभववायूनां गुणानाह- व्यजनस्यानिलो दाहस्वेदमूर्च्छाश्रमापहः । तालवृन्तभवो वातस्त्रिदोषशमको मतः ।।२१३।। शव्यजनजस्तूष्णो रक्तपित्त प्रकोपणः । चामरो वस्त्रसम्भूतः मायूरो वेत्रजस्तथा ।।२१४।। एते दोषजिता वाताः स्निग्धा हृद्याः सुपूजिताः ।।२१५।। पङ्खे की वायु के गुण—पङ्खे मात्र की वायु-दाह, स्वेद, मूर्च्छा और श्रम को दूर करने वाली होती है। उसमें ताड़ के पत्तों से बने पङ्खे की वायु वातादि तीनों दोषों को दूर करने वाली है। बाँस के पङ्खे की वायु उष्ण एवं रक्तपित्त को कुपित करने वाली होती है। चमर, वस्त्र, मोर के तथा वेत के बने हुये पङ्खे की वायु स्निग्ध, हृदय को प्रिय अत एव प्रशंसनीय हैं ॥२१३-