भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १३९ अथ शयनचर्यामाह, तत्रादौ खट्वादीनामुपरि शयनफलान्याह- त्रिदोषशमनी खट्वा तूली वातकफापहा। भूशय्या वृंहणी वृष्या काष्ठपट्टी तु वातला ॥२०१॥ शय्या का विधान—खाट पर सोने से तीनों दोषों का शमन होता है, गद्दे पर सोने से वायु और कफ का नाश होता है, केवल पृथ्वी पर सोने से पुष्टि तथा वीर्य की वृद्धि होती है तथा काठ के पटरों (तख्तों) पर सोने से वायु बढ़ता है ॥२०१॥ अन्यः पुनराह- भूशय्या वातलाऽतीवरूक्षा पित्तास्रनाशिनी। सुशय्याशयनं हृद्यं पुष्टिनिद्राधृतिप्रदम् ।। श्रमानिलहरं वृष्यं विपरीतमतोऽन्यथा ।।२०२ ।। शय्या के विषय में अन्य मत-पृथ्वी पर शयन करना अत्यन्त वातजनक, रूक्षता का उत्पादक और रक्त पित्त का नाशक होता है। सुन्दर शय्या पर शयन करना हृदय के लिये प्रिय, पुष्टि, निद्रा और धैर्य का प्रदान करने वाला, श्रम तथा वायु को हरण करने वाला है और वीर्यवर्धक होता है और इससे विपरीत बुरी शय्या पर शयन करना पूर्वोक्त गुणों से विरुद्ध फल देने वाला होता है ॥२०२॥ अथ संवाहनगुणानाह- संवाहनं मांसरक्तत्वक्प्रसादकरं परम्। प्रीतिनिद्राकरं वृष्यं कफवातश्रमापहम् ।।२०३।। शरीर दबवाने के गुण-शरीर दबवाना मांस, रक्त और त्वचा के लिये अत्यन्त सुखावह और मन की प्रसन्नता तथा निद्रा को उत्पन्न करनेवाला, वीर्यवर्धक एवं कफ, वायु और श्रम का दूर करने वाला होता है ॥२०३॥ अथ प्रवाताप्रवातसेवनगुणानाह- श्वेदमूर्च्छापिपासाघ्नमप्रवातमतोऽन्यथा। प्रवातं रौक्ष्यवैवर्ण्यस्तम्भकृद्दाहपित्तनुत् ।। २०४ ।। सुखं प्रवातं सेवेत ग्रीष्मे शरदि चान्तरा। निर्वातामायुषे सेव्यमारोग्याय च सर्वदा ।।२०५।। धीरे तथा जोरों से बहती हुई वायु सेवन के गुण-अधिक बहती हुई वायु का सेवन रूक्षता, विवर्णता तथा स्तब्धता (शरीर का जकड़न) करनेवाला, दाह तथा पित्त का नाशक, स्वेद (पसीना) मूर्च्छा और प्यास को दूर करनेवाला होता है और धीरे-धीरे बहने वाली वायु का सेवन पूर्वोक्त गुणों से विपरीत फल देने वाला होता है। ग्रीष्म तथा शरत् ऋतु में बीच-बीच में सुखकर (शरीर तथा मन को प्रफुल्लित करने वाली) वायु का सेवन करना चाहिये और आयु तथा आरोग्यता का लाभ करने के लिये सर्वदा वायु रहित स्थान का सेवन करना (ऐसे स्थानों में टहलना) चाहिये ।।२०४- २०५।। अथ पूर्ववायुसेवनगुणदोषानाह- पूर्वाऽनिलो गुरुः सोष्णः स्निग्धः पित्तास्रदूषकः । विदाही वातलः 'श्रान्तिकफशोषवतां हितः ।।२०६।। पूर्वी वायु (पुरवइया हवा) के सेवन से गुण दोष-पूर्वी वायु भारी, गरम, स्निग्ध, रक्त व पित्त को दूषित करने वाली और विशेष रूप से दाह उत्पन्न करने वाली तथा वायु के दोष को बढ़ाने वाली है किन्तु परिश्रम कफ तथा शोष से युक्त प्राणियों के लिये हितकर होती है ॥२०६॥ स्वादुः पटुरभिष्यन्दी त्वग्दोशार्शोविषक्रिमीन् । सन्निपातं ज्वरं श्वासमामवातं च कोपयेत् ।।२०७।। पूर्वी वायु स्वादु नमकीन अभिष्यन्दी होती है तथा त्वग्गत दोष, बवासीर, विष, क्रिमि, सन्निपातज्वर, श्वास और आमवात को कुपित करने वाली होती है ॥२०७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA